Sunday, July 12, 2020

पूछरी का लौठा


पूँछरी का लौठा


पूँछरी की अवस्थिति  

गोवर्धन परिक्रमा में पड़ने वाले पूछरी का लौठा जी का मंदिर राजस्थान के क्षेत्र में आता है। यह मुख्य परिक्रमा मार्ग पर एक प्रसिद्ध मंदिर है।  आन्यौर गांव से लगभग तीन किलोमीटर दक्षिण दिशा में पूँछरी गांव स्थित है। पूँछरी गांव राजस्थान राज्य के अन्तर्गत पड़ता है। यहाँ से परिक्रमा मार्ग पूर्व दिशा से पश्चिम दिशा की ओर मोड़ खाता है। पूँछरी में ही गिरिराज जी के चरण विराजित हैं। पूँछरी में ही भरतपुर राजाओं के द्वारा निर्मित अनेक कलात्मक छतरियाँ मौजूद हैं। इस स्थान का पूछँरी नाम होने के पीछे दो कारण बताए जाते हैं-


पहला कारण है कि श्री गोवर्धन जी का आकार एक नाचते हुए मोर के समान है। पूँछरी इस नाचते हुए मोर के पंखों वाले पूंछ के स्थान पर हैं। राधाकुण्ड़़ उनकी जिह्वा तथा कृश्णकुण्ड़़ उनकी चिबुक (चौंच) है।


दूसरे कारण के वैष्णवों का मानना ​​है कि श्री गिरिराजजी गाय का एक रूप हैं उनके अनुसार श्री गिरिराज जी की आकृति गौरूप मानी जाती है। यहां गोवर्धन पहाड़ी सिकुड़ती है इस कारण भक्त इसे गाय की पूंछ के रूप में देखते हैं। अतः इस आकृति में भी गिरिराज जी के गाय रूप की पूंछपूँछरी में है। इस कारण से भी इस गांव का नाम पूँछरी कहलाता है। उनका मानना है कि इस गाय का सिर (मस्तक) मानसी गंगा में है, मुख (मुख) सुंदरशीला जतीपुरा में तथा और पूंछ, पूँछरी (puchdi) में है। इस में राधाकुण्ड़़ इनकी जिह्वा तथा ललिताकुण्ड़़ को ललाट माना गया है।

पूछरी नाम कैसे पडा

जब पहली बार गोपियां भगवान कृष्ण को खोजते हुए वहां आई तो उन्होंने देखा कि भगवान कृष्ण लोटा जी के पास बैठे हुए हैं। उम्र में बड़े देखकर उन्होंने उन्हें कृष्ण का बड़ा भाई समझा इसलिए उन्होंने अपने घूँघट खींच लिए। 


उन्होंने इशारे से कृष्ण को अपने पास बुलाया और गोल मटोल गोलू मोलू से गोप के बारे में पूछा तो कृष्ण ने कहा कि मैं इनका नाम नहीं जानताआप ही पूछ लीजिए।

लज्जा और शर्म के मारे किसी में भी उनसे बात करने और उनके आगे जाने की हिम्मत नहीं की। उन्होंने इशारे से कृष्ण को अपने पास बुलाया और गोल मटोल गोलू मोलू से गोप के बारे में पूछा तो कृष्ण ने कहा कि मैं इनका नाम नहीं जानताआप ही पूछ लीजिए।

इस पर उन सभी ने एक दूसरे के कान में फुसफुसाहट शुरू कर दी यह बलदाऊ है या कोई और इस कारण वे एक दूसरे से "पूछ रीपूछ री" कह कर संबोधित कर रही थी। 


हर कोई एक-दूसरे से पूछने के लिए कह रहीं थीं परंतु उनमें से किसी ने भी उस गोप से व्यक्तिगत रूप से पूछने की हिम्मत नहीं की थी। इस कारण इस स्थान का नाम "पूँछरी" हुआ। और उस गोप का नाम पूँछरी का लोथा हुआ।

श्री लौठाजी जी का कृष्ण से मिलन: -


पूछरी के पास पूछरी लोथा का एक छोटा सा मंदिर है। जब श्री ठाकोरजी ने गिरिराज को उठायातो  जिसे व्रजभाषा में लोथा का अर्थ है एक मजबूत गोप। कहा जाता हैकि जब इंद्र ने अपने कोप से गोवर्धन क्षेत्र को बहाना चाहा उस समय लोठा जी पहाड़ के इस अंतिम छोर पर बैठे थे। भगवान श्री कृष्ण के प्रयास से भी वह पर्वत उठ नहीं रहा था।

श्री कृष्ण सब समझ गए और उन्होंने लोठा जी की शक्ति की सराहना की और उन्हें वरदान दिया कि इस स्थान पर उनकी पूजा की जाएगी। भगवान के आग्रह से वे उठ गए। तब से वे भगवान को अपने छोटे भाई की तरह मानने लगे। आज वहां पर उनका देवमंदिर यहां स्थित है। इस स्थान से परिक्रमा मार्ग वापसी की ओर लौटता है। बड़े होने के कारण सभी उन्हें श्री कृष्ण का बड़ा भाई मानते थे। 

एक बार लोठा बाबाश्री कृष्ण के मित्र होने के नाते उनके साथ लुका-छिपी खेल रहे थे। इस बार कृष्ण के ढूंढने की बारी थी और लोठा बाबा  ने उन्हें पूछरी में छिपा दिया। इसी बीच उनके कुछ अन्य दोस्तों ने लोठा बाबा को अपने साथ खेलने के लिए बुला लिया। लोठा बाबा अपने चरवाहे दोस्तों के साथ खेलने में भूल गए कि कृष्ण उनकी प्रतीक्षा कर रहे होंगे।

इस पर लोठा जी ने उनसे माफी मांगी और अन्य साथियों के साथ खेलने में शामिल हो गए। कृष्ण जी उनसे नाराज हो गए तो उन्होंने उनसे बादा लिया कि वह अब उन्हें इस प्रकार कभी प्रतीक्षा नहीं करवाएंगे। 
परंतु समय बीता कहानी पलटी और आज लोठा बाबा उनसे अलग होने का दंड पा रहे हैं। प्रभु के लिए अपनी भक्ति सेवा के लिए उन्होंने अपने पूरे जीवन को उनकी प्रतीक्षा मे लगा दिया।

कैसे कहलाए लौठा जी

लौठा जी भगवान श्री कृष्ण के परम मित्र थे। भगवान कृष्ण और बलराम ब्रज अक्रूर जी के साथ ब्रज छोडकर जा रहे थे तो श्री कृष्ण ने अपने मित्र लौठा जी को अपने साथ चलने को कहा परंतु लौठा जी ने उनके साथ जाने से मना कर दिया।

मैं समझ गया भगवान आप मुझे बचपन की उस भूल का बदला ले रहे हैं। जब मैं आप को छुपा कर भूल गया था । आप तो जानते ही हैं कि मैं आपके दर्शनों के बिना नहीं रह सकता ।

उसी गलती के सजा देने के लिए आज आप छिपने के लिए मथुरा जा रहे हैं ताकि मैं आपके दर्शन न कर पाऊं।

अतः आप मुझसे उस गलती का बदला ले रहे हैं जिसके लिए मैं आपसे माफी मांग चुका हूं।

भगवान कृष्ण बोले नहीं इसीलिए तो मैं आपको अपने साथ ले जाने के लिए आया हूं । आप मेरे बड़े भाई के समान हैं और उन्हीं की तरह आपका सम्मान करता हूं।

इस पर लोठा जी बोले मैं कुछ नहीं जानता आपको मेरी खातिर एक दिन के लिए ही सही लौटना ही होगा। भगवान आपको लौटना ही होगा।

जब तक आप वापिस ब्रज नहीं आते तब तक मैं अन्न जल ग्रहण नहीं करूंगा और बिना अन्न जल के अपने प्राण त्याग दुंगा।

          इस पर श्री कृष्ण ने उन्हे वरदान दिया और कहा कि सखातुम्हे कुछ नहीं होगा। तुम बिना अन्न-जल के भी स्वस्थ और जीवित रहोगे। भगवान कृष्ण के जाने के बाद लौठाजी तपस्या में लीन हो गए। लौठा जी को यकीन था कि भगवान वापिस जरूर आयेंगें। भक्तों का ऐसा विश्वास है कि लौठाजी आज भी बिना खाये-पिये तपस्या में लीन हैं और भगवान उनसे मिलने यहाँ आते रहते हैं। इस प्रकार अंततः यहाँ श्री लौठा जी का मन्दिर स्थापित किया गया। भक्त यहाँ आकर अद्भुत शांति का अनुभव करते हैं। यह मन्दिर एक भक्त की अनूठी श्रद्धा का प्रतीक है।

इनके बारे में कहा भी जाता है कि
धनि-धनि पूंछरी के लौठा। धनि-धनि पूंछरी के लौठा।
अन्न खाय न पानी पीवै ऐसेई पड़ौ सिलौठा।

परिक्रमा की हाजिरी

पूछरी का लौठा में लौठा जी के दर्शन करना अनिवार्य माना गया हैं क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि यहाँ दर्शन करने से किसी के परिक्रमा करने की पुष्टि हो जाती है। यहाँ दर्शन को परिक्रमा की अर्जी या हाजरी लागाने के समान माना जाता है। अतः कुछ छण यहाँ बैठकर कर या रूककर गिरिराज जी का ध्यान अवश्य करना चाहिए ताकि आपकी परिक्रमा की हाजिरी लग सके।


इस हाजिरी के पीछे भी एक कहानी है उसके अनुसार जब भगवान मथुरा छोड़कर द्वारिका चले गए और उसके बाद जब वे यहां आए तो उन्होंने लोठा जी से मिलने का विचार किया। जिन्हें वे पूछरी में स्थापित कर गए थे । 

जब वे वहां पहुंचे तो लोठा जी ने पूछा , –'भगवन ! मेरा क्या काम है ?' तो उन्होंने कहा कि जो भी मेरे भक्त इस गोवर्धन की परिक्रमा लगाएंगे उनकी हाजिरी आपको लगानी है। इस पर लोठा जी ने कहा,– 'महाराज ! यह तो ठीक है। लेकिन यदि में भूख प्यास या नित्य कर्म आदि के लिए यहां से उठकर गया और आपके भक्त पीछे से निकल गए और उनकी हाजिरी नहीं लगी तो वह आपको दोष देंगे ।' 

इस पर भगवान कृष्ण ने कहा – 'ठीक है । आज से तुम भूख प्यास त्याग कर इस स्थान पर निवास करोगे और जो भी यहां आएगा और आपके चरणों में ध्यान लगाएगा तो वह मुझ में ही ध्यान लगाएगा और उसकी हाजिरी पूर्ण मानी जाएगी।'
इस प्रकार कहकर वे यहां से द्वारका के लिए लौट गए और यह परिक्रमा का सबसे अंतिम छोर है और यहां से परिक्रमा पुनः घूम जाती है अर्थात लौट जाती है, इसीलिए भी इसे लौटा जी नाम दिया गया। ऐसा कहा जाता है।

वास्तव में कौन हैं 'पूंछरी के लौठा' जी ?
 
यहां पहलवान को 'लौठा' कहा जाता है। यहां मंदिर में श्री हनुमानजी का विग्रह स्थापित है। प्राचीन कथा के अनुसार जब श्री रामचंद्र जी को समुद्र पर पुल बांधने के लिए पहाड़ पर्वत और सेनाओं की आवश्यकता हुई तो वे गिर्राज जी को लेकर आ रहे थे और यहां आते आते उन्हें भगवान श्रीराम का मानसिक आदेश मिला कि पुल पूरा हो चुका है जिसे ला खंड को आप लेकर आ रहे हैं उसे वही रख दीजिए। 

इस प्रकार वे ब्रज मंडल में गिर्राज जी को स्थापित करके भगवान श्री राम की सहायता के लिए चले गए।
इसके ब्रांच महाभारत युद्ध में भी इन्होंने भगवान श्री कृष्ण का अप्रत्यक्ष रूप से सहायता की थी और जब वे

प्राचीन कथा के अनुसार जब भगवान कृष्ण गोवर्धन पर्वत के इस क्षेत्र में गोचारण के लिए आते थे । तब श्री हनुमानजी एक गोप के रूप में उनके साथ खेला करते थे। दोनों साथ-साथ भोजन व बातें किया करते थे। किंतु जब भगवान कृष्ण का बैकुंठ गमन का समय आया तो हनुमानजी उदास हो गए । क्योंकि हनुमानजी अमर हैं। भगवान राम के माता भगवान कृष्ण जी का साथ छोड़ने जा रहे थे।

उनके विरह में दु:खी होकर वे कहने लगे कि आप तो अपने धाम जा रहे हो लेकिन मैं अकेला हो जाऊंगा, 
 
हनुमानजी की इस बात पर भगवान कृष्ण ने उन्हें विश्वास  दिलाया कि कलियुग में इस गिरिराज गोवर्धन को मेरा साक्षात स्वरूप मानकर परिक्रमा की जाएगी और यह परिक्रमा तभी पूर्ण मानी जाएगी, जब आप स्वयं इसकी साक्ष्य देंगे। अर्थात यहां आकर उन्हें हाजिरी लगानी होगी।

आपके दर्शनों के बिना गोवर्धन परिक्रमा पूर्ण नहीं मानी जाएगी, इससे आपके पास सदैव मेरे भक्तों की चहल-पहल रहा करेगी।
 
प्रत्येक श्रद्धालु व भक्त जाने अनजाने लोटा जी के दर्शन करके आप उन्हें अपना साक्ष्य देते हैं अर्थात अपनी हाजिरी लगावाते हैं। 

इस प्रकार हम पाते हैं कि लोटा जी कोई और नहीं है भगवान श्री हनुमान है जो अजर और अमर होने के कारण इस गिरिराज पर्वत पर विराजमान हैं और उनके भक्तों में श्रीहरि को खोज कर आनंदित और प्रसन्न होते हैं।



                            लेखक







ब्रज चौरासी कोस यात्रा

.                    "ब्रज चौरासी कोस यात्रा"           ब्रज  चौरासी कोस की परिकम्मा एक  देत।           लख  चौरासी योनि  के  संकट ...