Tuesday, January 25, 2022

दशावतार और विज्ञान

🌳🦚💐💐दशावतार और विज्ञान💐💐🌳🦚


       एक माँ अपने पूजा-पाठ से फुर्सत पाकर अपने विदेश में रहने वाले बेटे से विडियो चैट करते वक्त पूछ बैठीं..

*"बेटा! कुछ पूजा-पाठ भी करते हो या नहीं?"*

बेटा बोला-

"माँ, मैं एक जीव वैज्ञानिक हूँ । मैं अमेरिका में मानव के विकास पर काम कर रहा हूँ। विकास का सिद्धांत, चार्ल्स डार्विन.. क्या आपने उसके बारे में सुना भी है?"

उसकी माँ मुस्कुरा कर बोली-
"मैं डार्विन के बारे में जानती हूँ बेटा.. उसने जो भी खोज की, वह वास्तव में सनातन-धर्म के लिए बहुत पुरानी खबर है।"
“हो सकता है माँ!” बेटे ने भी व्यंग्यपूर्वक कहा।
“यदि तुम कुछ होशियार हो, तो इसे सुनो..” उसकी माँ ने प्रतिकार किया। “क्या तुमने दशावतार के बारे में सुना है? विष्णु के दस अवतार?”
बेटे ने सहमति में कहा-
"हाँ! पर दशावतार का मेरी रिसर्च से क्या लेना-देना?"
माँ फिर बोली-
"लेना-देना है.. मैं तुम्हें बताती हूँ कि तुम और मि. डार्विन क्या नहीं जानते हैं?"
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“पहला अवतार था 'मत्स्य', यानि मछली। ऐसा इसलिए कि जीवन पानी में आरम्भ हुआ। यह बात सही है या नहीं?”
बेटा अब ध्यानपूर्वक सुनने लगा..
“उसके बाद आया दूसरा अवतार 'कूर्म', अर्थात् कछुआ। क्योंकि जीवन पानी से जमीन की ओर चला गया.. 'उभयचर (Amphibian)', तो कछुए ने समुद्र से जमीन की ओर के विकास को दर्शाया।”
“तीसरा था 'वराह' अवतार, यानी सूअर। जिसका मतलब वे जंगली जानवर, जिनमें अधिक बुद्धि नहीं होती है। तुम उन्हें डायनासोर कहते हो।”
बेटे ने आंखें फैलाते हुए सहमति जताई..

“चौथा अवतार था 'नृसिंह', आधा मानव, आधा पशु। जिसने दर्शाया जंगली जानवरों से बुद्धिमान जीवों का विकास।”
“पांचवें 'वामन' हुए, बौना जो वास्तव में लंबा बढ़ सकता था। क्या तुम जानते हो ऐसा क्यों है? क्योंकि मनुष्य दो प्रकार के होते थे- होमो इरेक्टस(नरवानर) और होमो सेपिअंस (मानव), और होमो सेपिअंस ने विकास की लड़ाई जीत ली।”
बेटा दशावतार की प्रासंगिकता सुन के स्तब्ध रह गया..

माँ ने बोलना जारी रखा-
“छठा अवतार था 'परशुराम', जिनके पास शस्त्र (कुल्हाड़ी) की ताकत थी। वे दर्शाते हैं उस मानव को, जो गुफा और वन में रहा.. गुस्सैल और असामाजिक।”
“सातवां अवतार थे 'मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम', सोच युक्त प्रथम सामाजिक व्यक्ति। जिन्होंने समाज के नियम बनाए और समस्त रिश्तों का आधार।”
“आठवां अवतार थे 'भगवान श्री कृष्ण', राजनेता, राजनीतिज्ञ, प्रेमी। जिन्होंने समाज के नियमों का आनन्द लेते हुए यह सिखाया कि सामाजिक ढांचे में रहकर कैसे फला-फूला जा सकता है।”
बेटा सुनता रहा, चकित और विस्मित..

माँ ने ज्ञान की गंगा प्रवाहित रखी -
“नवां अवतार थे 'महात्मा बुद्ध', वे व्यक्ति जिन्होंने नृसिंह से उठे मानव के सही स्वभाव को खोजा। उन्होंने मानव द्वारा ज्ञान की अंतिम खोज की पहचान की।”
“..और अंत में दसवां अवतार 'कल्कि' आएगा। वह मानव जिस पर तुम काम कर रहे हो.. वह मानव, जो आनुवंशिक रूप से श्रेष्ठतम होगा।”
बेटा अपनी माँ को अवाक् होकर देखता रह गया..

अंत में वह बोल पड़ा-
“यह अद्भुत है माँ.. हिंदू दर्शन वास्तव में अर्थपूर्ण है!”

*प्रकृति के तीन नियम, जो शाश्वत  है !!*

*1.)* प्रकृति का पहला नियम यदि खेत में बीज न डालें जाएं, तो कुदरत उसे *घास-फूस* से भर देती है! ठीक उसी तरह से दिमाग में अगर *सकारात्मक* विचार न भरे जाएँ, तो *नकारात्मक* विचार अपनी जगह बना ही लेते हैं !! 

*2.)* प्रकृति का दूसरा नियम जिसके पास जो होता है, वह वही बांटता है !
• सुखी *सुख* बांटता है !
• दुःखी *दुःख* बांटता है !
• ज्ञानी *ज्ञान* बांटता है !
• भ्रमित *भ्रम* बांटता है !
• भयभीत *भय* बांटता हैं !

*3.)* प्रकृति का तीसरा नियम आपको जीवन में जो भी मिले, उसे *पचाना* सीखो क्योंकि -
• *भोजन* न पचने पर, रोग बढ़ते हैं!
• *पैसा* न पचने पर, दिखावा बढ़ता है!
• *बात* न पचने पर, चुगली बढ़ती है!
• *प्रशंसा* न पचने पर, अंहकार  बढ़ता है!
• *निंदा* न पचने पर, दुश्मनी बढ़ती है!
• *राज़* न पचने पर, खतरा बढ़ता है!
• *दुःख* न पचने पर, निराशा बढ़ती है!
• *सुख* न पचने पर, पाप बढ़ता हैं!
 *यही जीवन के सत्य हैं*🌹🙏🌹🙏🌹

वृंदावन परिक्रमा (vrindavan parikrama )


वृंदावन की परिक्रमा के बारे में जानने से पहले एक बात हम सभी को जान लेनी चाहिए कि भारतीय संस्कृति समय-समय पर हमें अध्यात्म से जोड़ने की बात करती है। अध्यात्म हमारे मन को पवित्र बनाता है और हमें एक शक्ति देता है जिससे हम जीवन की हर कठिनाई से लड़ सके और प्रेम के साथ जीवन का निर्वाह कर सकें। वृंदावन की परिक्रमा( vrindavan parikrama) अध्यात्म से जुड़ी परिक्रमा है भक्त और भगवान से जुड़ी हुई परिक्रमा है। आज हम वृंदावन की परिक्रमा के बारे में जानेंगे क्यों यह अपनी जगह पर महत्वपूर्ण रखता है क्यों इस पीढ़ी को और आने वाली पीढ़ी को इसके महत्व की गहराई को समझना चाहिए। vrindavan parikrama in hindi

“जानकारी अच्छी लगे तो सभी से शेयर जरूर करे क्युकी आज हमारी खोती हुई भारतीय संस्कृति जो विरासत में मिली उसको को प्रसार की जरुरत है जिससे आने वाली पीढ़ियों तक इसकी चमक पहुंच सके। और अपनी मातृभाषा हिंदी पे हमेशा गर्व कीजिये और इसका सम्मान-प्रसार जरूर कीजिये। “


वृंदावन परिक्रमा क्या है?:-

वृंदावन परिक्रमा को पंचकोसी परिक्रमा भी कहा जाता है। वृंदावन की परिक्रमा भक्तों के लिए वृंदावन परिक्रमा है। वृन्दावन जो श्री कृष्णा की बाल लीलाओ से भरा है। श्री राधा कृष्ण की दिव्य प्रेम लीला स्थली से परिपूर्ण है। जहाँ गोप गोपियों और ग्वाल वाल के साथ श्री कृष्णा ने बचपन में क्रीड़ा किया और अनन्य प्रसिद्द मंदिरो का संगम है। अगर कोई वृन्दावन के किसी भी प्रसिद्द स्थली परिक्रमा शुरू करे और इन सभी वृन्दावन की श्री कृष्णा की लीला और पारौणिक स्थान के चारो तरफ के मार्ग पे चलकर वापस उसी स्थान पे आ जाता है। तो उसे वृन्दावन परिक्रमा (vrindavan parikrama) कहते है। जो की पंचकोसी परिक्रमा है। इसे युगल सरकार (राधा-कृष्ण का एक मिश्रित रूप ) या साक्षात् राधा कृष्ण की परिक्रमा भी कहते है।

वृन्दावन परिक्रमा कब की जाती है ?

वृंदावन परिक्रमा, वृंदावन, उत्तर प्रदेश, भारत में आमतौर एकादशी पर किया जाता है। वैसे एक भक्त अपने भगवान की जब चाहे परिक्रमा कर सकता है। भक्ति भाव के लिए कोई दिन नहीं अपितु आपके भाव की निर्मलता जरुरी होती है। वृन्दावन बिहारी को सिर्फ आपका प्रेम भाता है। भक्त 10 किलोमीटर (6 मील) लंबी परिक्रमा पथ पर आते हैं। वृंदावन के चारों ओर परिक्रमा करने के लिए दो से तीन घंटे लगते हैं।


ग्रंथ में वृन्दावन परिक्रमा का वर्णन :-

भविष्य पुराण में वृंदावन की परिक्रमा पांच कोस की बताई गई है। वराह संहिता में रास स्थली वृंदावन की परिधि एक योजना बताई गई है। किंतु वृंदावन की वर्तमान परिक्रमा साढ़े 3 कोस की है। वर्तमान परिक्रमा प्राय सूर्य घाट से प्रारंभ होती है। यह परिक्रमा नंगे पांव करना जरूरी है। अनंत गुना फल इसका प्राप्त होता है।

वृंदावन PARIKRAMA मार्ग:-

यह रास्ता बांके बिहारी जी मंदिर से एक सड़क पर है।या आप इसे कालिया घाट से शुरू कर सकते है। न समझ ए तो किसी वृन्दावन वासी संत से या निवासी से आप सहज पूछ सकते है। सब वहाँ बहुत ही सरल सवभाव के है। वृंदावन परिक्रमा में आमतौर पर दो से तीन घंटे लगते हैं। परिक्रमा पथ 10 किमी (6 मील) है। रास्ते में गुजरने वाले कुछ स्थान हैं: यमुना जी के तट पर मदन टेर, कालिया घाट, मदना मोहना मंदिर, इमली ताला, श्रृंगारा वट, और केशी घाट, यमुना महारानी आदि, फिर शेष घाट से धीरा समीरा, टटिया स्थन आदि।

श्री वृन्दावन सो वन नहीं, श्री नंदगाँव सो गाँव ||

श्री बंसीवट सो वट नहीं, श्री कृष्ण नाम सो नाम ||.


परिक्रमा में बारह वन (वन) और चौबीस उपवन (उपवन) शामिल हैं।:-

बारह वन हैं:-

  1. बाहुलवन
  2. बेलवन,
  3. भद्रवन,
  4. भंडिरावन,
  5. कामवन,
  6. खदिरवन,
  7. कुमुदवन,
  8. लोहवन,
  9. महावन,
  10. मधुवन,
  11. तलवन
  12. और वृंदावन

चौबीस उपवन (उपवन) :-

  1. बद्री,
  2. अजनोक,
  3. अरिंग,
  4. बरसाना,
  5. बछावन,
  6. बिल्छू,
  7. दधिग्राम,
  8. गंधर्ववन,
  9. गोकुल,
  10. गोवर्धन,
  11. करहला,
  12. केलवन,
  13. कोकिलावन,
  14. कोटवन,
  15. चटाई,
  16. नंदग्राम,
  17. पारसोली,
  18. परमदरा,
  19. पिसाया,
  20. रावल,
  21. साकेत,
  22. श्रीसाई,
  23. श्रीसाई।
  24. निधिवन

कुछ महत्वपूर्ण मंदिर, वन और घाट जो की परिक्रमा मार्ग पे देखने को मिलते है।

  • कृष्ण बलराम मंदिर
  • गौतम ऋषि का आश्रम
  • वराह घाट
  • मोहना टेर
  • कालिया घाट
  • मदन मोहन मंदिर
  • इमली ताल
  • श्रृंगारा वट
  • केशी घाट
  • टेकरी रानी मंदिर
  • जगन्नाथ मंदिर, जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा के देवताओं के साथ
  • चैतन्य महाप्रभु मंदिर

परिक्रमा के मार्ग के साथ कई अन्य मंदिर और मूर्तियाँ हैं, जिनमें से कुछ मुगल हमले के दिनों से टूटी-फूटी स्थिति में हैं। परिक्रमा के अंत में, देवता और यमुना के तट पर जलाए जाने वाले दीपक की प्रार्थना की जाती है।

वृंदावन के छह गोस्वावृंदावन को फिर से परिभाषित करने का श्रेय इन गोस्वामियों को जाता है, जिन्हें वृंदावन के छह गोस्वाम कहा जाता है, जिनके बारे में व्यापक शोध किया गया है। और किताबें प्रकाशित हुई हैं। चर्मपत्र के पत्तों पर लिखे गए छह में से कुछ मूल लेखन को वृंदावन अनुसंधान संस्थान में संरक्षित और प्रदर्शित किया गया है।

वृंदावन परिक्रमा के नियम:-

  • वृंदावन परिक्रमा प्रेम भक्ति भाव समर्पण की परिक्रमा है .
  • यहां पर हर एक पग श्री कृष्ण को श्री राधे नाम को सुमिरन करते हुए रखनी चाहिए।
  • उनसे हर श्वास पे एक ही विनती करनी चाहिए उनके चरण कमलों की भक्ति मिले और हमारा मन हमेशा निर्मल भाव से भरा रहे। हमसे कभी भी किसी का अहित ना हो जीवन में।
  • परिक्रमा मार्ग पर मंत्र जाप करते हुए चलना चाहिए
  • याद रहे परिक्रमा मार्ग पर आप से किसी का अपमान ना हो।
  • परिक्रमा मार्ग में परिक्रमा करते समय हमें कुछ खाना नहीं चाहिए
  • परिक्रमा नंगे पांव करें अगर आप कर सकते हैं तो
  • क्योंकि ब्रजराज आपके चरणों पर जब-जब ब्रजराज आपके पैरो को स्पर्श होगा आपको भक्ति-आनंद का अनुभव होगा।
  • परिक्रमा करते समय आसपास के जितने दिव्य स्थल पड़ते है उनको प्रणाम जरूर करे।
  • आज वृन्दावन का थोड़ा आधुनिक स्वरुप हो गया है उसे देख कर परिक्रमा करते समय यह बिल्कुल नहीं सोचना चाहिए कि वृंदावन मैं पहले जैसी बात नहीं बस हमेशा याद रखें वृंदावन प्रेम की भक्ति की भूमि है। अगर आपका मन सच्चा है तो वृंदावन बिहारी आपको इस वृंदावन में 1 दिन दिव्य वृंदावन का दर्शन जरूर करवाएंगे .
  • राधे राधे नाम का जितना हो सके उच्चारण जरूर करे।

वृन्दावन प्रथम बार :-

अगर आप वृन्दावन प्रथम बार आए हैं पहली बार आए हैं तो आपको वृंदावन की महिमा के बारे में जरूर जाना चाहिए वृंदावन के प्रसिद्ध मंदिर के बारे में जरूर जाना चाहिए। यहां पर जितने भी मंदिर है उनका श्री कृष्ण से नाता है वह उनकी लीला को सुमिरन करते हुए बनाया गया है। जिस जगह श्री कृष्ण ने जो लीला की थी उस लीला से को ध्यान में रखकर कई युगों पहले इन मंदिरों की नींव रखी गई जिससे कि आने वाली पीढ़ी इसके महत्व को समझ सके श्री कृष्ण के जीवन के अनमोल ज्ञान भक्ति को फिर से जी सकें और उससे प्रेम भक्ति को प्राप्त कर अपने जीवन को निर्मल बना सकें। सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करने के लिए यहाँ क्लिक करे वृंदावन

नोट : अगर आप कुछ और जानते है या इसमें कोई त्रुटि है तो सुझाव और संशोधन आमंत्रित है।

वृंदावन परिक्रमा कब की जाती है?

आमतौर एकादशी पर किया जाता है। वैसे एक भक्त अपने भगवान की जब चाहे परिक्रमा कर सकता है।

वृंदावन परिक्रमा कितने किलोमीटर की है?

Approx 10Km

वृंदावन परिक्रमा route क्या है ?

बांके बिहारी जी मंदिर से एक सड़क से या आप इसे कालिया घाट या इस्कॉन मंदिर से शुरू कर सकते।

वृंदावन परिक्रमा के लाभ क्या है ?

राधे -कृष्ण के युगल चरणों की भक्ति प्राप्त होती है। बाकि आपकी जो निर्मल कामना होगी उसकी पूर्ति होगी।


🐚वृन्दावन धाम की महिमा🐚


🌹विश्व के सभी स्थानों में श्री धाम वृन्दावन का सर्वोच्च स्थान माना गया है। वृन्दावन का आध्यात्म अर्थ है- "वृन्दाया तुलस्या वनं वृन्दावनं" तुलसी का विषेश वन होने के कारण इसे वृन्दावन कहते हैं।

 🌹वृन्दावन ब्रज का हृदय है जहाँ प्रिया-प्रियतम ने अपनी दिव्य लीलायें की हैं। इस दिव्य भूमि की महिमा बड़े-बड़े तपस्वी भी नहीं समझ पाते। ब्रह्मा जी का ज्ञान भी यहाँ के प्रेम के आगे फ़ीका पड़ जाता है। 

🌹वृन्दावन रसिकों की राजधानी है यहाँ के राजा श्यामसुन्दर और महारानी श्री राधिका जी हैं। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि वृन्दावन का कण-कण रसमय है। 

 🌹सभी धामों से ऊपर है ब्रज धाम और सभी तीर्थों से श्रेष्ठ है श्री वृन्दावन।

 🌺इसकी महिमा का बखान करता एक प्रसंग--

-🌹भगवान नारायण ने प्रयाग को तीर्थों का राजा बना दिया। अतः सभी तीर्थ प्रयागराज को कर देने आते थे। 

एक बार नारद जी ने प्रयागराज से पूँछा-

🌹"क्या वृन्दावन भी आपको कर देने आता है?" तीर्थराज ने नकारात्मक उत्तर दिया। तो नारद जी बोले-"फ़िर आप तीर्थराज कैसे हुए।" 

🌹इस बात से दुखी होकर तीर्थराज  भगवान के पास पहुँचे। भगवान ने प्रयागराज के आने का कारण पूँछा। तीर्थराज बोले-"प्रभु! आपने मुझे सभी तीर्थों का राजा बनाया है। सभी तीर्थ मुझे कर देने आते हैं, लेकिन श्री वृन्दावन कभी कर देने नहीं आये। अतः मेरा तीर्थराज होना अनुचित है।

🌹"भगवान ने प्रयागराज से कहा-

"तीर्थराज! मैंने तुम्हें सभी तीर्थों का राजा बनाया है। अपने निज गृह का नहीं। वृन्दावन मेरा घर है। यह मेरी प्रिया श्री किशोरी जी की विहार स्थली है। वहाँ की अधिपति तो वे ही हैं। मैं भी सदा वहीं निवास करता हूँ। वह तो आप से भी ऊपर है।


🌹एक बार अयोध्या जाओ, दो बार द्वारिका

तीन बार जाके त्रिवेणी में नहाओगे।

चार बार चित्रकूट,नौ बार नासिक,बार-बार जाके बद्रिनाथ घूम आओगे॥

🌹कोटि बार काशी,केदारनाथ रामेश्वर, 

गया-जगन्नाथ, चाहे जहाँ जाओगे।

होंगे प्रत्यक्ष जहाँ दर्शन श्याम श्यामा के, 

वृन्दावन सा कहीं आनन्द नहीं पाओगे॥


🌹कोई भी अनुभव कर सकता है कि वृन्दावन की सीमा में प्रवेश करते ही एक अदृश्य भाव, एक अदृश्य शक्ति हृदय स्थल के अन्दर प्रवेश करती है और वृन्दावन की परिधि छोड़ते ही यह दूर हो जाती है।

🌹इसमें जो वास करता है, भगवान की गोदी में ही वास करता है। परन्तु, श्री राधारानी की कृपा से ही यह गोदी प्राप्त होती है।

 🌺"कृपयति यदि राधा बाधिता शेष बाधा"🌺

 🌹वृहद्गौतमीयतन्त्र में भगवान ने अपने श्रीमुख से यहाँ तक कहा है कि यह रमणीय वृन्दावन मेरा गोलोक धाम ही है- 

🌺"इदं वृन्दावनं रम्यं मम धामैव केवलम"🌺

🌹तो व्रज की महारानी श्री राधारानी हम पर ऐसी कृपा करें कि हमें श्रीवृन्दावन धाम का वास मिले। श्रीवृन्दावन धाम मे वास प्राप्त करने के लिए सदैव सतत जपिए।

        *🙏जय श्री राधा कृष्ण🙏*



🥊 राधाटीला 🥊

🌹 ये वृन्दावन परिक्रमा मार्ग में ठाकुर जी का लीला स्थान है l अगर आप विशुद्ध भाव के साथ यहां आते हैं तो आप भी अपने रोम-रोम में  दिव्याता को पाएंगे। साधना करते विरक्त संतों के अनुभवों को आत्मसात करने में जरा भी संकोच न होगा जो कहते हैं, “यहां राधा रहती है।” शांति के इस धाम में बिहारी विहारिणी का सरस वृंदावन बसता है। संतों ने इस स्थान की पावनता, रमणीयता और दिव्या को भीड़-भाड़ और प्रचार-प्रसार से बचाए रखा है। राधा टीला हरिदासी संप्रदाय की छोटी गद्दी है।

☘ वृंदावन में रोज 4:00 बजे राधा टीला में दाना डाला जाता है और  ...यहाँ आप हजारो की संख्या में कई सारे तोते, मोर, और बहुत ही अद्भुत पक्षियों के दर्शन कर सकते हैं, और वो कोई साधारण पक्षी नही होते हैं वो सभी श्यामा जू के भक्त होते हैं।

☘ कहते है राधाटीला में आज भी यहाँ श्यामा श्याम जूँ लीला करने पधारते है l इसलिये निधीवन और सेवा कुँज की तरह संध्या के बाद यहाँ के दर्शन भी बंद कर दिये जाते है l  कहते है दिन के समय श्यामा श्याम जी पेड का रूप धारण कर लेते है और संध्या में पुनः अपने स्वरूप में प्रकट होते है l आज भी हम ये दर्शन राधाटीला में कर सकते है.. वहाँ एक ही जड से निकले हुए है दो पेड है,  एक जड में से निकले हुये होने के बावजुद भी एक पेड सफेद और एक पेड श्याम वर्ण का है l……… जो स्वयं श्यामा श्याम जी है l

☘ कहते है एक लीला यहाँ यह हुई थी कि एक समय जब श्यामा श्याम जी जब रास कर रहे थे तो ठाकुर जी के भक्त गोपीयों को भुख लगने लगी l तब वहाँ खीर का भोग तो था पंरतु सभी खीर खाये कैसे.??

तब कान्हा जी ने एक पेड के पत्ते को लिया और उसे दोने का आकार दिया ( दोने:- वो जो पत्ते का होता है और प्रसाद वितरण के लिये उपयोग किया जाता है...) फिर सभी ने मिलकर ठाकुर जी के व्दारा बनाये हुये दोनो में खीर ग्रहण कर अपनी भुख शांत की l ठाकुर जी की लीला वश आज भी उस पेड में दोने के आकार में पत्ते आते है l ये दर्शन हम राधाटीला में कर सकते है l 🌹
🙏 #जय_श्री_कृष्ण, #हरि_शरणम् , #प्रेम_से_बोलो_राधे_राधे 🌹


💞 शुद्ध हृदय.......💞

🌷"वृंदावन" में एक भक्त रहते थे जो स्वभाव से बहुत ही भोले थे। उनमे छल, कपट, चालाकी बिलकुल नहीं थी। बचपन से ही वे "श्री वृंदावन" में रहते थे,

 *🌷श्री कृष्ण* स्वरुप में उनकी अनन्य निष्ठा थी और वे भगवान् को अपना सखा मानते थे। बहुत शुद्ध आत्मा वाले थे, जो मन में आता है, वही भगवान से बोल देते है ।

🌷 वो भक्त कभी "वृंदावन" से बाहर गए नहीं थे। एक दिन भोले भक्त जी को कुछ लोग "श्री जगन्नाथ पुरी" में भगवान् के दर्शन करने ले गए। पुराने दिनों में बहुत भीड़ नहीं होती थी। अतः वे सब लोग *श्री जगन्नाथ* भगवान् के बहुत पास दर्शन करने गए । 

🌷भोले भक्त जी ने श्री जगन्नाथजी का स्वरुप कभी देखा नहीं था उसे अटपटा लगा ।

उसने पूछा – ये कौन से भगवान् है ? 

🌷ऐसे डरावने क्यों लग रहे है ? 

 🌷सब पण्डा पूजारी लोग कहने लगे – ये भगवान् *श्री कृष्ण* ही है, प्रेम भाव में इनकी ऐसी दशा हो गयी है

 🌷जैसे ही उसने सुना – वो जोर जोर से रोने लग गया और ऊपर जहां भगवान् विराजमान हैं वहाँ जाकर चढ़ गया । सब पण्डा पुजारी देखकर भागे और उससे कहने लगे कि नीचे उतरो परंतु वह नीचे नहीं उतरा उसने भगवान् को आलिंगन देकर कहा – 

"🌷अरे *कन्हैया* ! ये क्या हालात बना रखी है तूने ? ये चेहरा कैसे फूल गया है तेरा , तेरे पेट की क्या हालत हो गयी है । यहां तेरे खाने पीने का ध्यान नहीं रखा जाता क्या ? मैं प्रार्थना करता हूं , तू मेरे साथ अपने ब्रज में वापस चल । मै दूध, दही , माखन खिलाकर तुझे बढ़िया पहले जैसा बना दूंगा , सब ठीक हो जायेगा तू चल ।

🌷पण्डा पुजारी उन भक्त जी को नीचे उतारने का प्रयास करने लगे , कुछ तो नीचे से पीटने भी लगे परंतु वह रो - रो कर बार - बार यही कह रहा था कि कन्हैया , तू मेरे साथ "ब्रज" में चल , मै तेरा अच्छी तरह ख्याल करूँगा । तेरी ऐसी हालत मुझसे देखी नहीं जा रही । 

🌷अब वहाँ गड़बड़ मच गयी तो भगवान् ने अपने माधुर्य *श्रीकृष्ण* रूप के उसे दर्शन करवाये और कहा – भक्तों के प्रेम में बंध कर मैंने कई अलग-अलग रूप धारण किये हैं, तुम चिंता मत करो । जो जिस रूप में मुझे प्रेम करता है मेरा दर्शन उसे उसी रूप में होता है , मै तो सर्वत्र विराजमान हूँ । 

🌷उसे *श्री जगन्नाथजी* ने समझा बुझाकर आलिंगन वरदान किया और आशीर्वाद देकर वृंदावन वापस भेज दिया । इस लीला से स्पष्ट है कि जिसमे छल कपट नहीं है। 

🌷जो *शुद्ध हृदय* वाला भोला भक्त है, 

उसे *भगवान् सहज मिल जाते है...जय जय श्री श्री राधेकृष्ण जी।🙏


ठाकुर जी का दर्शन कैसे करना चाहिए


भगवान् के सामने आँख मूँद के खड़े हो जाते हैं 

दर्शन नहीं - निहारो, ठाकुरजी को निहारो। चरण से लेकर मुख पर्यन्त और मुख से लेकर चरण पर्यन्त। बार-बार छवि को निहारो। 

जरुरी नहीं कि 10-15 मंदिरों में जाए, एक जगह दर्शन करो लेकिन निहारो और 

जब प्रेमपूर्वक ठाकुरजी को आप निहारने लग जाएंगे तो मंदिरों में ही नहीं आप के घर के ठाकुरजी में ही आपको विविध अनुभूतियाँ होने लगेगी ! 

कभी लगेगा हमारे ठाकुरजी आज थोड़े गंभीर हैं, कभी लगेगा आज थोड़े अनमने से हैं, कभी लगेगा नजर से नजर तो मिलती है लेकिन वे शरमा रहे हैं। और फिर तन्मयता बढ़ेगी तो वे बातचीत भी करने लगेंगे !


🙇🏻‍♂️!! श्री हरि !!🙇🏻‍♂️



वृंदावन के बंदर चार चीजों को छीनते हैं पर, क्यूं छीनते हैं आइये एक भाव दृष्टिपात करें।

1. चप्पल-जूते –

तो भैया वृंदावन में आए हो तो वृंदावन हमारे प्रियालालजू की नित्य क्रीडा स्थली है नित्य विहार स्थली हैं जहां श्यामा श्याम नंगे पैर विचरण करते हैं। अतः उस रज पर जूते चप्पल पहन कर नही चलना है यही संदेश बंदर देते हैं।


 2. चश्मे को छीनते हैं –

तो वृंदावन में पधारे प्यारे प्रेमियों वृंदावन को बाह्य नेत्रों से दर्शन करने की आवश्यकता नही है।

बाह्य नेत्र से कहीं गंदगी देखोगे कहीं अपशिष्ट देखोगे  और घृणा करोगे अपराध बनेगा।

अतः उस दिव्यतम श्री धाम वृंदावन का दर्शन अांतरिक नेत्रों से करो। दिव्य यमुना रसरानी जी का दर्शन करो।


3. मोबाइल –

भाव - अरे प्यारे भाइयों बडे-बडे योगी यति भी वृंदावन आने के लिए तरसते हैं।

श्रीजी की चरण रज बृज रज के लिए बड़े-बड़े देव तरसते हैं।


यथा पद में स्वामी हरिराम व्यास जी महाराज कहते हैं-

"जो रज शिव सनकादिक याचत सो रज शीश चढाऊं।"

तो वृंदावन मे आकर भी बाह्य जगत से संपर्क बनाने का क्या मतलब.?

तन वृंदावन में और मन कहाँ मोबाइल में,

अतः तन-मन दोनों को वृंदावन में केन्द्रित करें।


4. पर्स –

भाव- माया को साथ लेकर चलने की आवश्यकता नहीं है।

क्यूंकि यह भजन की भूमि है।

यहां पर्स दिखाने की आवश्यकता नहीं।

माला झोली पर्याप्त है।

अधिक वैभव प्रदर्शन करने की आवश्यकता नहीं।

क्यूंकि ये शुद्ध माधुर्य लीला की भूमि है।

प्रत्येक कण-कण प्रिया लाल जू के रस से आप्लावित है।


चूंकि भाव बहुत से हैं।

परंतु प्रमुख भावों पर चर्चा की।


तो ये बंदर कुछ संदेश देते हैं,

परंतु उनके साथ इस प्रकार का बर्ताव,

सर्वथा अनुचित एवं जघन्य अपराध है।


                 🌹 धन धन वृंदावन के बंदर  🌹


                    🌹जय जय श्री वृंदावन🌹


प्रश्न : *मंदिर में दर्शन के बाद बाहर सीढ़ी*

       *पर थोड़ी देर क्यों बैठा जाता है?*


     *उत्तर :* परम्परा हैं कि किसी भी मंदिर में दर्शन के बाद बाहर आकर मंदिर की पैड़ी या ऑटले पर थोड़ी देर बैठना चाहिए। क्या आप जानते हैं इस परंपरा का क्या कारण है ?

     यह प्राचीन परंपरा एक विशेष उद्देश्य के लिए बनाई गई है। वास्तव में मंदिर की पैड़ी पर बैठ कर एक श्लोक बोलना चाहिए। यह श्लोक आजकल के लोग भूल गए हैं। इस श्लोक का मनन करें और आने वाली पीढ़ी को भी बताएं। श्लोक इस प्रकार है

            *अनायासेन मरणम् ,*

            *बिना देन्येन जीवनम्।*

            *देहान्त तव सानिध्यम् ,*

            *देहि मे परमेश्वरम्॥*


     * इस श्लोक का अर्थ है*

  *अनायासेन मरणम्*

अर्थात् बिना तकलीफ के हमारी मृत्यु हो और कभी भी बीमार होकर बिस्तर पर न पड़ें, कष्ट उठाकर मृत्यु को प्राप्त ना हों चलते फिरते ही हमारे प्राण निकल जाएं।


 *बिना देन्येन जीवनम्*

अर्थात् परवशता का जीवन ना हो। कभी किसी के सहारे ना रहाना पड़े। जैसे कि लकवा हो जाने पर व्यक्ति दूसरे पर आश्रित हो जाता है वैसे परवश या बेबस ना हों। भगवान की कृपा से बिना भीख के ही जीवन बसर हो सकें।


  *देहांते तव सानिध्यम*

अर्थात् जब भी मृत्यु हो तब भगवान के सम्मुख हो। उनके दर्शन करते हुए प्राण निकले।


  *देहि में परमेशवरम्*

हे परमेश्वर ऐसा वरदान हमें देना।


    *भगवान से प्रार्थना करते हुऐ उपरोक्त श्र्लोक का पाठ करें। गाड़ी, पुत्र, पुत्री, पति, पत्नी, घर, धन इत्यादि (अर्थात् संसार) नहीं मांगना है, यह तो भगवान आप की पात्रता के हिसाब से खुद आपको देते हैं। इसीलिए दर्शन करने के बाद बैठकर यह प्रार्थना अवश्य करनी चाहिए। यह प्रार्थना है, याचना नहीं है। याचना सांसारिक पदार्थों के लिए होती है। जैसे कि घर, व्यापार,नौकरी, पुत्र, पुत्री, सांसारिक सुख, धन या अन्य बातों के लिए जो मांग की जाती है वह याचना है वह भीख है*।


     *'प्रार्थना' शब्द के 'प्र' का अर्थ होता है 'विशेष' अर्थात् विशिष्ट, श्रेष्ठ और 'अर्थना' अर्थात् निवेदन।* *प्रार्थना का अर्थ हुआ विशेष निवेदन*


     मंदिर में भगवान का दर्शन सदैव खुली आंखों से करना चाहिए, निहारना चाहिए। कुछ लोग वहां आंखें बंद करके खड़े रहते हैं। आंखें बंद क्यों करना, हम तो दर्शन करने आए हैं। भगवान के स्वरूप का, श्री चरणों का, मुखारविंद का, श्रृंगार का, संपूर्ण आनंद लें, आंखों में भर ले निज-स्वरूप को।

      दर्शन के बाद जब बाहर आकर बैठें, तब नेत्र बंद करके जो दर्शन किया हैं उस स्वरूप का ध्यान करें। मंदिर से बाहर आने के बाद, पैड़ी पर बैठ कर स्वयं की आत्मा का ध्यान करें तब नेत्र बंद करें और अगर निज आत्मस्वरूप ध्यान में भगवान नहीं आए तो दोबारा मंदिर में जाएं और पुन: दर्शन करें।

                                                                                                                                                                  🙏🙏


🌸🌸 कथा "ब्रज की माटी"🌸🌸


देवताओं ने व्रज में कोई ग्वाला कोई गोपी कोई गाय, कोई मोर तो कोई तोते के रूप में जन्म लिया।कुछ देवता और ऋषि रह गए थे।वे सभी ब्रह्माजी के पास आये और कहने लगे कि ब्रह्मदेव आप ने हमें व्रज में क्यों नही भेजा? आप कुछ भी करिए किसी भी रूप में भेजिए।ब्रह्मा जी बोले व्रज में जितने लोगों को भेजना संभव था उतने लोगों को भेज दिया है अब व्रज में कोई भी जगह खाली नहीं बची है। देवताओं ने अनुरोध किया प्रभु आप हमें ग्वाले ही बना दें ब्रह्माजी बोले जितने लोगों को बनाना था उतनों को बना दिया और ग्वाले नहीं बना सकते।देवता बोले प्रभु ग्वाले नहीं बना सकते तो हमे बरसाने को गोपियां ही बना दें ब्रह्माजी बोले अब गोपियों की भी जगह खाली नही है।देवता बोले गोपी नहीं बना सकते, ग्वाला नहीं बना सकते तो आप हमें गायें ही बना दें। ब्रह्माजी बोले गाएं भी खूब बना दी हैं।अकेले नन्द बाबा के पास नौ लाख गाएं हैं।अब और गाएं नहीं बना सकते।

देवता बोले प्रभु चलो मोर ही बना दें।नाच-नाच कर कान्हा को रिझाया करेंगे।ब्रह्माजी बोले मोर भी खूब बना दिए। इतने मोर बना दिए की व्रज में समा नहीं पा रहे।उनके लिए अलग से मोर कुटी बनानी पड़ी।


देवता बोले तो कोई तोता, मैना, चिड़िया, कबूतर, बंदर  कुछ भी बना दीजिए। ब्रह्माजी बोले वो भी खूब बना दिए, पुरे पेड़ भरे हुए हैं पक्षियों से।देवता बोले तो कोई पेड़-पौधा,लता-पता ही बना दें।

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ब्रह्मा जी बोले- पेड़-पौधे, लता-पता भी मैंने इतने बना दिए की सूर्यदेव मुझसे रुष्ट है कि उनकी किरने भी बड़ी कठिनाई से ब्रिज की धरती को स्पर्श करती हैं।देवता बोले प्रभु कोई तो जगह दें हमें भी व्रज में भेजिए।ब्रह्मा जी बोले-कोई जगह खाली नही है।तब देवताओ ने हाथ जोड़ कर ब्रह्माजी से कहा प्रभु अगर हम कोई जगह अपने लिए ढूंढ़ के ले आएं तो आप हम को व्रज में भेज देंगे।ब्रह्मा जी बोले हाँ तुम अपने लिए कोई जगह ढूंढ़ के ले आओगे तो मैं तुम्हें व्रज में भेज दूंगा। देवताओ ने कहा धुल और रेत कणो कि तो कोई सीमा नहीं हो सकती और कुछ नहीं तो बालकृष्ण लल्ला के चरण पड़ने से ही हमारा कल्याण हो जाएगा हम को व्रज में धूल रेत ही बना दे।ब्रह्मा जी ने उनकी बात मान ली।

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इसलिए जब भी व्रज जाये तो धूल और रेत से क्षमा मांग कर अपना पैर धरती पर रखे, क्योंकि व्रज की रेत भी सामान्य नही है, वो ही तो रज देवी - देवता एवं समस्त ऋषि-मुनि हैं...!!


जय श्रीराधे जी...🙏🙏


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ब्रज चौरासी कोस यात्रा

.                    "ब्रज चौरासी कोस यात्रा"           ब्रज  चौरासी कोस की परिकम्मा एक  देत।           लख  चौरासी योनि  के  संकट ...