Monday, November 16, 2020

श्री राधा कौन है?

श्री राधा कौन है?
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भक्ति प्रधान आचार्य और भगवान के अवतार देवर्षि नारदजी ने भगवान भूतभावन सदाशिव केश्री चरणों में सादर प्रणाम कर पूछा: “हे
महाभाग ! मैं आपका दास हूँ ।
बतलाइए कि, श्रीराधादेवी
लक्ष्मी हैं या देवपत्नी,
महालक्ष्मी हैं या सरस्वती हैं ?
क्या वे अंतरंगा विद्या हैं, या वैष्णवी प्रकृति हैं?
कहिए, वे वेदकन्या हैं, देवकन्या हैं अथवा मुनिकन्या हैं ?’’
सदाशिव बोले – “हे मुनिवर ! अन्य किसी लक्ष्मी की बात क्या कहें, कोटि-कोटि
महालक्ष्मी भी उनके चरण कमल की शोभा के
सामने तुच्छ कही जाती हैं।
हे नारद जी ! एक मुंह से मैं अधिक क्या कहूं? मैं तो श्रीराधा के रूप, लावण्य और गुण आदि का वर्णन करने मे अपने को असमर्थ पाता हूं । उनके रूप आदि की महिमा कहने में भी लज्जित हो रहा हूं।
तीनों लोकों में कोई भी ऐसा समर्थ नहीं है जो उनके रूपादि का वर्णन करके पारावार पा
सके । उनकी रूपमाधुरी जगत को मोहने वाले श्रीकृष्ण को भी सदा मोहित करने वाली है । यदि अनंत मुखो से चाहूं तो भी उनका वर्णन करने की मुझमें क्षमता नहीं है।”
जो मनुष्य निरंतर ‘राधा-राधा’ कहता है तथा राधारानी
का स्मरण करता है, वह सब तीर्थों के संस्कारो से युक्त होकर सब प्रकार की विद्याओं में कुशल बनता है।
जो राधा-राधा कहता है, राधा-राधा कहकर पूजा करता है,
श्रीराधा में जिसकी निष्ठा है, वह महाभाग श्रीधाम वृन्दावन में श्रीराधा की सहचरी होता 
है।
 
कृष्णभक्त वैष्णव सर्वदा अनन्यशरण होकर जब
श्रीराधा की भक्ति प्राप्त करता है तो सुखी, विवेकी और निष्काम हो जाता है।
श्रीराधा पूर्णतम पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण के प्राणों की
अधिष्ठात्री देवी हैं, इसलिए भगवान सदा इनके अधीन रहते हैं ।
यह संपूर्ण कामनाओं का राधन (साधन) करती हैं,
इसी कारण इन्हें श्रीराधा कहा गया है।
भगवान कृष्ण स्वयं कहते हैं, कि राधा उनकी आत्मा है, वह राधा में,और राधा उनमें बसती है !
♡श्री राधा राधा♡
♡श्री राधा राधा♡
♡श्री राधा राधा♡

गीता का मूलमंत्र

🌸  *गीता का मूलमंत्र*  🌸

🌸 *अध्याय १* 🌸
मोह ही सारे तनाव व विषादों का कारण होता है।

🌸 *अध्याय २* 🌸
शरीर नहीं आत्मा को मैं समझो और आत्मा अजन्मा-अमर है।

🌸 *अध्याय ३* 🌸
कर्तापन और कर्मफल के विचार को ही छोड़ना है, कर्म को कभी नहीं।

🌸 *अध्याय ४* 🌸
सारे कर्मों को ईश्वर को अर्पण करके करना ही कर्म संन्यास है।

🌸 *अध्याय ५* 🌸
मैं कर्ता हूँ- यह भाव ही अहंकार है, जिसे त्यागना और सम रहना ही ज्ञान मार्ग है।

🌸 *अध्याय ६* 🌸
आत्मसंयम के बिना मन को नहीं जीता जा सकता, बिना मन जीते योग नहीं हो सकता।

🌸 *अध्याय ७* 🌸
त्रिकालज्ञ ईश्वर को जानना ही भक्ति का कारण होना चाहिये, यही ज्ञानयोग है।

🌸 *अध्याय ८* 🌸
ईश्वर ही ज्ञान और ज्ञेय हैं- ज्ञेय को ध्येय बनाना योगमार्ग का द्वार है ।

🌸 *अध्याय ९* 🌸
जीव का लक्ष्य स्वर्ग नहीं ईश्वर से मिलन होना चाहिये ।

🌸 *अध्याय १०* 🌸
परम कृपालु सर्वोत्तम नहीं बल्कि अद्वितीय हैं।

🌸 *अध्याय ११* 🌸
यह विश्व भी ईश्वर का स्वरूप है, चिन्ताएँ मिटाने का प्रभुचिन्तन ही उपाय है।

🌸 *अध्याय १२* 🌸
अनन्यता और बिना पूर्ण समर्पण भक्ति नहीं हो सकती और बिना भक्ति भगवान् नहीं मिल सकते।

🌸 *अध्याय १३* 🌸
हर तन में जीवात्मा परमात्मा का अंश है- जिसे परमात्मा का प्रकृतिरूप भरमाता है, यही तत्व ज्ञान है।

🌸 *अध्याय १४* 🌸
प्रकृति प्रदत्त तीनों गुण बंधन देते हैं, इनसे पार पाकर ही मोक्ष संभव है ।

🌸 *अध्याय १५* 🌸
काया तथा जीवात्मा दोनों से उत्तम पुरुषोत्तम ही जीव का लक्ष्य हैं ।

🌸 *अध्याय १६* 🌸
काम-क्रोध-लोभ से छुटकारा पाये बिना जन्म-मृत्यु के चक्कर से छुटकारा नहीं मिल सकता ।

🌸 *अध्याय १७* 🌸
त्रिगुणी जगत् को देखकर दु:खी नहीं होना चाहिये, बस स्वभाव को सकारात्मक बनाने का प्रयास करना चाहिये ।

🌸 *अध्याय १८* 🌸
शरणागति और समर्पण ही जीव का धर्म है और यही है गीता का सार।
           
🙏🏻हरिॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु🙏🏻

बांके बिहारी जी का प्रकार

इस तरह प्रकट हुआ था वृंदावन के बांके बिहारी जी का विग्रह

वृंदावन में बांके बिहारी जी का एक भव्य मंदिर है। इस मंदिर में बिहारी जी की काले रंग की एक प्रतिमा है। इस प्रतिमा के विषय में मान्यता है कि इस प्रतिमा में साक्षात् श्री कृष्ण और राधा समाए हुए हैं। इसलिए इनके दर्शन मात्र से राधा कृष्ण के दर्शन का फल मिल जाता है।
इस प्रतिमा के प्रकट होने की कथा और लीला बड़ी ही रोचक और अद्भुत है इसलिए हर साल मार्गशीर्ष मास की पंचमी तिथि को बांके बिहारी मंदिर में बांके बिहारी प्रकटोत्सव मनाया जाता है। 

बांके बिहारी के प्रकट होने की कथा
संगीत सम्राट तानसेन के गुरू स्वामी हरिदास जी भगवान श्री कृष्ण के अनन्य भक्त थे। इन्होंने अपने संगीत को भगवान को समर्पित कर दिया था। वृंदावन में स्थित श्री कृष्ण की रासस्थली निधिवन में बैठकर भगवान को अपने संगीत से रिझाया करते थे।
भगवान की भक्त में डूबकर हरिदास जी जब भी गाने बैठते तो प्रभु में ही लीन हो जाते। इनकी भक्ति और गायन से रिझकर भगवान श्री कृष्ण इनके सामने आ जाते। हरिदास जी मंत्रमुग्ध होकर श्री कृष्ण को दुलार करने लगते। एक दिन इनके एक शिष्य ने कहा कि आप अकेले ही श्री कृष्ण का दर्शन लाभ पाते हैं, हमें भी सांवरे सलोने का दर्शन करवाएं।
इसके बाद हरिदास जी श्री कृष्ण की भक्ति में डूबकर भजन गाने लगे। राधा कृष्ण की युगल जोड़ी प्रकट हुई और अचानक हरिदास के स्वर में बदलाव आ गया और गाने लगे-
'भाई री सहज जोरी प्रकट भई, जुरंग की गौर स्याम घन दामिनी जैसे। प्रथम है हुती अब हूं आगे हूं रहि है न टरि है तैसे।। अंग अंग की उजकाई सुघराई चतुराई सुंदरता ऐसे। श्री हरिदास के स्वामी श्यामा पुंज बिहारी सम वैसे वैसे।।'
श्री कृष्ण और राधा ने हरिदास के पास रहने की इच्छा प्रकट की। हरिदास जी ने कृष्ण से कहा कि प्रभु मैं तो संत हूं। आपको लंगोट पहना दूंगा लेकिन माता को नित्य आभूषण कहां से लाकर दूंगा। भक्त की बात सुनकर श्री कृष्ण मुस्कुराए और राधा कृष्ण की युगल जोड़ी एकाकार होकर एक विग्रह रूप में प्रकट हुई। हरिदास जी ने इस विग्रह को बांके बिहारी नाम दिया।
कृष्णभक्तों में खासतौर पर बिहारीजी के भक्तों में एक कथा प्रचलित है। एक गरीब ब्राह्मण बांके बिहारी का भक्त था। एक बार उसने किसी महाजन से कुछ रुपये उधार लिए। हर महीने वह थोड़ा-थोड़ा करके कर्ज चुकाया। आखिरी किस्त के पहले महाजन ने उसे अदालती नोटिस भिजवा दिया कि उधार बकाया है और पूरी रकम व्याज सहित वापस करे।
ब्राह्मण परेशान हो गया। महाजन के पास जा कर उसने बहुत सफाई दी पर कोई असर नहीं हुआ। मामला कोर्ट में पहुंचा। कोर्ट में भी ब्राह्मण ने जज से वही बात कही, मैंने सारा पैसा चुका दिया है। जज ने पूछा, कोई गवाह है जिसके सामने तुम महाजन को पैसा देते थे। कुछ सोचकर उसने बिहारीजी मंदिर का पता बता दिया।
अदालत ने मंदिर का पता नोट करा दिया। अदालत की ओर से मंदिर के पते पर सम्मन जारी कर दिया गया। वह नोटिस बिहारीजी के सामने रख दिया गया। बात आई गई हो गई। गवाही के दिन एक बूढ़ा आदमी जज के सामने गवाह के तौर पर पेश हुआ। उसने कहा कि पैसे देते समय मैं साथ होता था और इस-इस तारीख को रकम वापस की गई थी।
जन्माष्टमी विशेषः राधा कृष्ण के मिलन की अद्भुत कहानियां
जज ने सेठ का बही- खाता देखा तो गवाही सही निकली। रकम दर्ज थी, नाम फर्जी डाला गया था। जज ने ब्राह्मण को निर्दोष करार दिया। लेकिन उसके मन में यह उथल पुथल मची रही कि आखिर वह गवाह था कौन। उसने ब्राह्मण से पूछा। ब्राह्मण ने बताया कि बिहारीजी के सिवा कौन हो सकता है।
इस घटना ने जज को इतना विभोर कर दिया किया कि वह इस्तीफा देकर, घर-परिवार छोड़कर फकीर बन गया। कहते है कि वही न्यायाधीश बहुत साल बाद पागल बाबा के नाम से वृंदावन लौट कर आया।
वृंदावन। क्या कभी ऐसा भी हो सकता है, जहां भगवान भक्तों की भक्ति से अभिभूत होकर या उनकी व्यथा से द्रवित हो भक्तों के साथ ही चल दें? वृदांवन का मशहूर बांके बिहारी मंदिर एक ऐसा ही मंदिर माना जाता है, जिसके बारे में कहा जाता है कि बांके बिहारी जी भक्तों की भक्ति से इतना प्रभावित हो जाते हैं कि मंदिर में अपने आसन से उठकर भक्तों के साथ हो लेते हैं, इसीलिए मंदिर में उन्हें परदे में रखकर उनकी क्षणिक झलक ही भक्तों को दिखाई जाती है।

पुजारियों का एक समूह दर्शन के वक्त लगातार मूर्ति के सामने पड़े पर्दे को खींचता-गिराता रहता है और उनकी एक झलक पाने को बेताब श्रद्धालु दर्शन करते रहते हैं और बांके बिहारी हैं, जो अपनी एक झलक दिखाकर पर्दे में जा छिपतें हैं। लोक कथाओं के अनुसार कई बार बांके बिहारी कृष्ण ऐसा कर भी चुके हैं, मंदिर से गायब हो चुके हैं, इसीलिए ये पर्देदारी की जाती है।
एक शृद्धालु के अनुसार' मंदिर मे दर्शनार्थ आए श्रद्धालु बार-बार उनकी झलक पाना चाहते  है

Shri Radhe!

श्रीलड्डूगोपाल की पूजा की सरल विधि

*श्रीलड्डूगोपाल की पूजा की सरल विधि!!!!!!!!*🙏🏻🌹

घर-घर में विराजित श्रीलड्डूगोपाल या गोपालजी
‘योगी जिन्हें ‘आनन्द’ कहते हैं, ऋषि-मुनि ‘परमात्मा’ कहते हैं, संत ‘भगवान’ कहते हैं, उपनिषद् ‘ब्रह्म’ कहते हैं, वैष्णव ‘श्रीकृष्ण’ कहते हैं और माताएं व बहनें प्यार से ‘गोपाल’, ‘लाला’ ‘बालकृष्ण’ या ‘श्रीलड्डूगोपाल’ कहती हैं, वह एक ही तत्त्व है । ये सब अनेक नाम एक ही परब्रह्म के हैं।’

ब्रजमण्डल ही नहीं देश-विदेश के अधिकांश वैष्णवों के घर में भगवान श्रीकृष्ण का बालस्वरूप ‘श्रीलड्डूगोपाल’ या ‘गोपालजी’ के रूप में विराजमान है । स्त्रियां इनकी सेवा-लाड़-मनुहार गोपी या यशोदा के भाव से करती हैं, तो कई लोग श्रीलड्डूगोपाल की सेवा स्वामी, सखा, पुत्र या भाई के भाव से करते हैं ।

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है—‘जो मेरी जिस रूप में आराधना या उपासना करता है, मैं भी उसे उसी रूप में उसी भाव से प्राप्त होता हूँ और उसे संतुष्ट कर देता हूँ।‘

वैष्णवों के कारण ही है भगवान की शोभा
भक्ति करने का अर्थ है भगवान की मूर्ति में, भगवान के मंत्र में मन को पिरो देना । भगवान के बालस्वरूप को घर में प्रतिष्ठित कर देने के बाद उन्हें घर का स्वामी मानते हुए घर का प्रत्येक काम उन्हीं की प्रसन्नता के लिए करना भक्ति है ।

मीराबाई के लिए कहा जाता है कि वह अपने गोपाल का सुन्दर श्रृंगार करतीं और उनके सम्मुख कीर्तन व नृत्य करती थीं । भगवान को श्रृंगार की जरुरत नहीं है । श्रृंगार से भगवान की शोभा नहीं बढ़ती वरन् आभूषणों की शोभा भगवान के पहनने से बढ़ती है । साधक जितने समय तक भगवान का श्रृंगार करता है उसकी आंखें व मन भगवान पर ही टिकी रहती हैं जिससे उसका मन शुद्ध होता है और भगवान से प्रेम बढ़ता है । बालकृष्ण के स्वरूप के श्रृंगार में आंखें फंस जाएं तो मनुष्य की नैया पार हो जाती है ।

विदुरजी और विदुरानी प्रतिदिन बालकृष्ण का तीन घंटे तक ध्यान फिर पुष्पों से श्रृंगार करते थे । वे विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करते हुए भगवान के श्रीचरणों में तुलसी अर्पित करते थे । कीर्तन से बालकृष्ण को प्रसन्न करके भगवान की कथा भगवान को ही सुनाते थे । बालकृष्ण का दर्शन करते हुए उनकी आंखों में आंसू बहने लगते व शरीर में रोमांच होने लगता था । इस प्रकार सेवा, ध्यान, जप, कीर्तन, कथा आदि में निमग्न रहकर वे मन को भगवान से दूर जाने ही नहीं देते थे । विदुर-विदुरानी की भक्ति से आकर्षित होकर द्वारिकानाथ उनके घर खिंचे चले आए व उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिए ।
श्रीलड्डूगोपाल की पूजा की सरल विधि
प्रभु सेवा को खरच न लागे ।
अपनों जन्म सुफल कर मूरख क्यों डरपे जो अभागे ।।
उदर भरन को करी रसोइ सोइ भोग धरे ।
महाप्रसाद होय घटे न किनको अपनो उदर भरे ।।
मीठो जल पीवन को लावे तामें झारी भरे ।
अंग ढांकनकूं चहिये कपड़ा तामें साज करे ।।
जो मन होय उदार तुमारो वैभव कछु बढ़ावो ।
नहिं तो मोरचंद्रिका गुंजा यह सिंगार धरावो ।।
अत्तर फूल फल जो कछु उत्तम प्रभु पहिलेहि धरावो ।
जो मन चले वस्तु उत्तम पे प्रभु को धर सब खावो ।।
कर सम्बन्ध स्वामी सेवक को चल मारग की रीति ।
पूरन प्रभु भाव के भूखे देखें अंतर की प्रीति ।।
यामें कहा घट जाय तिहारो घर की घर में रहिहे ।
वल्लभदास होय गति अपनी भलो भलो जग कहिहे।।

इस पद में यह बताया गया है कि ठाकुरजी (व्रज में श्रीलड्डूगोपाल को ठाकुरजी कहते हैं) की सेवा में कोई अलग से खर्च नहीं होता है । वे अभागे हैं जो खर्चे के डर से उनकी पूजा नहीं करते और अपना जन्म सफल करने से वंचित रह जाते हैं । घर के सदस्यों के लिए जो भोजन बने उसी से पहिले ठाकुरजी को भोग लगा दो, वह महाप्रसाद बन जाएगा किन्तु उसमें से एक किनका भी कम नहीं होगा । घर में अपने पीने के लिए जो जल है, उसी से ठाकुरजी के पीने के लिए झारी भर दो । 

अपने शरीर को ढकने के लिए आप वस्त्र लाते हैं, उसी से उनका पीताम्बर बना दो । यदि श्रद्धा और सामर्थ्य हो तो कुछ वैभव (सोना-चांदी के श्रृंगार) की वस्तुएं उनके लिए ले आओ, नहीं तो केवल मोरमुकुट और गुंजामाला से भी ठाकुरजी प्रसन्न हो जाते हैं । इत्र, फल-फूल घर में हों तो पहिले ठाकुरजी को अर्पण कर दो । अगर तुम्हारा मन कुछ अच्छा खाने को करे तो पहिले ठाकुरजी को अर्पण करके खाओ । ठाकुरजी के साथ स्वामी का सम्बन्ध रखते हुए उन्हीं के बताए मार्ग पर चलें । वे तो केवल भाव के भूखे हैं और साधक के मन के भाव ही देखते हैं । इस तरह ठाकुरजी की सेवा करने से कुछ घटता भी नहीं, सब कुछ घर का घर में ही रहता है और मनुष्य का लोक-परलोक दोनों सुधर जाते हैं ।

श्रीलड्डूगोपाल को प्रसन्न करने के विशेष उपाय
बालरूप श्रीलड्डूगोपाल से जैसा प्रेम आप करेंगें, उससे हजारगुना प्रेम वह आपके साथ करेंगे । जो श्रीलड्डूगोपाल की सेवा-ध्यान में तन्मय रहता है उसके ऊपर संसार के सुख-दु:ख का प्रभाव नहीं पड़ता है । उसके अनेक जन्मों के पाप एक ही जन्म में जल जाते हैं और दारिद्रय दूर होकर घर में स्थिर लक्ष्मी का वास होता है क्योंकि श्रीलड्डूगोपाल का एक नाम है—‘भक्तदारिद्रयदमनो’ । श्रीलड्डूगोपाल को प्रसन्न करने के लिए उनकी सेवा इस प्रकार कर—

—शंख में जल भरकर ‘ॐ नमो नारायणाय’ या ‘गोपीजनवल्लभाय नम:’ या ‘श्रीकृष्णाय नम:’ का उच्चारण करते हुए बालकृष्ण को नहलाना चाहिए । इससे मनुष्य के सारे पाप दूर हो जाते हैं।

—संभव हो तो प्रतिदिन अन्यथा द्वादशी और पूर्णिमा को श्रीलड्डूगोपाल को गाय के दूध से स्नान कराकर चंदन अर्पित करना चाहिए।

—स्कन्दपुराण के अनुसार प्रतिदिन प्रात:काल में जो श्रीलड्डूगोपाल को माखन-मिश्री, दूध-दही व तुलसी की मंजरियां, चंदन का इत्र व कमल का पुष्प अर्पण कर प्रसन्न करता है, वह इस लोक में समस्त वैभव प्राप्त करके मृत्यु के बाद उनके परम धाम को प्राप्त करता है।

—भगवान बालकृष्ण को श्यामा तुलसी की श्याम मंजरी अति प्रिय है ।

—श्रीलड्डूगोपाल की सेवा करने वाले वैष्णव को गले में तुलसी की कण्ठी पहननी चाहिए । गले में तुलसी माला धारण करने का अर्थ है कि यह शरीर कृष्णार्पण कर दिया है, यह शरीर अब परमात्मा का हुआ ।

—श्रीलड्डूगोपाल को माखन-मिश्री अत्यन्त प्रिय है । माखन दूध का सारतत्त्व है । बालकृष्ण की सेवा करने वाले वैष्णव सार-भोगी बनते हैं ।

—भगवान को अर्पित भोग की वस्तु में तुलसी रखते हैं, तब वह वस्तु कृष्णार्पण होती है । जिस घर में भगवान को भोग लगाया जाता है उस घर में लक्ष्मीजी और अन्नपूर्णा अखण्डरूप से विराजमान रहती हैं । उस पवित्र अन्न को खाने से मनुष्य की बुद्धि सात्विक रहती है और शरीर में रोग उत्पन्न नहीं होते हैं ।
 
—श्रीलड्डूगोपाल का प्रिय मन्त्र दामोदर-मन्त्र है—‘श्रीदामोदराय नम:’ । इस मन्त्र को दामोदरमास (कार्तिक मास) में करने से भगवान बालगोपाल शीघ्र ही प्रसन्न होकर सिद्धि प्रदान करते हैं । भगवान का कथन है कि अपने दामोदर नाम से मुझे ऐसी प्रसन्नता होती है जिसकी कहीं तुलना नहीं है ।

—श्रीलड्डूगोपाल की पूजा करने वाले वैष्णवों को प्रतिदिन गोपालसहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए । इसके अतिरिक्त श्रीमद्भागवतपुराण के दशम स्कन्ध का प्रतिदिन पाठ (चाहे एक श्लोक का ही क्यों न हो) और गीता का पाठ भी बालकृष्ण को बहुत प्रिय है ।

—श्रीलड्डूगोपाल की प्रतिदिन प्रदक्षिणा व साष्टांग प्रणाम करने से भी उनकी कृपा शीघ्र ही प्राप्त हो जाती है ।

—श्रीगोपालजी के सहस्त्रों नामों में से कुछ नाम हैं–’नित्योत्सवो नित्यसौख्यो, नित्यश्रीर्नित्यमंगल:।’ (श्रीगोपालसहस्त्रनाम)

अर्थात् वे नित्य उत्सवमय, सदा सुखसौख्यमय, शोभामय और मंगलमय हैं । श्रीकृष्ण के लिए माता यशोदा नित्य ही उत्सव मनाती थीं । बालकृष्ण ने जब पहली बार करवट ली तो उस दिन माता ने कटि-परिवर्तन उत्सव मनाया था और गरीब ग्वालों और गोपियों की पूजाकर उन्हें दान दिया था । इसी कारण व्रजमण्डल में भगवान श्रीकृष्ण के नित्य कोई-न-कोई उत्सव होते रहते हैं ।

घर में ठाकुरजी को प्रतिष्ठित करने के बाद जब भी संभव हो, उनकी प्रसन्नता के लिए उत्सव किए जाने चाहिए । उत्सव भगवान को स्मरण करने और जगत को भुलाने के लिए हैं । उत्सव के दिन भूख-प्यास भुलाई जाती है, देह का बोध भुलाया जाता है । उत्सव में धन गौण है, मन मुख्य है । विभिन्न उत्सवों पर भगवान को ऋतु अनुकूल सुन्दर पोशाक व श्रृंगार धारण कराकर दर्पण दिखाना चाहिए क्योंकि बालकृष्ण अपने रूप पर ही मोहित होकर रीझ जाते हैं । बच्चे की भांति उन्हें सुन्दर खिलौने—गाय, मोर, हंस, बतख, झुनझना, फिरकनी, गेंद-बल्ला, झूला आदि सजाकर प्रसन्न करना चाहिए ।

—श्रीलड्डूगोपाल को प्रतिदिन कोमल नर्म बिस्तर पर शयन करानी चाहिए ।

प्रेम-बंधन से ही बंधते हैं भगवान!!!!!!!!

यदि वैष्णव भगवान की अपेक्षा जगत से अधिक प्रेम करता है तो यह बात ठाकुरजी को नहीं सुहाती । वे सोचते हैं प्रेम करने योग्य मैं हूँ, यह मुझे क्यों नहीं भजता ? मनुष्य जब भगवान का नाम-जप-सेवा-अर्चना करता है, तो उन्हें उसके योगक्षेम की चिन्ता होती है । ‘मैं भगवान का हूँ और भगवान मेरे हैं’—ऐसा भाव रखकर जो बालगोपाल की सेवा करते हैं तथा भगवान के सिवाय किसी और वस्तु की कामना नहीं करते हैं, उन्हें भगवान अपने स्वरूप का दर्शन कराकर अपने धाम में भेज देते हैं।

घर में शंख रखने और बजाने के ये हैं ग्यारह आश्चर्यजनक लाभ

घर में शंख रखने और बजाने के ये हैं ग्यारह आश्चर्यजनक लाभ!!!!!!

पूजा-पाठ में शंख बजाने का चलन युगों-युगों से है। देश के कई भागों में लोग शंख को पूजाघर में रखते हैं और इसे नियमित रूप से बजाते हैं। ऐसे में यह उत्सुकता एकदम स्वाभाविक है कि शंख केवल पूजा-अर्चना में ही उपयोगी है या इसका सीधे तौर पर कुछ लाभ भी है!!

सनातन धर्म की कई ऐसी बातें हैं, जो न केवल आध्यात्मिक रूप से, बल्कि कई दूसरे तरह से भी लाभदायक हैं। शंख रखने, बजाने व इसके जल का उचित इस्तेमाल करने से कई तरह के लाभ होते हैं। कई फायदे तो सीधे तौर पर सेहत से जुड़े हैं।

आगे चर्चा की गई है कि पूजा में शंख बजाने और इसके इस्तेमाल से क्या-क्या फायदे होते हैं।

1. ऐसी मान्यता है कि जिस घर में शंख होता है, वहां लक्ष्मी का वास होता है। धार्मिक ग्रंथों में शंख को लक्ष्मी का भाई बताया गया है, क्योंकि लक्ष्मी की तरह शंख भी सागर से ही उत्पन्न हुआ है. शंख की गिनती समुद्र मंथन से निकले चौदह रत्नों में होती है।

2. शंख को इसलिए भी शुभ माना गया है, क्योंकि माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु, दोनों ही अपने हाथों में इसे धारण करते हैं।

3. पूजा-पाठ में शंख बजाने से वातावरण पवित्र होता है। जहां तक इसकी आवाज जाती है, इसे सुनकर लोगों के मन में सकारात्मक विचार पैदा होते हैं। अच्छे विचारों का फल भी स्वाभाविक रूप से बेहतर ही होता है।

4. शंख के जल से विष्णु लक्ष्मी आदि का अभि‍षेक करने से ईश्वर प्रसन्न होते हैं और उनकी कृपा प्राप्त होती है।

‍5. ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है कि शंख में जल रखने और इसे छिड़कने से वातावरण शुद्ध होता है।

6. शंख की आवाज लोगों को पूजा-अर्चना के लिए प्रेरित करती है। ऐसी मान्यता है कि शंख की पूजा से कामनाएं पूरी होती हैं. इससे दुष्ट आत्माएं पास नहीं फटकती हैं।

7. वैज्ञानिकों का मानना है कि शंख की आवाज से वातावरण में मौजूद कई तरह के जीवाणुओं-कीटाणुओं का नाश हो जाता है. कई टेस्ट से इस तरह के नतीजे मिले हैं।

8. आयुर्वेद के मुताबिक, शंखोदक के भस्म के उपयोग से पेट की बीमारियां, पथरी, पीलिया आदि कई तरह की बीमारियां दूर होती हैं। हालांकि इसका उपयोग एक्सपर्ट वैद्य की सलाह से ही किया जाना चाहिए।

9. शंख बजाने से फेफड़े का व्यायाम होता है। पुराणों के जिक्र मिलता है कि अगर श्वास का रोगी नियमि‍त तौर पर शंख बजाए, तो वह बीमारी से मुक्त हो सकता है।

10. शंख में रखे पानी का सेवन करने से हड्डियां मजबूत होती हैं। यह दांतों के लिए भी लाभदायक है। शंख में कैल्श‍ियम, फास्फोरस व गंधक के गुण होने की वजह से यह फायदेमंद है।

11. वास्तुशास्त्र के मुताबिक भी शंख में ऐसे कई गुण होते हैं, जिससे घर में पॉजिटिव एनर्जी आती है। शंख की आवाज से 'सोई हुई भूमि' जाग्रत होकर शुभ फल देती है.॥

मथुरा में 40 दिन की होली

बृज में लगभग 40 दिनी होलिकोत्सव शुरू, 
बृज में वसंत पंचमी के दिन से लगभग  40 दिन के होली के पर्व की शुरुआत हो जाती है। वृन्दावन के बाँके बिहारी मंदिर में होली का नजारा बेहद मनभावन होता है।

मथुरा. वसंत-पंचमी का बृजभूमि में अपना अलग ही महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बृज में आज ही के दिन से 40 दिन के होली के पर्व की शुरुआत हो जाती है। इस दिन यहाँ के सभी प्रमुख मंदिरों में जमकर गुलाल उड़ाया जाता है। वृन्दावन के विश्वप्रसिद्ध बाँकेबिहारी मंदिर में भी बसंत-पंचमी की इस होली का नजारा बेहद मनभावन होता है। बृज में होली का डाढ़ा गाड़ने की भी परम्परा रही है। इसीलिए आज ही के दिन यहाँ जगह-जगह पूजा-अर्चना करने के साथ होलिका बनाने की भी शुरुआत हो जाती है।

40 दिन तक चलेगा सिलसिला
होली शुरू होने में भले ही अभी कुछ दिन का वक़्त हो, लेकिन बृज में अभी से ही होली की शुरुआत हो चुकी है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बृज में वसंत ऋतु के आगमन के साथ ही वसंत-पंचमी के दिन से होली की शुरुआत हो जाती है। यहाँ के सभी प्रमुख मंदिरों में आज ही के दिन से गुलाल उड़ाने की शुरुआत हो जाती है। ये सिलसिला अगले 40 दिन तक चलता है। 

बांके बिहारी मंदिर में भक्तों का जमावड़ा
वसंत-पंचमी के दिन वृन्दावन के विश्वप्रसिद्ध बाँकेबिहारी मंदिर में भी जमकर गुलाल उड़ाया जाता है। परंपरा के अनुसार आज के दिन मंदिर में श्रृंगार आरती के बाद सबसे पहले मंदिर के सेवायत पुजारी भगवान बाँकेबिहारी को गुलाल का टीका लगाकर होली के इस पर्व की विधिवत शुरुआत करते हैं। उसके बाद इस पल के साक्षी बने मंदिर प्रांगण में मौजूद श्रद्धालुओं पर सेवायत पुजारियों द्वारा जमकर बसंती गुलाल उड़ाया जाता है।

नजर आता है सिर्फ गुलाल
मंदिर में होली की विधिवत शुरुआत होने के कुछ देर बाद ही प्रांगण में माहौल बेहद खुशनुमा हो जाता है। यहाँ सिर्फ गुलाल ही गुलाल नजर आता है। प्रांगण में मौजूद श्रद्धालु भी भगवान बाँकेबिहारी के साथ होली खेलने के इस पल का खूब आनंद उठाते हैं।

ठाकुर जी ने शुरूआत कर दी है (सेवायत पुजारी, श्रीबांकेबिहारी मंदिर, वृन्दावन)   बताते हैं कि    वसंत उत्सव मनाया जा रहा है। बसंत पंचमी का आगाज है। होली की शुरुआत है। आज बांके बिहरी जी ने होली की शुरुआत अपने भक्तों के साथ की है l

ब्रज की होली के कार्यक्रम 2021
★ वसंत पंचमी पर बांकेबिहारी मंदिर में गुलाल की होली। 
★ वसंत पंचमी पर ही रमणरेती आश्रम में रंग गुलाल की होगी होली।
★ एकादशी पर बरसाना में लड्डू होली।
★ द्वादशी पर बरसाना में लट्ठमार होली।
★ त्रयोदशी पर नंदगांव में लट्ठमार होली।
★ पूर्णिमा श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर लट्ठमार के अलावा द्वारिकाधीश और ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर में होली।
- 27 मार्च को गोकुल में छड़ी मार हुरंगा।
- 29 मार्च को चतुर्वेदी समाज का डोला। 
- 31 मार्च को बलदेव (दाऊजी) में हुरंगा।

 ब्रज की होली का पूरा कैलेंडर: लड्डू से लठ्ठमार होली तक, यहां जानें हर तारीख
Mathura Vrindavan Holi Calendar : अगर आप ब्रज की होली में आना चाहते हैं, लेकिन पता नहीं कौन-सी होली किस दिन है, तो ये आपके लिए है। 
23 जनवरी को ठाकुर श्री बांके बिहारी जी मंदिर में होली है। 
25 फरवरी को बरसाना में लड्डू होली होगी। 
26 फरवरी को बरसाना में ही मशहूर लठ्ठमार [

Braj Holi 2026 Dates : ब्रज होली 2026: कब, कहां और कैसे? यहां है आपकी पूरी ट्रैवल गाइड 

Mathura Vrindavan Holi Calendar : अगर आप ब्रज की होली में आना चाहते हैं, लेकिन पता नहीं कौन-सी होली किस दिन है, तो ये आपके लिए है। 23 जनवरी को ठाकुर श्री बांके बिहारी जी मंदिर में होली है। 25 फरवरी को बरसाना में लड्डू होली होगी। 26 फरवरी को बरसाना में ही मशहूर लठ्ठमार होली है। 27 फरवरी को नंदगांव में लठ्ठमार होली खेली जाएगी। 28 फरवरी को आपके बांके बिहारी जी मंदिर में फूलों की होली है। 1 मार्च को गोकुल में छड़ी मार होली होती है। 3 मार्च, मंगलवार को होलिका दहन और द्वारकाधीश मंदिर में होली है। अब आपको तारीखों की टेंशन नहीं लेनी पड़ेगी। बस आ जाइए और होली का मजा लीजिए।

ब्रज होली कैलेंडर 2026


तिथि (2026)
होली का नाम (पारंपरिक नाम)स्थान
25 फरवरी 2026 (बुधवार)लड्डू होलीबरसाना
26 फरवरी 2026 (गुरुवार)बरसाना लठ्ठमार होलीबरसाना
27 फरवरी 2026 (शुक्रवार)नंदगांव लठ्ठमार होलीनंदगाँव
28 फरवरी 2026 (शनिवार)फूलों की होलीवृंदावन
28 फरवरी 2026 (शनिवार)विधवाओं की होली (Widows' Holi)वृंदावन
1 मार्च 2026 (रविवार)छड़ी-मार होलीगोकुल
2 मार्च 2026 (सोमवार)रमण रेती होलीगोकुल
3 मार्च 2026 (मंगलवार)होलिका दहनमथुरा और वृंदावन
4 मार्च 2026 (बुधवार)रंगवाली होली / धुलंडीमथुरा और वृंदावन
5 मार्च 2026 (गुरुवार)हुरंगा होली (दाऊजी का हुरंगा)दाऊजी मंदिर
6 मार्च 2026 (शुक्रवार)बलदेव हुरंगाबलदेव

मथुरा-वृंदावन ब्रज होली 2026 की तारीखें कुछ इस तरह हैं | Mathura Vrindavan Holi Calendar 2026

25 फरवरी 2026, बुधवार। बरसाना में लड्डू होली से शुरुआत होती है। राधा रानी मंदिर के अंदर भक्त लड्डू एक-दूसरे पर खुशी-खुशी फेंकते हैं। इसी के साथ ब्रज होली का रंग चढ़ने लगता है।

26 फरवरी, गुरुवार। बरसाना की लठमार होली। यहां महिलाएं, कृष्ण-राधा की पुरानी कहानियों को जीते हुए, पुरुषों को लाठी से हल्के-फुल्के अंदाज में मारती हैं। माहौल बिल्कुल अलग होता है। हंसी-ठिठोली, रंग और मस्ती।

27 फरवरी, शुक्रवार। अब बारी है नंदगांव की लठमार होली की। बरसाना की परंपरा यहां भी जारी रहती है। नंदगांव के गलियारे, रंग और मस्ती से भर जाते हैं।

28 फरवरी, शनिवार। वृंदावन में फूलों की होली मनती है। रंगों की जगह मंदिरों में फूलों की बारिश होती है। इसी दिन वृंदावन में विधवाओं की होली भी होती है। ये पल बराबरी और भक्ति का एहसास कराते हैं।

1 मार्च, रविवार। गोकुल में छड़ी-मार होली होती है। यहाँ भगवान कृष्ण के बचपन की यादें ताजा होती हैं। पुजारी, आशीर्वाद के तौर पर, भक्तों को ceremonial छड़ियों से हल्के से छूते हैं।

2 मार्च, सोमवार। गोकुल के रमन रेती में होली का एक अलग ही रंग देखने को मिलता है। यहाँ कृष्ण की बाल-लीलाओं से जुड़ी पूजा और होली रस्में होती हैं। माहौल पूरी तरह आध्यात्मिक हो जाता है।

3 मार्च, मंगलवार। मथुरा और वृंदावन में होलिका दहन की रात होती है। लोग पवित्र अलाव जलाते हैं, बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाते हैं।

4 मार्च, बुधवार। रंगवाली होली या धुलंडी यानी असली रंगों वाली होली का दिन। मथुरा और वृंदावन की गलियों में रंग, संगीत और भक्ति का सैलाब उमड़ आता है।

5 मार्च, गुरुवार। बलदेव के दौजी मंदिर में हुरंगा होली होती है। महिलाएँ, एक अनोखी और मज़ेदार रस्म में, पुरुषों के कपड़े फाड़ती हैं। खेल, हंसी और परंपरा सब कुछ साथ-साथ।

6 मार्च, शुक्रवार। बलदेव में हुरंगा का उत्सव एक दिन और चलता है। इसी के साथ ब्रज की होली का रंगारंग समापन होता है।

Holi 2026 Date: 3 या 4 मार्च कब मनाया जाएगा होली का त्योहार? यहां जानिए सही तिथि और महत्व

Holi 2026 Date: होली का त्योहार रंगों से भरा हुआ प्रेम और सौहार्द का प्रतीक माना जाता है। इस साल कई लोग होली की डेट को लेकर बहुत दुविधा में हैं। ऐसे में आइए जानते हैं साल 2026 में होली कब मनाई जाएगी। यहां नोट करें तिथि और महत्व।


Holi Kab Hai 2026 : हिंदू धर्म में होली के पर्व का बहुत ही खास महत्व है। ये त्योहार होलिका दहन के अगले दिन मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने सारे गिले- शिकवे भूलकर एक दूसरे के साथ रंग और अबीर खेलते हैं। होली का पर्व आपसी एकता और प्रेम को भी बढ़ावा देता है। इस पर्व को अलग- अलग जगह पर अलग- अलग नामों से पुकारा जाता है। कहीं फगुआ तो कहीं धुलंडी और रंगवाली होली के नाम से इस त्योहार को जाना जाता है। होलिका दहन का त्योहार बुराई पर अच्छाई के जीत के तौर पर मनाया जाता है। वहीं भक्त प्रह्लाद के बचने की खुशी में अगले दिन सब रंगोंवाली होली खेलते हैं। आइए जाने इस साल ये पर्व किस दिन मनाया जाएगा

होली कब है 2026


पंचांग के अनुसार होली का त्योहार हर साल फाल्गुन महीने की पूर्णिमा तिथि के अगले दिन मनाया जाता है। पूर्णिमा तिथि के दिन होलिका दहन किया जाता है। इस साल होलिका दहन 3 मार्च 2026 को किया जाएगा। ऐसे में रंग वाली होली का पर्व 4 मार्च 2026 को मनाया जाएगा। इस दिन रंग और गुलाल खेले जाएंगे।

होली के दिन क्या करें और क्या न करें

  • होली के दिन सरसों का तेल, कांच और स्टील का सामान दान नहीं करना चाहिए।
  • होली के दिन दूध, दही और चीनी जैसी सफेद चीजों का दान करना बहुत ही शुभ माना जाता है।
  • इस दिन आप देवताओं को पूजा समय फूल, रंग और मिठाई जरूर अर्पित करें।
  • होली के दिन किसी से भी किसी तरह का वाद- विवाद ना करें।
  • होली का दिन आपसी प्रेम और एकता का दिन होता है, इस दिन सबके साथ प्रेमपूर्वक रंगों का पर्व मनाएं।

होली का महत्व


होली का त्योहार केवल रंग खेलने की नहीं, बल्कि धार्मिक अनुष्ठानों के लिए भी खास माना जाता है। इस दिन भगवान कृष्ण और राधा रानी के साथ- साथ माता लक्ष्मी की पूजा करना बेहद ही शुभ माना जाता है। होली पर राधे कृष्ण की पूजा करने से वैवाहिक जीवन में खुशियां आती हैं और माता लक्ष्मी की पूजा करने से घर में बरकत आती है।


ब्रज में 40 दिन क्यों खेली जाती है होली, किस तारीख से होती है शुरू- ब्रज होली 2026 कैलेंडर

Braj Holi 2026 Dates : 23 जनवरी 2026 बसंत पंचमी से ही ब्रज की धरती पर रंगोत्सव की शुरुआत हो गई है। ये रंगों का उत्सव 40 दिनों तक चलता है। इस दौरान ब्रज में अलग-अलग प्रकार की होलियां खेली जाती हैं। बसंत पंचमी को रंग पंचमी के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इस दिन से ही रंगोत्सव की शुरुआत होती है। आइए जानते हैं कि इसके पीछे का क्या इतिहास है और साल 2026 में कौन सी होली कब पड़ेगी?


Braj Holi 2026: ब्रज की पावन धरती पर 23 जनवरी 2026 से बसंत पंचमी के साथ ही होली के रंग बिखरने लगे हैं। बसंत पंचमी से ब्रज क्षेत्र में 40 दिवसीय रंगोत्सव की विधिवत शुरुआत मानी जाती है। भगवान कृष्ण और राधा रानी की लीलाओं से जुड़ा यह उत्सव केवल रंगों तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसमें भक्ति, परंपरा और आनंद का अनोखा संगम देखने को मिलता है। वृंदावन, बरसाना, नंदगांव और मथुरा जैसे पवित्र स्थलों पर इस दिन से मंदिरों में विशेष रस्में शुरू हो जाती हैं, जो आने वाले दिनों में भव्य होली उत्सव का संकेत देती हैं।


ब्रज में होली का यह लंबा उत्सव सामान्य होली से अलग माना जाता है, क्योंकि यहां रंगों के साथ-साथ आध्यात्मिक भाव भी गहराई से जुड़ा होता है। बसंत पंचमी के दिन मंदिरों में होली का डंडा रोपण किया जाता है, जिससे पूरे ब्रज में उत्सव का माहौल बन जाता है। अगले 40 दिनों तक यह क्षेत्र भजन, कीर्तन, फूलों की होली, लट्ठमार होली और पारंपरिक रस्मों के रंग में डूबा रहता है। यही कारण है कि ब्रज की होली को केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि भक्ति और संस्कृति का जीवंत उत्सव माना जाता है। आइए जानते हैं कि इसके पीछे का इतिहास और होली की परंपरा क्या है?


ब्रज की होली

साल 2026 में ब्रज की होली कब से होगी?

ब्रज परंपरा के अनुसार, होली की शुरुआत बसंत पंचमी से मानी जाती है। साल 2026 में बसंत पंचमी 23 जनवरी को पड़ी है और इसी दिन से ब्रज में होली का माहौल बनना शुरू हो गया। मंदिरों में गुलाल अर्पित किया गया, ठाकुर जी को रंग लगाए गए और फाग गीतों की गूंज सुनाई देने लगी है।


ब्रज में यह मान्यता है कि जब तक भगवान कृष्ण के साथ होली नहीं खेली जाती, तब तक यह उत्सव पूरा नहीं होता है। इसी कारण यहां होली एक दिन में खत्म नहीं होती, बल्कि बसंत पंचमी से लेकर फाल्गुन पूर्णिमा तक लगातार चलती रहती है।


ब्रज की लड्डू मार होली

लड्डू मार होली (24 और 25 फरवरी 2026)

24 फरवरी 2026, मंगलवार से ब्रज में होली का औपचारिक उत्सव शुरू होता है। नंदगांव में फाग आमंत्रण महोत्सव होता है, जिसमें बरसाना को होली खेलने का न्योता दिया जाता है। इस दिन नंदगांव के श्री राधा रानी मंदिर में लड्डू होली होगी। इसमें मंदिर परिसर में भक्त एक-दूसरे पर लड्डू बरसाते हैं। इसी दिन से पूरे ब्रज में होली का रंग चढ़ना शुरू हो जाता है। अगले दिन 25 फरवरी बुधवार को बरसाना के राधा रानी मंदिर में लड्डू होली होगी, यह तब मनाई जाती है, जब नंदगांव से होली खेलने की सहमति मिलती है, तब खुशी में लड्डू बांटे और उछाले जाते हैं। भक्त इन्हें प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।


बरसाने की लठमार होली

बरसाना की लठमार होली (26 और 27 फरवरी 2026)

26 फरवरी 2026, गुरुवार बरसाना में विश्व प्रसिद्ध लठ्ठमार होली खेली जाएगी। मान्यता है कि नंदगांव के हुरियारे जब बरसाना पहुंचते हैं तो गोपियां प्रेम और परंपरा के प्रतीक रूप में उन्हें लाठियों से हल्के-फुल्के अंदाज में मारती हैं। यह होली हंसी, ठिठोली और लोक परंपरा का अनोखा उदाहरण मानी जाती है।


यहां राधा रानी की सखियां नंदगांव से आए पुरुषों पर प्रतीकात्मक रूप से लाठियां चलाती हैं, जबकि पुरुष ढाल लेकर अपना बचाव करते हैं। यह दृश्य देखने में भले ही उग्र लगे, लेकिन इसके पीछे गहरा प्रेम और हास्य छिपा होता है। वहीं, 27 फरवरी 2026, शुक्रवार इस दिन नंदगांव की लठ्ठमार होली होगी। बरसाना की गोपियां नंदगांव पहुंचती हैं और वहां वही परंपरा दोहराई जाती है। रंग, गुलाल, ढोल-नगाड़ों और रसिया गायन के बीच पूरा नंदगांव उत्सव में डूब जाता है।


मान्यता है कि भगवान कृष्ण अपने सखाओं के साथ राधा को रंग लगाने बरसाना आए थे, लेकिन राधा की सखियों ने उन्हें उल्टा दौड़ा दिया। आज उसी लीला को परंपरा के रूप में निभाया जाता है। यह होली ब्रज की नारी शक्ति, आत्मविश्वास और सांस्कृतिक गरिमा को दर्शाती है।


फूलों की होली

वृंदावन की फूलों की होली (27 फरवरी 2026)

28 फरवरी 2026, शनिवार इस दिन ब्रज क्षेत्र में विभिन्न मंदिरों और गांवों में फाग उत्सव और पारंपरिक होली आयोजन होते हैं। वृंदावन में इस दिन फूलों की होली होती है। कई स्थानों पर मंदिरों में गुलाल अर्पित किया जाता है और होली गीतों का आयोजन होता है। यह दिन मुख्य आयोजनों के बीच का सांस्कृतिक दिन माना जाता है। वहीं, वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में खेली जाने वाली फूलों की होली ब्रज की सबसे कोमल और भावनात्मक परंपराओं में से एक है।


यहां गुलाल की जगह फूलों की पंखुड़ियों की वर्षा होती है। भक्तों को ऐसा अनुभव होता है मानो स्वयं ठाकुर जी अपने प्रेम और कृपा की वर्षा कर रहे हों। यह होली भक्ति और शांति से जुड़ी होती है और इसका आकर्षण देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचता है।


विधवा होली

विधवा होली (27 फरवरी 2026)

इसके साथ ही इसी दिन वृंदावन में विधवाओं की होली भी मनाई जाती है, जो सामाजिक बदलाव और समानता का प्रतीक मानी जाती है। वृंदावन में विधवा महिलाओं द्वारा होली खेला जाना एक बड़े सामाजिक बदलाव का प्रतीक है। कभी जिन महिलाओं को रंगों और उत्सव से दूर रखा जाता था, आज वही महिलाएं गुलाल उड़ाकर जीवन का उत्सव मनाती हैं।


छड़मार होली

छड़ मार होली (1 मार्च 2026)

1 मार्च 2026, रविवार गोकुल में छड़ी-मार होली का आयोजन होगा। यह परंपरा भगवान कृष्ण के बाल रूप से जुड़ी मानी जाती है। यहां पुजारी प्रतीकात्मक रूप से छड़ी से होली की रस्म निभाते हैं और भक्तों पर गुलाल उड़ाया जाता है।


होली

रमण रेती क्षेत्र होली (2 मार्च 2026)

2 मार्च 2026, सोमवार गोकुल के रमण रेती क्षेत्र में होली मनाई जाएगी। यह स्थान कृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ा माना जाता है। यहां होली का स्वरूप ज्यादा आध्यात्मिक होता है, जहां पूजा, भजन और पारंपरिक रंगोत्सव एक साथ होते हैं।


होलिका दहन

होलिका दहन (3 मार्च 2026)

3 मार्च 2026, मंगलवार मथुरा और वृंदावन में होलिका दहन किया जाएगा। इस रात बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक अग्नि प्रज्वलित किया जाता है। लोग परिवार और समाज की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।


रंगों की होली

रंगों की मुख्य होली (4 मार्च 2026)

4 मार्च 2026, बुधवार इस दिन रंगवाली होली (धुलंडी) खेली जाएगी। मथुरा और वृंदावन की गलियों में रंग, गुलाल, पानी और संगीत के साथ असली होली का उत्सव दिखाई देता है। देश-विदेश से आए श्रद्धालु और पर्यटक इसी दिन सबसे ज्यादा नजर आते हैं।


फाल्गुन पूर्णिमा के दिन पूरे ब्रज क्षेत्र में रंगों की होली खेली जाती है। इस दिन अबीर, गुलाल और प्राकृतिक रंगों का विशेष उपयोग होता है। साधु-संत, स्थानीय लोग और श्रद्धालु सभी एक साथ रंगों में सराबोर नजर आते हैं। इस होली में सामाजिक भेदभाव पूरी तरह मिट जाता है और हर व्यक्ति एक ही भाव में जुड़ा दिखाई देता है।


हुरंगा होली

हुरंगा होली (5 मार्च 2026)

5 मार्च 2026, गुरुवार दाऊजी मंदिर, बलदेव में हुरंगा होली खेली जाएगी। इसमें महिलाएं पुरुषों के कपड़े फाड़ने की परंपरा निभाती हैं। यह होली मस्ती, परंपरा और लोक संस्कृति का अनोखा रूप है। वहीं, 6 मार्च 2026, शुक्रवार बलदेव में हुरंगा उत्सव का समापन होता है। इसी दिन के साथ ब्रज की प्रसिद्ध होली अपने अंतिम चरण में पहुंचती है और लगभग 40 दिनों तक चले इस रंगोत्सव का समापन माना जाता है।


ब्रज की होली कैलेंडर 2026

ब्रज की होली की शुरुआत 23 जनवरी बसंत पंचमी के दिन हो गई है। यह 40 दिनों तक चलने वाला है उत्सव है। इसमें 24 और 25 फरवरी को लड्डुओं की होली खेली जाएगी। इसके बाद लठमार होली खेली जाएगी। इसके बाद भी अन्य-अन्य होली खेली जाएंगी। देखिए पूरी टेबल डेट वाइज

तिथि (2026) होली का नाम (पारंपरिक नाम) स्थान

24 फरवरी 2026, मंगलवार फाग आमंत्रण महोत्सव एवं लड्डू होली नंदगांव (राधा रानी मंदिर)

25 फरवरी 2026, बुधवार लड्डू होली बरसाना

26 फरवरी 2026, गुरुवार बरसाना की लठमार होली बरसाना

27 फरवरी 2026, शुक्रवार नंदगांव की लठमार होली नंदगांव

28 फरवरी 2026, शनिवार फूलों की होली वृंदावन

28 फरवरी 2026, शनिवार विधवाओं की होली (Widows’ Holi) वृंदावन

1 मार्च 2026, रविवार छड़ी-मार होली गोकुल

2 मार्च 2026, सोमवार रमण रेती होली गोकुल

3 मार्च 2026, मंगलवार होलिका दहन मथुरा और वृंदावन

4 मार्च 2026, बुधवार रंगवाली होली / धुलंडी मथुरा और वृंदावन

5 मार्च 2026, गुरुवार हुरंगा होली (दाऊजी का हुरंगा) दाऊजी मंदिर

6 मार्च 2026, शुक्रवार बलदेव हुरंगा बलदेव

क्या है ब्रज की होली?

ब्रज की होली भारत के उन चुनिंदा उत्सवों में शामिल है, जो समय के साथ सिर्फ त्योहार नहीं रहे, बल्कि एक पूरी सांस्कृतिक पहचान बन चुके हैं। यह होली रंगों तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसमें भक्ति, परंपरा, लोक संस्कृति और इतिहास एक साथ सांस लेते नजर आते हैं। जब देश के अन्य हिस्सों में होली एक दिन का उत्सव होती है, तब ब्रज क्षेत्र में यह आयोजन हफ्तों तक चलता है और हर दिन का रंग, तरीका और भाव अलग होता है।


मथुरा, वृंदावन, बरसाना, नंदगांव, गोकुल और गोवर्धन आदि ये सभी स्थान मिलकर ब्रजभूमि का निर्माण करते हैं। मान्यता है कि यही वह धरती है, जहां भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी बाल और युवा लीलाएं कीं। इसी कारण यहां मनाई जाने वाली होली केवल सामाजिक उत्सव नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा से जुड़ा हुआ उत्सव बन जाती है।


ब्रज की होली क्यों मनाई जाती है?

ब्रज की होली का मूल भाव भगवान कृष्ण और राधा के प्रेम से जुड़ा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, बालकृष्ण अपने सांवले रंग को लेकर मन ही मन असमंजस में रहते थे, जबकि राधा का रंग उजला था। इस बात को लेकर उन्होंने अपनी माता यशोदा से प्रश्न किया। तब माता यशोदा ने प्रेम से मुस्कुराते हुए कहा कि अगर रंग का फर्क खटकता है, तो राधा के चेहरे पर रंग लगा दो।


यहीं से रंगों के उस खेल की शुरुआत मानी जाती है, जो आगे चलकर ब्रज की होली की पहचान बन गया। ब्रज में होली मनाने का अर्थ केवल रंग लगाना नहीं, बल्कि प्रेम में शरारत, अपनापन और बराबरी का भाव दिखाना है। यही वजह है कि यहां होली में कोई ऊंच-नीच नहीं होती और हर व्यक्ति एक ही रंग में रंगा नजर आता है।


ब्रज की होली का ऐतिहासिक आधार

ब्रज की होली का इतिहास केवल लोककथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके संकेत भक्ति साहित्य और धार्मिक परंपराओं में भी मिलते हैं। द्वापर युग में भगवान कृष्ण द्वारा खेली गई होली को इस परंपरा की नींव माना जाता है। समय के साथ यह उत्सव मंदिरों से निकलकर गांवों, गलियों और आम जीवन का हिस्सा बन गया।


मध्यकाल में भक्ति आंदोलन के दौरान ब्रज की होली को और विस्तार मिला। सूरदास, नंददास, रसखान और अन्य संत-कवियों ने अपने पदों और रचनाओं में फाग और होली का उल्लेख किया। इन रचनाओं ने ब्रज की होली को केवल धार्मिक नहीं, बल्कि लोक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बना दिया। इतिहासकारों और विदेशी यात्रियों के विवरणों से भी संकेत मिलते हैं कि ब्रज की होली सदियों से निरंतर मनाई जाती रही है।


मंदिरों में ब्रज की होली का महत्व

बांके बिहारी मंदिर, राधा रानी मंदिर और द्वारकाधीश मंदिर ब्रज की होली के मुख्य केंद्र होते हैं। यहां विशेष श्रृंगार, भजन और गुलाल अर्पण के साथ होली मनाई जाती है। भक्तों के लिए यह अनुभव केवल त्योहार नहीं, बल्कि भगवान से भावनात्मक जुड़ाव का माध्यम बन जाता है।


ब्रज की होली में रसिया और लोक संस्कृति

ब्रज की होली रसिया गीतों के बिना अधूरी मानी जाती है। इन लोकगीतों में राधा-कृष्ण की नोकझोंक, प्रेम और अपनापन झलकता है। ढोल, नगाड़े और मंजीरों की थाप के साथ जब ये गीत गूंजते हैं, तो पूरा ब्रज क्षेत्र उत्सव में डूब जाता है।


ब्रज की होली और पारंपरिक खान-पान

होली के दौरान ब्रज का खान-पान भी खास पहचान रखता है। ठंडाई, गुजिया, कचौड़ी, मठरी और पेड़े हर घर में तैयार किए जाते हैं। ये व्यंजन उत्सव की मिठास को और बढ़ा देते हैं और मेहमानों के स्वागत का प्रतीक माने जाते हैं।


ब्रज की होली का सांस्कृतिक और वैश्विक महत्व

आज ब्रज की होली अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुकी है। देश-विदेश से श्रद्धालु, शोधकर्ता और फोटोग्राफर इस उत्सव को देखने आते हैं। यह होली भारत की सांस्कृतिक विविधता, परंपरा और भक्ति को दुनिया के सामने प्रस्तुत करती है और स्थानीय जीवन व अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देती है।

कौन सा दीपक जलाएं किस भगवान् के आगे और किस इच्छा पूर्ति के लिए

*कौन सा दीपक जलाएं किस भगवान् के आगे और किस इच्छा पूर्ति के लिए जानने के लिए पढ़े--*

*भगवान गणेश की कृपा पाने के लिए तीन बत्तियों वाला दीपक जलानें और गणपतिshotra का पाठ करने से मनोकामनायें पूर्ण होती है।
 
 * यदि आप मां लक्ष्मी की आराधना करते हैं और चाहते हैं कि उनकी कृपा आप पर बरसे तो उसके लिए आपको सातमुखी दीपक जलायें। और श्री सूक्त का पाठ करे।
 
 * यदि आपका सूर्य ग्रह कमजोर है तो उसे बलवान करने के लिए, आदित्य ह्रदय स्त्रोत का पाठ करें और साथ में सरसों के तेल का दीपक जलायें।
 
 * आर्थिक लाभ पाने के लिए आपको नियमित रूप से शुद्ध देशी गाय के घी का दीपक जलाना चाहिए।
 
 * शत्रुओं व विरोधियों के दमन हेतु भैरव जी के समक्ष सरसों के तेल का दीपक जलाने से लाभ होगा
 बटुक भैरव shotra का पाठ करें।
 
 
 * शनि की साढ़ेसाती व ढैय्या से पीड़ित लोग शनि मन्दिर में शनि स्त्रोत का पाठ करें और तिल के तेल का दीपक जलायें।
 
 * पति की आयु व अरोग्यता के लिए महुये के तेल का दीपक जलाने से अल्पायु योग भी नष्ट हो जाता है।
 
 * शिक्षा में सफलता पाने के लिए सरस्वती जी की आराधना करें और दो मुखी घी वाला दीपक जलाने से अनुकूल परिणाम आते हैं।
 
 * मां दुर्गा या काली जी प्रसन्नता के लिए एक मुखी दीपक गाय के घी में जलाना चाहिए।
 
 * भोले बाबा की कृपा बरसती रहे इसके लिए आठ या बारह मुखी पीली सरसों के तेल वाला दीपक जलाना चाहिए।
 
 * भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए सोलह बत्तियों वाला गाय के घी का दीपक जलाना लाभप्रद होता है।
 
 * हनुमान जी की प्रसन्नता के लिए तिल के तेल आठ बत्तियों वाला दीपक जलाना अत्यन्त लाभकारी रहता है। इसके अलावा आटे का दीपक बना कर चार बत्तियों का दीपक धन वृद्धि के लिए भी जला सकते है। हनुमान चालीसा का पाठ करें।
 
 *गुरु को बलवान करने के लिए बत्ती को हल्दी में रंग कर 4 मुँह का दीपक केले के पेड़ पर चढ़ाये।

* पूजा की थाली या आरती के समय एक साथ कई प्रकार के दीपक जलाये जा सकते हैं।

क्यों की जाती है भगवान की परिक्रमा????

क्यों की जाती है भगवान की परिक्रमा????
   
हिन्दू धर्म में परिक्रमा का बड़ा महत्त्व है। परिक्रमा से अभिप्राय है कि सामान्य स्थान या किसी व्यक्ति के चारों ओर उसकी बाहिनी तरफ से घूमना। इसको 'प्रदक्षिणा करना' भी कहते हैं, जो षोडशोपचार पूजा का एक अंग है। प्रदक्षिणा की प्रथा अतिप्राचीन है। वैदिक काल से ही इससे व्यक्ति, देवमूर्ति, पवित्र स्थानों को प्रभावित करने या सम्मान प्रदर्शन का कार्य समझा जाता रहा है। दुनिया के सभी धर्मों में परिक्रमा का प्रचलन हिन्दू धर्म की देन है। काबा में भी परिक्रमा की जाती है तो बोधगया में भी।

परिक्रमा मार्ग और दिशा : 'प्रगतं दक्षिणमिति प्रदक्षिणं’ के अनुसार अपने दक्षिण भाग की ओर गति करना प्रदक्षिणा कहलाता है। प्रदक्षिणा में व्यक्ति का दाहिना अंग देवता की ओर होता है। इसे परिक्रमा के नाम से प्राय: जाना जाता है। ‘शब्दकल्पद्रुम’ में कहा गया है कि देवता को उद्देश्य करके दक्षिणावर्त भ्रमण करना ही प्रदक्षिणा है।

प्रदक्षिणा का प्राथमिक कारण सूर्यदेव की दैनिक चाल से संबंधित है। जिस तरह से सूर्य प्रात: पूर्व में निकलता है, दक्षिण के मार्ग से चलकर पश्चिम में अस्त हो जाता है, उसी प्रकार वैदिक विचारकों के अनुसार अपने धार्मिक कृत्यों को बाधा विध्नविहीन भाव से सम्पादनार्थ प्रदक्षिणा करने का विधान किया गया। शतपथ ब्राह्मण में प्रदक्षिणा मंत्र स्वरूप कहा भी गया है, सूर्य के समान यह हमारा पवित्र कार्य पूर्ण हो।

दार्शनिक महत्व :इसका एक दार्शनिक महत्व यह भी है कि संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रत्येक ग्रह-नक्ष‍त्र किसी न किसी तारे की परिक्रमा कर रहा है। यह परिक्रमा ही जीवन का सत्य है। व्यक्ति का संपूर्ण जीवन ही एक चक्र है। इस चक्र को समझने के लिए ही परिक्रमा जैसे प्रतीक को निर्मित किया गया। भगवान में ही सारी सृष्टि समाई है, उनसे ही सब उत्पन्न हुए हैं, हम उनकी परिक्रमा लगाकर यह मान सकते हैं कि हमने सारी सृष्टि की परिक्रमा कर ली है। परिक्रमा का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व भी है।
 
भगवान शिव की अर्ध परिक्रमा क्यों..?????

शिवजी की आधी परिक्रमा करने का विधान है, वह इसलिए कि शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता है। जब व्यक्ति आधी परिक्रमा करता है तो उसे चंद्राकार परिक्रमा कहते हैं। शिवलिंग को ज्योति माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चंद्र। आपने आसमान में अर्ध चंद्र के ऊपर एक शुक्र तारा देखा होगा। यह शिवलिंग उसका ही प्रतीक नहीं है बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड ज्योतिर्लिंग के ही समान है।

'अर्द्ध सोमसूत्रांतमित्यर्थ: शिव प्रदक्षिणीकुर्वन सोमसूत्र न लंघयेत इति वाचनान्तरात।'

सोमसूत्र :शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र भी कहा जाता है। शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है। सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है, वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है।

क्यों नहीं लांघते सोमसूत्र :सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है अत: उसे लांघते समय पैर फैलाते हैं और वीर्य ‍निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे देवदत्त और धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट पैदा हो जाती है जिससे शरीर और मन पर बुरा असर पड़ता है अत: शिव की अर्ध चंद्राकार प्रदक्षिणा ही करने का शास्त्र का आदेश है।

तब लांघ सकते हैं :शास्त्रों में अन्य स्थानों पर मिलता है कि तृण, काष्ठ, पत्ता, पत्थर, ईंट आदि से ढंके हुए सोमसूत्र का उल्लंघन करने से दोष नहीं लगता है, लेकिन ‘शिवस्यार्ध प्रदक्षिणा’ का मतलब शिव की आधी ही प्रदक्षिणा करनी चाहिए।

किस ओर से परिक्रमा :भगवान शिवलिंग की परिक्रमा हमेशा बाईं ओर से शुरू कर जलाधारी के आगे निकले हुए भाग यानी जलस्रोत तक जाकर फिर विपरीत दिशा में लौटकर दूसरे सिरे तक आकर परिक्रमा पूरी करें।

किसकी कितनी परिक्रमा, जानिए... शास्त्रों के अनुसार पूजा के समय सभी देवी-देवताओं की परिक्रमा करने की परंपरा है। सभी देवी-देवताओं की परिक्रमा की संख्या अलग-अलग बताई गई है, जैसे दुर्गाजी की एक, ‍सूर्य की सात, गणेश की तीन, विष्णु की चार और शिव की आधी प्रदक्षिणा करना चाहिए।-नारद पुराण

किस देवता की कितनी प्रदक्षिणा करनी चाहिए, इस संदर्भ में ‘कर्म लोचन’ नामक ग्रंथ में लिखा गया है कि- ‘एका चण्ड्या रवे: सप्त तिस्र: कार्या विनायके। हरेश्चतस्र: कर्तव्या: शिवस्यार्धप्रदक्षिणा।’ अर्थात दुर्गाजी की एक, सूर्य की सात, गणेशजी की तीन, विष्णु भगवान की चार एवं शिवजी की आधी प्रदक्षिणा करनी चाहिए।

*तिलक लगाने के बाद यज्ञ देवता अग्नि या वेदी की तीन प्रदक्षिणा (परिक्रमा) लगानी चाहिए। ये तीन प्रदक्षिणा जन्म, जरा और मृत्यु के विनाश हेतु तथा मन, वचन और कर्म से भक्ति की प्रतीक रूप, बाएं हाथ से दाएं हाथ की तरफ लगाई जाती है।

*श्री गणेश की तीन परिक्रमा ही करनी चाहिए जिससे गणेशजी भक्त को रिद्ध-सिद्धि सहित समृद्धि का वर देते हैं।

*पुराण के अनुसार श्रीराम के परम भक्त पवनपुत्र श्री हनुमानजी की तीन परिक्रमा करने का विधान है। भक्तों को इनकी तीन परिक्रमा ही करनी चाहिए।

*माता दुर्गा मां की एक परिक्रमा की जाती है। माता अपने भक्तों को शक्ति प्रदान करती है।

*भगवान नारायण अर्थात् विष्णु की चार परिक्रमा करने पर अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

*एकमात्र प्रत्यक्ष देवता सूर्य की सात परिक्रमा करने पर सारी मनोकामनाएं जल्द ही पूरी हो जाती हैं।

*प्राय: सोमवती अमावास्या को महिलाएं पीपल वृक्ष की 108 परिक्रमाएं करती हैं। हालांकि सभी देववृक्षों की परिक्रमा करने का विधान है।

* जिन देवताओं की प्रदक्षिणा का विधान नही प्राप्त होता है, उनकी तीन प्रदक्षिणा की जा सकती है। लिखा गया है कि- ‘यस्त्रि: प्रदक्षिणं कुर्यात् साष्टांगकप्रणामकम्। दशाश्वमेधस्य फलं प्राप्रुन्नात्र संशय:॥'

* काशी ऐसी ही प्रदक्षिणा के लिए पवित्र मार्ग है जिसमें यहां के सभी पुण्यस्थल घिरे हुए हैं और जिस पर यात्री चलकर काशीधाम की प्रदक्षिणा करते हैं। ऐसे ही प्रदक्षिणा मार्ग मथुरा, अयोध्या, प्रयाग, चित्रकूट आदि में हैं।

* मनु स्मृति में विवाह के समक्ष वधू को अग्नि के चारों ओर तीन बार प्रदक्षिणा करने का विधान बतलाया गया है जबकि दोनों मिलकर 7 बार प्रदक्षिणा करते हैं तो विवाह संपन्न माना जाता है।

* पवित्र धर्मस्थानों- अयोध्या, मथुरा आदि पुण्यपुरियों की पंचकोसी (25 कोस की), ब्रज में गोवर्धन पूजा की सप्तकोसी, ब्रह्ममंडल की चौरासी कोस, नर्मदाजी की अमरकंटक से समुद्र तक छ:मासी और समस्त भारत खंड की वर्षों में पूरी होने वाली इस प्रकार की विविध परिक्रमाएं भूमि में पद-पद पर दंडवत लेटकर पूरी की जाती है। यही 108-108 बार प्रति पद पर आवृत्ति करके वर्षों में समाप्त होती है।

प्रदक्षिणा का लाभ, धार्मिक महत्व :भगवान की परिक्रमा का धार्मिक महत्व तो है ही, विद्वानों का मत है भगवान की परिक्रमा से अक्षय पुण्य मिलता है, सुरक्षा प्राप्त होती है और पापों का नाश होता है। पग-पग चलकर प्रदक्षिणा करने से अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। सभी पापों का तत्क्षण नाश हो जाता है। प्रदक्षिणा करने से तन-मन-धन पवित्र हो जाते हैं व मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। जहां पर यज्ञ होता है वहां देवताओं साथ गंगा, यमुना व सरस्वती सहित समस्त तीर्थों आदि का वास होता है।

प्रदक्षिणा या परिक्रमा करने का मूल भाव स्वयं को शारीरिक एवं मानसिक रूप से भगवान के समक्ष समर्पित कर देना भी है।

परिक्रमा करने का व्यावहारिक और वैज्ञानिक पक्ष वास्तु और वातावरण में फैली सकारात्मक ऊर्जा से जुड़ा है। दरअसल, भगवान की पूजा-अर्चना, आरती के बाद भगवान के उनके आसपास के वातावरण में चारों ओर सकारात्मक ऊर्जा एकत्रित हो जाती है इस सकारात्मक ऊर्जा के घेरे के भीतर चारों और परिक्रमा करके व्यक्ति के भीतर भी सकारात्मक ऊर्जा का विकास होता और नकारात्मकता घटती है। इससे मन में विश्वास का संचार होकर जीवेषणा बढ़ती है।

परिक्रमा करने का नियम जानना जरूरी.. परिक्रमा प्रारंभ करने के पश्चात बीच में रुकना नहीं चाहिए। परिक्रमा वहीं पूर्ण करें, जहां से प्रारंभ की गई थी। परिक्रमा बीच में रोकने से वह पूर्ण नहीं मानी जाती। परिक्रमा के दौरान किसी से बातचीत न करें। जिस देवता की परिक्रमा कर रहे हैं, उनका ही ध्यान करें। इस प्रकार परिक्रमा करने से अभीष्ट एवं पूर्ण लाभ की प्राप्ति होती है

परिक्रमा पूर्ण करने के पश्चात भगवान को दंडवत प्रणाम करना चाहिए। जो लोग तीन प्रदक्षिणा साष्टांग प्रणाम करते हुए करते हैं, वे दश अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करते हैं। जो लोग सहस्रनाम का पाठ करते हुए प्रदक्षिणा करते हैं, वे सप्त द्वीपवती पृथ्वी की परिक्रमा का पुण्य प्राप्त करते हैं।

बृहन्नारदीय में लिखा गया है कि जो भगवान विष्णु की तीन परिक्रमा करते हैं, वे सभी प्रकार के पापों से विमुक्त हो जाते हैं। इसका मतलब यह समझ में आता है कि कामना के अनुसार भी प्रदक्षिणा की संख्या का विचार किया गया है। विष्णु स्मृति में कहा गया है कि एक हाथ से प्रणाम करना, एक प्रदक्षिणा एवं अकाल में विष्णु का दर्शन पूर्व में किए गए पुण्य की हानि करता है।

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श्री हरिदास ठाकुर जी

श्री हरिदास ठाकुर जी

श्री हरिदास ठाकुर जी अब बहुत वृद्ध हो गए हैं, तो भी नित्य तीन लाख नाम जाप करते है।

एक दिन गोबिंद हरिदास जी को श्री जगन्नाथ जी का महाप्रसाद देने गए, तो देखा कि वे लेटे- लेटे धीरे-धीरे हरिनाम कर रहे है।

गोबिंद ने कहा- “हरिदास, उठो, प्रसाद लो।” 

हरिदास जी उठे, उठकर बोले- "मेरी नाम संख्या अभी तक पूरी नहीं हुई है।” 

इतना कहकर उन्होंने प्रसाद की उपेक्षा न हो, इसलिए एक चावल प्रसाद का दाना मुख में डाला और लेट गये।

हरिदास जी की ऐसी अवस्था सुन दूसरे दिन श्री चैतन्य महाप्रभु जी ने आकर पूछा- “हरिदास, स्वस्थ तो हो?” 

हरिदास जी बोले – प्रभु, शरीर तो स्वस्थ है, पर मन स्वस्थ नहीं, क्योकि वृद्ध अवस्था के कारण नाम जप संख्या पूरी नहीं कर पाता हूँ। 

यह सुनकर महाप्रभु का हृदय द्रवित हो गया, पर मन का भाव छिपाते हुए उन्होंने कहा -"हरिदास तुम तो सिद्ध हो, लोक कल्याण के लिए तुम्हारा अवतार हुआ है।
अब वृद्ध हो गए हो तो जप की संख्या कुछ कम कर दो।"

अपनी प्रशंसा सुनकर हरिदास जी प्रभु के चरणों में गिर पड़े और बोले- "प्रभु मै अति नीच हूँ, आपकी प्रशंसा पाने के योग्य नहीं हूँ।"

चैतन्य महाप्रभु हरिदास जी की दीन वाणी सुनकर हरिदास के विषादपूर्ण मुख की ओर छल-छलाते नेत्रो से देर तक देखते रहे।

हरिदास जी ने चैतन्य महाप्रभु जी से कहा- "प्रभु मेरा एक निवेदन है, यदि आप मुझसे प्रसन्न है, तो आप मुझसे पहले नही, मै आपसे पहले देह त्याग कर जाना चाहता हूँ, प्रभु मैं आपका विरह सहन नहीं कर पाऊंगा।"

यह सुनकर चैतन्य महाप्रभु का हृदय दुखी हो गया अश्रुपूर्ण नेत्रों से रुधे कंठ से बोले-“हरिदास, तुम चले जाओगे तो मै कैसे रहूंगा?
क्यों अपने संग सुख से मुझे वंचित करना चाहते हो, तुम्हारे जैसे भक्त को छोड़ मेरा कौन है?"

हरिदास जी ने कहा - “प्रभु, कोटि-कोटि महापुरुष तुम्हारी लीला के सहायक है।
मेरे जैसे शुद्र जीव के मर जाने से तुम्हारी क्या हानि होगी?"

इतना कह रोते-रोते हरिदास जी ने महाप्रभु के श्री चरण पकड़ लिए।

श्री चरणों में सिर देकर कम्पित स्वर से हरिदास जी बोले- "मैं जाना चाहता हूँ आपके चरण कमल अपने वक्ष स्थल पर धारणकर ओर आपका श्रीमुख देखते-देखते, मधुर नाम लेते लेते, बोलो प्रभु, यह वर दे रहे हो न?” 

महाप्रभु ने एक गहरी साँस ली और धीरे से बोले- “हरिदास, तुम जो भी इच्छा करोंगे, श्री कृष्ण उसे पूर्ण किये बिना न रह सकेंगे, पर मैं तुम्हारे बिना कैसे रहूँगा।"

इतना कह चैतन्य महाप्रभु जी चुप हो गए...

थोड़ी देर में उच्च स्वर से ‘हरिदास, हरिदास, कह उनसे लिपट कर रोने लगे, चैतन्य महाप्रभु जी के नयन जल से हरिदास जी का वक्ष स्थल भीग गया ओर स्पर्श से सर्वांग पुलकित हो उठा।

हरिदास जी आश्वस्त होकर महाप्रभु से बोले- "कल प्रात: जगन्नाथ जी के दर्शन कर इस अधम को दर्शन देने की कृपा करे।"

महाप्रभु समझ गए कि हरिदास चाहते हैं कल ही उनकी इच्छा पूर्ण हो।

दूसरे दिन प्रात:काल चैतन्य महाप्रभु श्री जगन्नाथ जी के दर्शन कर स्वरुप दामोदर, राय रामानंद ,सार्वभोम भट्टाचार्य, वक्रेश्वर पंडित आदि प्रमुख भक्तों को साथ ले हरिदास जी की कुटिया में आये।

भक्तों ने सोचा आज महाप्रभु हरिदास जी के पास जा रहे हें, अवश्य कोई विशेष लीला होनी है।

कुटिया में पहुँचते ही महाप्रभु ने कहा -"हरिदास, क्या समाचार है?” 

हरिदास जी ने उत्तर दिया- “दास प्रस्तुत है।” 

कहते-कहते हरिदास जी ने महाप्रभु और भक्तों को प्रणाम किया।

हरिदास जी दुर्बलता के कारण खड़े नहीं रह सकते थे, चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें बैठाकर भक्तों सहित उनके चारों और नृत्य और हरिनाम संकीर्तन किया।

नृत्य कर रहे है स्वरुप, व्रकेश्वर और स्वयम महाप्रभु, रामानंद और सार्वभोम गान करने लगे।

हरिदास जी उनकी चरणधूलि लेकर अपने सर्वांग में मल रहे है।

हरिदास जी वहाँ धीरे-धीरे लेट गए और धीरे-धीरे महाप्रभु के चरण कमल अपने हृदय पर धारण किये।

महाप्रभु के चरणकमल हाथ से पकड़े हुए हरिदास जी ने अपने दोनों नेत्र प्रभु के मुख चन्द्र पर अर्पित किये और नेत्रों से प्रेमाश्रु विसर्जन करते-करते ‘हा गौरांग, ” कहकर प्राण त्यागे....

भक्तगण हरिदास जी का इस प्रकार निर्याण देखकर अवाक रह गए।
पहले किसी को विश्वास ही नहीं हुआ कि हरिदास जी ने स्वेच्छा से शरीर त्याग किया है।

मृत्यु पर भक्त की विजय और उसकी महिमा में वृद्धि देख महाप्रभु के हृदय में आनंद नहीं समां रहा और साथ ही जिस भक्त पर वे इतना गर्व करते थे, जिसके दर्शन कर वे तृप्ती अनुभव करते थे उनके संग से सहसा वंचित हो जाने के कारण अत्यंत दुखी भी थे।

आनंद एंवम विषाद के बीच महाप्रभु ने हरिदास जी के मृत शरीर को गोद में लेकर नृत्य आरम्भ किया उनकी आँखों से प्रेमाश्रु बह रहे थे।

भक्त ही उनके सब कुछ है, प्रत्येक भक्त के लिए उनका प्रेम अनंत है।

नृत्य समाप्त कर महाप्रभु ने हरिदास जी का गुणगान कर अपने हृदय की व्यथा को शांत किया।
थोड़ी देर बाद हरिदास जी के शरीर को समुद्र की ओर ले चले।

चैतन्य महाप्रभु आगे नृत्य करते जा रहे है, पीछे-पीछे भक्तवृन्द जा रहे है।

प्रभु ने समुद्र तट पर जाकर हरिदास की देह को स्नान कराया ओर महाप्रभु बोले- “आज से यह समुद्र महातीर्थ हुआ।” 

तब समुद्र तीर पर बालुका में हरिदास जी को समाधि दी।

हरिदास जी को माला ओर चंदन अर्पण कर उनका चरणोदक पीकर भक्तों ने उनके शरीर को समाधि में शयन कराया।

महाप्रभु ने अपने हाथ से समाधि में बालुका दी।

भक्तों सहित ‘हरि बोल, हरि बोल” की ध्वनि के साथ समाधि की परिक्रमा करते हुए नृत्य कीर्तन किया तथा उसके पश्चात सबने समुद्र स्नान किया ओर पुन: समाधि की परिक्रमा कर कीर्तन करते हुए श्री जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार पर पंसारियो की जो दुकानें है उनसे महाप्रभु ने भिक्षा देने को कहा।

पंसारी डलिया भर-भर कर भिक्षा देने लगे। 

महाप्रभु को स्वयं भिक्षा करते देख भक्त बहुत दुखी हुए, उन्होंने महाप्रभु से हाथ जोड़कर निवेदन किया "प्रभु आप अपने स्थान पर चले हम भिक्षा लेकर आते है।"

महाप्रभु स्वरुप गोस्वामी के मुख की ओर देखकर उच्च स्वर से रो पड़े मानो कह रहे हो अपने प्रिय हरिदास के उत्सव के लिए भिक्षा करने को मना कर तुम मेरे साथ अन्याय कर रहे हो।

प्रभु को दुखी मन से अपने स्थान जाना पड़ा। 

विराट महोत्सव हुआ, महाप्रभु ने अपने हाथ से
महाप्रसाद परोसना आरम्भ किया।

फिर भक्तों के साथ महाप्रभु प्रसाद पा रहे है ओर उच्च स्वर में हरिदास जी के गुणों का कीर्तन कर रहे है।

महोत्सव समाप्त होने पर महाप्रभु ने सबको वरदान देते हुए कहा- “हरिदास के निर्याण का जिन्होंने दर्शन किया, नृत्य कीर्तन किया, उनकी समाधी में बालू दी ओर जिन्होंने उनके महोत्सव में महाप्रसाद पाया उन सबको जल्दी ही श्री कृष्ण की प्राप्ति होगी।”

'जय श्री कृष्ण' 'जय श्री चैतन्य हरिदास'

मधुराष्टकम्

*🌹मधुराष्टकम् 🌹*
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अधरं मधुरं वदनं मधुरं, 
नयनं मधुरं हसितं मधुरम्।
हृदयं मधुरं गमनं मधुरं 
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥१॥

(हे कृष्ण !) आपके होंठ मधुर हैं, आपका मुख मधुर है, आपकी ऑंखें मधुर हैं, आपकी मुस्कान मधुर है, आपका हृदय मधुर है, आपकी चाल मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ॥१॥ 

वचनं मधुरं चरितं मधुरं
वसनं मधुरं वलितं मधुरम्।
चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥२॥

आपका बोलना मधुर है, आपके चरित्र मधुर हैं, आपके वस्त्र मधुर हैं, आपका तिरछा खड़ा होना मधुर है, आपका चलना मधुर है, आपका घूमना मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ॥२॥ 

वेणुर्मधुरो रेणुर्मधुरः
पाणिर्मधुरः पादौ मधुरौ।
नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं 
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥३॥

आपकी बांसुरी मधुर है, आपके लगाये हुए पुष्प मधुर हैं, आपके हाथ मधुर हैं, आपके चरण मधुर हैं , आपका नृत्य मधुर है, आपकी मित्रता मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है।

गीतं मधुरं पीतं मधुरं 
भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरम् ।
रूपं मधुरं तिलकं मधुरं 
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥४॥

आपके गीत मधुर हैं, आपका पीना मधुर है, आपका खाना मधुर है, आपका सोना मधुर है, आपका रूप मधुर है, आपका टीका मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ॥४॥

करणं मधुरं तरणं मधुरं 
हरणं मधुरं रमणं मधुरम्।
वमितं मधुरं शमितं मधुरं 
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥५॥

आपके कार्य मधुर हैं, आपका तैरना मधुर है, आपका चोरी करना मधुर है, आपका प्यार करना मधुर है, आपके शब्द मधुर हैं, आपका शांत रहना मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ॥५॥ 

गुंजा मधुरा माला मधुरा 
यमुना मधुरा वीची मधुरा।
सलिलं मधुरं कमलं मधुरं 
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥६॥

आपकी घुंघची मधुर है, आपकी माला मधुर है, आपकी यमुना मधुर है, उसकी लहरें मधुर हैं, उसका पानी मधुर है, उसके कमल मधुर हैं, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ॥६॥ 

गोपी मधुरा लीला मधुरा 
युक्तं मधुरं मुक्तं मधुरम् ।
दृष्टं मधुरं शिष्टं मधुरं 
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥७॥

आपकी गोपियाँ मधुर हैं, आपकी लीला मधुर है, आप उनके साथ मधुर हैं, आप उनके बिना मधुर हैं, आपका देखना मधुर है, आपकी शिष्टता मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ॥७॥

गोपा मधुरा गावो मधुरा
यष्टिर्मधुरा सृष्टिर्मधुरा।
दलितं मधुरं फलितं मधुरं 
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥८॥

आपके गोप मधुर हैं, आपकी गायें मधुर हैं, आपकी छड़ी मधुर है, आपकी सृष्टि मधुर है, आपका विनाश करना मधुर है, आपका वर देना मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ॥८॥

Jay Shri Krishna 🙏🏻🌹👏🏻

जानिए क्या है 84 कोसी यात्रा और हर व्यक्ति को क्यों करनी चाहिए यह यात्रा?

🍀🌷 राधे राधे🌷🌿🌹🙏🌹

जानिए क्या है 84 कोसी यात्रा और हर व्यक्ति को क्यों करनी चाहिए यह यात्रा?
वेद-पुराणों में ब्रज की 84 कोस की परिक्रमा का बहुत महत्व है, ब्रज भूमि भगवान श्रीकृष्ण एवं उनकी शक्ति राधा रानी की लीला भूमि है। इस परिक्रमा के बारे में वारह पुराण में बताया गया है कि पृथ्वी पर 66 अरब तीर्थ हैं और वे सभी चातुर्मास में ब्रज में आकर निवास करते हैं। करीब 268 किलोमीटर परिक्रमा मार्ग में परिक्रमार्थियों के विश्राम के लिए 25 पड़ावस्थल हैं। 

इस पूरी परिक्रमा में करीब 1300 के आसपास गांव पड़ते हैं। कृष्ण की लीलाओं से जुड़ी 1100 सरोवरें, 36 वन-उपवन, पहाड़-पर्वत पड़ते हैं। बालकृष्ण की लीलाओं के साक्षी उन स्थल और देवालयों के दर्शन भी परिक्रमार्थी करते हैं, जिनके दर्शन शायद पहले ही कभी किए हों। परिक्रमा के दौरान श्रद्धालुओं को यमुना नदी को भी पार करना होता है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने मैया यशोदा और नंदबाबा के दर्शनों के लिए सभी तीर्थों को ब्रज में ही बुला लिया था। 

84 कोस की परिक्रमा लगाने से 84 लाख योनियों से छुटकारा पाने के लिए है। परिक्रमा लगाने से एक-एक कदम पर जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं। शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि इस परिक्रमा के करने वालों को एक-एक कदम पर अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। साथ ही जो व्यक्ति इस परिक्रमा को लगाता है, उस व्यक्ति को निश्चित ही मोक्ष की प्राप्ति होती है। 

सभी तीर्थों को ब्रज में बुलाया गया था यह गर्ग संहिता में कहा गया है। यशोदा मैया और नंद बाबा ने भगवान श्री कृष्ण से 4 धाम की यात्रा की इच्छा जाहिर की तो भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि आप बुजुर्ग हो गए हैं, इसलिए मैं आप के लिए यहीं सभी तीर्थों और चारों धामों को आह्वान कर बुला देता हूं। 

उसी समय से केदरनाथ और बद्रीनाथ भी यहां मौजूद हो गए। 84 कोस के अंदर राजस्थान की सीमा पर मौजूद पहाड़ पर केदारनाथ का मंदिर है। इसके अलावा गुप्त काशी, यमुनोत्री और गंगोत्री के भी दर्शन यहां श्रद्धालुओं को होते हैं। तत्पश्चात यशोदा मैया व नन्दबाबा ने उनकी परिक्रमा की। तभी से ब्रज में चौरासी कोस की परिक्रमा की शुरुआत मानी जाती है।

यात्रा           मुकाम (गाँव के नाम)       किमी.

1.              मथुरा यात्रा प्रारम्भ              0
2.               जयगुरुदेव मन्दिर               3
3.               मोहनपुर + अडूकी             5
4.               तारसी                              3
5.              नवीपुर अ कुदरवन              5
6.              लालपुर                             2
7.               नगला भूरिया                     3
8.              पाली + अड्डा                      2
9.               कोठी                               2
10.               श्यौबा                            1
11.               ओड़म                           2
12.               सौंख (कस्बा)                 2
13.               बछगाँव                         3
14.               कोंथरा                          6
15.               साँवई खेड़ा                    3
16.               नगला दादू                     3
17.               बहज (राजस्थान)            2
18.               डीग (कस्बा)                   6
19.              दिदावली                         3
20.               टांकौली                         3
21.              तुसारिया का नगला           3
22.               खोह                              3
23.               करमू का नगला               1
24.              अलीपुर                          2
25.              आदिबद्री                        2
26.              पसोपा                           5
27.              बरोली धाऊ                     3
28.              केदारनाथ                       5
29.              बादली                            2
30.              लहसर                            3
31.              अंगरावली                       2
32.               चरण पहाड़ी                   1
33.              किलावटा                        5
34.               भोजन थाली                   2
35.               नन्देरा का वास                 2
36.               भेवनका नं. (रनदेवा वास)  2
37.               सतवास                          3
38.               ऐंचवाड़ा                          1
39.               पथवारी                           3
40.               किरावटा                          3
41.               नौनेरा (राजस्थान)              3
42.               गढ़ी (उ.प्र.)                       3
43.               बिछोर (हरि.) कस्बा            6
44.               नीमका                             3
45.               डाड़का                             3
46.               सौन्द                                3
47.               बंचारी (कस्बा)                   3
48.               डकोरा                              3
49.               भरोली                              3
50.               खामी                               5
51.               लीखई                              5
52.               हसनपुर (हरि.) कस्बा          3
53.               जमुनापार मारव (उ.प्र.)       9
54.               जैदपुरा                             5
55.               मानागढ़ी                           2
56.               भमरौला                            2
57.               कटैलिया (बाघई)                4
58.               भूतगढ़ी                            2
59.               बाजना (उ.प्र.)                   1
60.               पारसौली                          3
61.               सलाका                            2
62.               बरौठ                               2
63.               पिथौरा                             3
64.               मीरपुर                              3
65.               सुल्तानपुर                         3
66.               सुरीर (कस्बा)                     2
67.                परसोती गढ़ी                     2
68.                 टैंटीगाँव                           2
69.                 हिन्डौल                           2
70.                 नसीटी                            3
71.                 हुलासीगढ़ी                      3
72.                 उमरारौ                           3
73.                 न. जीवनलाल (सीताराम)  2
74.                 न. हरदयाल                     2
75.                 न. बरीका (जावरा)            3
76.                 पपरेला                            3
77.                 कसरा दबे                        2
78.                 सुकनगढ़                         3
79.                 सरदारगढ़                        3
80.                 ईश्वर का न.                       2
81.                 थाना मरवै                        2
82.                 राया (कस्बा)                     2
83.                 सियरा                             2
84.                 हवेली                             3
85.                 कारव                              3
86.                 बन्दी                                3
87.                 बल्देव (दाऊजी) कस्बा       5
88.                 हथौड़ा                             2
89.                 नूरपुर                              3
90.                 पूठा का नगला                  2
91.                 चिन्ताहरण                       2
92.                 ब्रह्माण्ड घाट                     1
93.                 गोकुल पुराना उक्खन बंधन  1
94.                 रमणरेती (आश्रम)             2
95.                 जमुनापार कोयला             2
96.                 रांची                                2
97.                 गोपालपुरा                        2
98.                 मथुरा (यात्रा समाप्त)                

    
      "ब्रज चौरासी कोस यात्रा"

          ब्रज  चौरासी कोस की परिकम्मा एक  देत।
          लख  चौरासी योनि  के  संकट हरिहर लेत॥

          एक बार नन्दबाबा और यशोदा मैया ने सभी तीर्थ स्थलों के दर्शन-यात्रा पर जाने की इच्छा प्रकट की। तो श्री कृष्ण जी ने उनसे कहा, "मैया, मैं सारे तीर्थों को ब्रज में ही बुला लेता हूँ। तुम ब्रज में ही सभी तीर्थ-स्थलों की दर्शन-यात्रा कर लेना। अतः समस्त तीर्थ ठाकुर जी की आज्ञानुसार ब्रज में निवास करने लगे। ऐसा माना गया है कि ब्रज-धाम की परिक्रमा-यात्रा सर्वप्रथम चतुर्मुख ब्रह्मा जी ने की थी। वत्स हरण के पश्चात् उनके अपराध की शान्ति के लिये स्वयं श्रीकृष्ण ने उन्हें ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा करने का आदेश दिया था। तभी से ब्रज यात्रा का सूत्रपात हुआ। श्री कृष्ण जी के प्रपौत्र श्री वज्रनाभजी द्वारा भी ब्रज यात्रा की गयी थी। कालांतर में परम रसिक संत शिरोमणि श्री स्वामी हरिदासजी, श्री हरिवंश जी, श्रीवल्लभाचार्य जी, श्री हरिराम व्यास जी, श्री चैतन्य महाप्रभु जी आदि अनेक वैष्णव एवं गौड़ीय सम्प्रदाय आचार्यों द्वारा ब्रज यात्रा का सुत्र पात हुआ,  जिसे आज भी लाखों भक्त प्रतिवर्ष करते हैं। ब्रज चौरासी कोस की यात्रा करने से मनुष्य को चौरासी लाख योनियों से छुटकारा मिल जाता है।

                    ब्रज शब्द का अर्थ एवं क्षेत्र

          सत्य, रज, तम इन तीनों गुणों से अतीत जो पराब्रह्म है, वही व्यापक है। इसीलिए उसे ही ब्रज कहते हैं। यह सच्चिदानन्द स्वरूप परम ज्योतिर्मय और अविनाशी है। वेदों में भी ब्रज शब्द का प्रयोग हुआ है। 

                  "व्रजन्ति गावो यस्मिन्नति ब्रज:" 

          अर्थात् गौचारण की स्थली ही ब्रज कहलाती है। हरिवंश पुराणानुसार मथुरा के आस-पास की स्थली को ब्रज की संज्ञा दी गयी है। अष्टछाप के कवियों ने ब्रज शब्द को गोचारण, गोपालन तथा गौ और ग्वालों के विहार स्थल के रूप में वर्णित किया है। ब्रज में उत्तर प्रदेश का मथुरा जिला, राजस्थान के भरतपुर जिले की डीग और कामां तहसील एवं हरियाणा के फ़रीदाबाद जिले की होडल तहसील आती है।

                           ब्रज की महिमा

        हमारे देश की पवित्र भूमि ब्रज का स्मरण करते ही हृदय प्रेम रस से सराबोर हो जाता है, एवं श्री कृष्ण के बाल रूप की छवि मन-मस्तिष्क पर अंकित होने लगती है। ये ब्रज की महिमा है की सभी तीर्थ स्थल भी ब्रज में निवास करने को उत्सुक हुए थे एवं उन्होने श्री कृष्ण से ब्रज में निवास करने की इच्छा जताई। ब्रज की महिमा का वर्णन करना बहुत कठिन है क्योंकि इसकी महिमा गाते गाते ऋषि-मुनि भी तृप्त नहीं होते। भगवान श्री कृष्ण द्वारा वन गोचारण से ब्रज रज का कण-कण कृष्णरूप हो गया है तभी तो समस्त भक्त जन यहाँ आते हैं और इस पावन रज को शिरोधार्य कर स्वयं को कृतार्थ करते हैं। ब्रज में तो विश्व के पालनकर्ता  माखनचोर बन गये। इस सम्पूर्ण जगत के स्वामी को ब्रज में गोपियों से दधि का दान लेना पड़ा। जहाँ सभी देव, ऋषि मुनि, ब्रह्मा, शंकर आदि श्री कृष्ण की कृपा पाने हेतु वेद-मंत्रों से स्तुति करते हैं, वहीं ब्रजगोपियों की तो गाली सुनकर ही कृष्ण उनके ऊपर अपनी अनमोल कृपा बरसा देते हैं। रसखान ने ब्रज रज की महिमा बताते हुए कहा है-

          "एक ब्रज रेणुका पै चिन्तामनि वार डारूँ" 

      वास्तव में महिमामयी ब्रजमण्डल की कथा अकथनीय है क्योंकि यहाँ श्री ब्रह्मा जी, शिवजी, ऋषि-मुनि, देवता आदि तपस्या करते हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार श्री ब्रह्मा जी कहते हैं-भगवान् ! मुझे इस धरातल पर विशेषतः गोकुल में किसी साधारण जीव की योनि मिल जाय, जिससे मैं वहाँ की चरण-रज से अपने मस्तक को अभिषिक्त करने का सौभाग्य प्राप्त कर सकूँ। भगवान शंकर जी को भी यहाँ गोपी बनना पड़ा -
          "नारायण ब्रजभूमि को, को न नवावै माथ, 
           जहाँ  आप  गोपी  भये  श्री गोपेश्वर नाथ।

सूरदास जी ने लिखा है - 

                  "जो  सुख ब्रज  में  एक  घरी, 
                   सो सुख तीन लोक में नाहीं"।

          बृज की ऐसी विलक्षण महिमा है कि स्वयं मुक्ति भी इसकी आकांक्षा करती है -

        मुक्ति   कहै   गोपाल  सौ   मेरि  मुक्ति   बताय।
        ब्रज रज उड़ि मस्तक लगै मुक्ति मुक्त हो जाय॥

        श्री कृष्ण जी उद्धव जी से कहते हैं -

         "’ऊधौ मोहि ब्रज बिसरत नाहीं।
           हंस-सुता की सुन्दर कगरी, 
                             अरु कुञ्जनि की  छाँहीं। 
           ग्वाल-बाल मिलि करत कुलाहल, 
                             नाचत गहि - गहि बाहीं॥
          यह  मथुरा कञ्चन की नगरी, 
                            मनि  -  मुक्ताहल   जाहीं। 
          जबहिं सुरति आवति वा सुख की, 
                           जिय  उमगत   तन  नाहीं॥
          अनगन भाँति करी बहु लीला, 
                           जसुदा     नन्द     निबाहीं। 
          सूरदास  प्रभु रहे मौन ह्वै,  
                          यह  कहि-कहि  पछिताहीं॥
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                       "जय जय श्री राधे"
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महारास लीला भगवान से साक्षात प्राप्ति की कथा हैं।

महारास लीला भगवान से साक्षात प्राप्ति की कथा हैं।🙏🏻🌹

ये महारास लीला कोई साधारण लीला नहीं हैं। ये भगवान से साक्षात प्राप्ति की कथा हैं। गुरुदेव कहते हैं भगवान की लीला में  गंद नही भरा हुआ हैं हमारे अंदर गंद भरा हुआ हैं जिस कारण हमे शंका हो रही हैं।  आज रास शब्द को इतना गन्दा कर दिया हैं की कोई भी कहता हैं, फलाना व्यक्ति वहां रास रचाता मिला। रास का वास्तविक अर्थ हैं। रस का समूह। 

रसो वै सः – वह वास्तवमें रस है। भगवान श्री कृष्ण रस है।  रसानाम् समूहः इति रासः।

अर्थात् रसों के समूह को रास  कहते हैं। परब्रह्म परमात्मा जो रस है उनकी रसमयी क्रीडा जो रसोका समूह यानि एकत्रीकरण है वह रास है।

गुरुदेव एक सुंदर भाव बताते हैं की परमात्मा का एहसास ही रास हैं। आत्मा का परमात्मा से मिलन ही रास हैं। जबकि जीवात्मा का परमात्मा से मिलन महारास हैं।
गोपी कोई स्त्री नही हैं। किसी स्त्री का नाम गोपी नही हैं। गोपी कौन हैं? 

ब्रज के संत बताते हैं- गोपी कोई साधारण गोपी नही हैं। जिसकी आँखों का काजल बन कर भगवान कृष्ण बसे रहते हो वो जीव गोपी हैं। स्त्री हो, पुरुष हो, चाहे कोई भी हो। जो कृष्ण प्रेम में डूब गया वो गोपी हैं। जिसे आठों याम हर अवस्था में कृष्ण ही कृष्ण दिखाई देते हैं। वो गोपी। 

केवल श्रृंगार करके या जोगन बन के ऐसे वृन्दावन की गलियों में घूमना या कहीं भी घूमना ये दिखावा करना गोपी नही हैं। वो गोपी भेष हो सकता हैं। पर वास्तव में जब हमें न कहना पड़े की हम गोपी हैं साक्षात परमात्मा आ जाये कहने के लिए की हाँ ये मुझसे प्रेम करता हैं और ये मेरी गोपी हैं। 

तब भक्ति सार्थक हैं। जिसको अपना होश हैं वो गोपी नहीं हैं। जिसके केवल अपने प्रियतम का होश हैं वह गोपी हैं। नारद जी कहते हैं परमात्मा का विस्मरण होते ही ह्रदय का व्याकुल हो जाना ही भक्ति हैं। गोपी एक क्षण के लिए भी भगवान को नही भूलती।

इंद्रियों का अर्थ ‘गोपी’ भी होता है। जो अपनी इंद्रियों से भगवत रस का पान करे, उसे गोपी कहा जाता है।

महारास भगवान कृष्ण और गोपियों की उस अद्भुत अभिभूत करने वाली नृत्य व् संगीत की अनुपम लीला है जिसमे की संदेह होकर विदेह का वर्णन मिलता है। यह चेतना का परम चेचना से मिलान का संयोग है। यह भक्ति की शुद्धतम अवस्था है।  गोपियाँ कोई साधारण स्त्रियां नहीं बल्कि वेद की ऋचाएं (वेद की ऋचाएं कुल एक लाख हैं। जिनमें 80 हजार कर्मकाण्ड और 16 हजार उपासना काण्ड की एवं चार हजार ज्ञान काण्ड की हैं।) कुछ गोपियाँ तो जनकपुर धाम से पधारी हैं जिन्हें भगवती सीता जी की कृपा प्राप्त है।

त्रेतायुग में भगवान राम जब भगवान राम को दंडकारण्य के ऋषि-मुनियों ने धनुष बाण लिए वनवासी के रूप में देखा तो इनकी इच्छा हुई की प्रभो! हम तो आपकी रासलीला में प्रवेश पाने की प्रतीक्षा में तप कर रहे हैं। तो ये दंडकारण्य वन के ऋषि मुनि हैं।

जनकपुर धाम में सीता से विवाह कर जब श्रीराम अवध वापस लौटे तो अवधवासिनी स्त्रियाँ श्रीराम को देखकर सम्मोहित हो गईं। श्रीराम से प्राप्त वर के प्रभाव से वे स्त्रियाँ ही चंपकपुरी के राजा विमल के यहाँ जन्मी । महाराज विमल ने अपनी पुत्रियाँ श्रीकृष्ण को समर्पित कर दीं और स्वयं श्रीकृष्ण में प्रवेश कर गए। इन विमल पुत्रियों को भी श्रीकृष्ण ने रासलीला में प्रवेश का अधिकार दिया।
➖वनवासी जीवन यापन करते हुए पंचवटी में श्रीराम की मधुर छवि का दर्शन कर भीलनी स्त्रियाँ मिलने को आतुर हो उठीं और श्रीराम विरह की ज्वाला में अपने प्राणों का त्याग करने को उद्यत हो गईं। तब ब्रह्मचारी वेष में प्रकट होकर श्रीराम ने उन्हें द्वापर में श्रीकृष्ण मिलन का आश्वासन दिया।
➖भगवान धन्वन्तरि के विरह में संतप्त औषधि लताएँ भी श्रीहरि की कृपा से वृंदावन में गोपी बनने का सौभाग्य प्राप्त करती हैं।
जालंधर नगर की स्त्रियाँ वृंदापति श्रीहरि भगवान का दर्शन कर कामिनी भाव को प्राप्त हो जाती हैं और श्रीहरि भगवान की कृपा से जालंधरी गोपी रूप में रासलीला में प्रवेश का सौभाग्य प्राप्त करती हैं।
मत्स्यावतार में श्रीहरि भगवान का दर्शन कर समुद्र कन्याएँ कामोन्मत्त हो जाती हैं और वे भी भगवान मत्स्य से प्राप्त वर के प्रभाव से समुद्री गोपी बनकर रासलीला में प्रवेश का अधिकार प्राप्त करती हैं।

र्हिष्मती की स्त्रियाँ भगवान पृथु का दर्शन कर भावोन्मत्त हो जाती हैं और पृथु कृपा से ही वार्हिष्मती गोपी बनने का सौभाग्य प्राप्त करती हैं।

गन्धमादन पर्वत पर भगवान नारायण के कामनीय रूप का दर्शन कर स्वर्ग की अप्सराएँ सम्मोहित हो जाती हैं और नारायण कृपा से ही नारायणी गोपी बनकर प्रकट हो जाती हैं।

इसी प्रकार सुतल देश की स्त्रियाँ भगवान वामन की कृपा से गोपी बनती हैं।
दण्डक वन के ऋषि, आसुरी कन्याएं व् भगवान के भक्तों ने भगवान की आराधना कर गोपियों का शरीर धारण किया। महारास(maharas) में भगवान ने अपने दिए हुए वचन के अनुसार इन सभी को आमंत्रित किया और सभी को महारास में शामिल कर अपना वचन निभाया।

गोपियों के स्रोत और स्वरूप अनन्त हैं। परंतु ये सभी साधन सिद्धा हैं और इनकी सकाम उपासना है।

हम लोग प्रेम के विषय में बोलते बहुत हैं करते नहीं हैं। जबकी गोपियाँ बोलती नहीं हैं बस प्रेम करती हैं। बिना बोले ही आपकी पुकार उस परमात्मा तक पहुँच जाये। जो शरीर नही हैं आत्मा हैं।

याद वो नहीं होती जो तन्हाई में आती हैं।याद वो होती हैं जो भरी महफ़िल में तन्हा कर जाती हैं।

रास पंचाध्यायी, मूलत: भागवत पुराण के दशम स्कंध के उनतीसवें अध्याय से तैंतीसवें अध्याय तक के पाँच अध्यायों का नाम है। ये महारास  का प्रसंग 5 अध्याय में आया हैं। इसे कहते हैं रास पंचाध्यायी। ये पांच अध्याय भगवान श्री कृष्ण के प्राण हैं।
भगवान आपके प्राणों में प्रवेश कर जाते हैं। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं ये रास की लीला काम लीला हैं। पर ध्यान रखना यदि ये काम लीला होती और इस लीला में संसार की वासना होती। तो इस प्रसंग को शुकदेव जी नही गाते। और राजा परीक्षित जो सुन रहे हैं। 

वो राजा परीक्षित जिसकी आयु में केवल एक दिन बचा हैं। वो क्या काम लीला सुनने के लिए बैठेगा। बंधुओं ये काम की नहीं स्याम की लीला हैं। ये काम प्राप्ति पर विजय की लीला हैं। कृष्ण प्रेम जगाने वाली लीला हैं। इस लीला का उपास्य काम विजयी माना जाता है अत: जो कोई भक्त इस लीलाप्रसंग को पढ़ता या दृश्य रूप में देखता है वह कामजय की सिद्धि प्राप्त करता है।

इस महारास के 3 सिद्धांत और 6 सीढ़ी हैं। गुरुदेव की कृपा से आप महारास में प्रवेश करने जा रहे। जो इन सिद्धांतों को जान लेगा वो ही रास लीला में प्रवेश कर पायेगा।

1 . इस लीला में गोपियों के शरीर से कुछ लेना-देना नहीं हैं।
2 . ये काम विजय प्राप्ति की लीला हैं। ये जीव और परमात्मा के मिलन की कथा हैं। आत्मा और परमात्मा के मिलन की कथा हैं।
3 . इसमें संसार के लौकिक काम की चर्चा नहीं हैं।

सीढ़ी इस प्रकार हैं!!!
प्रथमं सुने भागवत भक्त मुख भगवद्वानी
दूजे आराधे भक्ति व्यास नव भांतिबखानी
तृतीय करे गुरु समझ दक्ष सर्वज्ञ रसीलो
चौथे होहिं विरक्त बसैंवनराज जसिलो
पंचम भूले देह सुध ,छठे भावना रास की
सातें पावें रीतिरस श्री स्वामी हरिदास की

रास में प्रवेश करने के लिए आपको कुछ सीढियाँ बताई गई है।
1. सबसे पहले आपको भागवत कथा सुननी है जिससे आपका प्रेम भगवान के चरणो में हो।
2. दूसरा श्री वेदव्यास जी द्वारा बताई नवधा भक्ति का आश्रय लेना पड़ेगा।
3. तीसरा आपको एक गुरु की भी आवश्यक्ता होगी जो आपको रास में प्रवेश करवाये। कि गुरु ही हमें भगवान से मिलन का मार्ग दिखातें है।
4. चौथा आपके मन में विरक्ति की भावना जागेगी। इस संसार के मोह बंधन त्याग मन से करना पड़ेगा। हमारा किसी के प्रति राग और द्धेष मिटना ही वैराग्य है। फिर साधना का शुभारम्भ है।
5. पांचवा है देह का अनुसंधान। ये देह से ऊपर की लीला है। इस लीला में शरीर का कोई काम नहीं है।
6. जब ये पांचो काम पूर्ण हो जायेंगे तो छठी सीढ़ी आपके मन में रास की भावना जाग जाएगी। आपका मन स्वतः ही श्रीकृष्ण से मिलने को करेगा।
7. और सांतवी बार में आप हरिदास जी की तरह प्रभु को प्राप्त कर लोगे।

भगवान् अपि ता रात्रीः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः । वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायाम् उपाश्रितः।

शुकदेवजी महाराज ने कहा-परीक्षित! भगवान ने अपनी योगमाया का आश्रय लेकर उस सुन्दर शरद पूर्णिमा की रात्रि का निर्माण किया है। इस इसमे भगवान की उम्र आठ वर्ष पूर्ण हो चुकी है और नौवें वर्ष में प्रवेश किया है। जब पूर्व दिशा की खिड़की को भगवान ने खोला तो भगवान को वो रात्रि याद आई जिसमे भगवान ने गोपियों से कहा था की तुम मेरे रसमय स्वरुप का दर्शन करोगे और तुम्हारे साथ रासक क्रीड़ा करूँगा।

आज तक तो माँ भगवान का श्रृंगार करती थी लेकिन आज स्याम सुंदर खुद अपना श्रृंगार कर रहे है। माथे पर मोर मुकुट, कानों में कुण्डल गले में हार, बाहों में बाजूबंद, कमर में कोंधनी, पैरो में नुपुर और सुन्दर पीताम्बर। और अपनी बंसी को लेकर श्री कृष्ण अपने शयन कक्ष की खिड़की से कूद पड़े। केशर की क्यारियों में, गुलाबों की बागियों में और लता पता के नीचे झुक झुक कर कृष्ण चल रहे थे। 

वो नागर नट वंशीवट पर पहुंचे। सारा जंगल सुगन्धित पुष्पों से लदा हुआ है। वातावरण शांतिप्रिय और आनन्दायक है। शरद ऋतु का यह चिर-प्रतीक्षित चंद्रोदय पूर्वी आकाश को रंजीत कर रहा है। भगवान ने वंशीवट की छइयां में अपनी कमर से पीताम्बर खोल कर बिछाया। और अपनी वंशी को विराजमान कर वंसी की स्तुति करने लगे।

अरी वंशी! मैंने तेरी बहुत स्तुति की पर आज तक तू मेरे कोई काम आई।
वंशी ने कहा प्यारे! आपने मेरी सेवा की। कब की थोड़ा बताइये?

भगवान बोले देख वंशी मैंने तुझे अपने हाथ पर सुलाता हूँ। अपने होंठो का तकिया लगता हूँ। और अधरामृत का भोग भी तुझे लगता हूँ। और जब तू थक जाती है ना  तो तेरे छिद्रों पर मेरी उँगलियाँ चलती है तो मानो तेरी चरण सेवा कर रहा हूँ। हवा के झोंको से जब मेरे घुँघरारे बाल हिलते है तो मानो तुझे पंखा कर रहा हूँ। वंशी मैंने तेरी किनती सेवा की पर तू मेरे आज तक तक कोई काम आई?

वंशी बोली की प्यारे ! मैं जानती हूँ आपको दुसरो की प्रशंसा करना बहुत आता है। अगर कोई प्रशंसा करना सीखे तो आपसे सीखे। अच्छा आप ये बताइये आपका काम क्या है?
भगवान कहते है अरी वंशी! आज तू ब्रज में जा और जो गोपियाँ है उनके ह्रदय में चित रूपी माणिक्य रखा है उसे चुरा कर लिया।

वंशी बोली प्यारे आपके पास बस एक चोरी की ही बात है। और कोई बात नहीं है। अरे पहले माखन चुराया। फिर वस्त्र चुराए  और आज चित भी चुराना चाहते हो।

भगवान बोले वंशी आज तुझे मेरा बस यही काम करना है। भगवान ने वंशी उठाई और वंशीवट की छइयां के नीचे खड़े हो गए। और मंद-मंद स्वर से श्री कृष्ण अपनी वंशी बजाने लगे हैं। भगवान ने वंशी में सबसे पहले अपनी अल्लाहदनी शक्ति श्री राधा रानी का नाम लिया है। और क्लिं शब्द फूँका है। यह क्लिं शब्द हमारी श्री राधा रानी की नुपुर से आया है। जैसे ही भगवान कृष्ण ने वंशी बजाई है तो सारे वृन्दावन की गोपियाँ मोहित हो गई है। भगवान वंशी में एक-एक गोपी का नाम ले रहे है। 

ललिता, विशाखा,चित्रा, तुंगभद्रा, रंगभेदी इन सब गोपियों का भगवान ने नाम लिया। शुकदेव जी कहते हैं – जब इन गोपियों ने अपना नाम सुना तो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पदार्थों का त्याग कर दिया। सभी गोपियों ने अपने काम-काज बंद कर दिए और वंशीवाट की ओर दौड़ी जहाँ कृष्ण खड़े हैं।

उनमे से एक गोपी दूध दुह रह थी लेकिन आधे में ही उस दूध को छोड़कर कृष्ण की और दौड़ी। कोई गोपी अपने परिवार को खाना परोस रही थी लेकिन बंसी की धुन सुनकर वह भी वंशीवट की और दौड़ी। एक गोपी सुन्दर श्रृंगार कर रही थी ज्यो ही वंशी को सुना तो उल्टे सीधे जैसे तैसे वस्त्र पहनकर वंशीवट की और दौड़ी। 

इस प्रकार सभी गोपियों ने अपने सगे-सम्बन्धियों, पिता-पुत्र, भाई-बहन सबका त्याग कर दिए केवल उस परमात्मा श्री कृष्ण के लिए। गोपियों को आज किसी की परवाह नही हैं। ऐसा लग रहा हैं मानो गोपियाँ पागल हो गई हैं। दीवानी गोपियाँ भगवान के पास आई हैं।
भगवान ने गोपियों का स्वागत किया हैं।

स्वागतं वो महाभागाः प्रियं किं करवाणि वः।
व्रजस्यानामयं कच्चिद् ब्रूतागमनकारणम् ।

अरी गोपियों तुम्हारा स्वागत हैं। तुम महा भाग्यशालिनी हो की तुम यहाँ आ गई। तुमको जो प्रिय लगे ऐसा मैं कोनसा काम करूँ। तुम सभी यहाँ आज कैसे आई हो? अपने आने का कारण बताओ? क्या कंस ने किसी असुर को भेजा हैं की तुम डर के मरे यहाँ चली आई हो। क्या तुम शरद की रात्रि की शोभा तो देखने नहीं आई? तुमने शरद की रात्रि को देखा अब तुम अपने अपने घर लोट जाओ। क्योंकि रात्रि में तुम्हारा यहाँ रहना ठीक नहीं हैं।

क्या तुम अपने बच्चो के रोने का क्रंदन सुन रही हो? क्या तुमने अपनी गउओ के रम्भाने का शब्द सुना। पति चाहे दुश्शील हो, कामी हो, क्रोधी हो, दुर्भागी हो, रोगी हो, जड़ हो या जटिल कैसा भी क्यों न हो। स्त्री का धर्म हैं अपने पति की सेवा करना।

ये सब सुनकर एक गोपी आगे आई और बोली की प्रभु! आप बहुत सुन्दर पति धर्म की शिक्षा दे रहे है। लेकिन एक छोटी सी हम आपको कहानी सुनती है। उसका उत्तर हम आपसे चाहते है। गोपी कहती है- एक स्त्री है। उसका अपने पति से प्रेम है। पति को एक बार 2 वर्ष के लिए बाहर जाना पड़ा। पत्नी बोली की अब मैं आपकी सेवा से वंचित हो जांउगी।

पति बोला की तू मेरी सेवा से वंचित नही होगी मैं तुझे अपना एक चित्र(फोटो) देके जा रहा हूँ। तू उसकी पूजा करना। इस तरह से पति चला गया।

अब वो स्त्री उस चित्र की सेवा- पूजा करती है। 2 वर्ष के बाद पति लोटा तो सुबह का समय था । प्रातः काल का समय था। वो अपने पति के चित्र की आरती उतारने वाले थी की उसका पति दरवाजा खटखटाने लगा। उस गोपी ने भगवान से पूछा अब ये बताइये की उस स्त्री को पूजा छोड़कर द्वार खोलने जाना चाहिए या नहीं? क्योंकि अगर पूजा छोड़कर जाये तो पूजा का अपमान और दरवाजा न खोले तो पति का अपमान।

➖भगवान बोले की गोपियों ये भी कोई पूछने की बात है। जब साक्षात पति आ गया तो चित्र की पूजा कैसी?

➖गोपी ने भगवान को कहाँ प्यारे बस यही हम आपको बताना चाहती जब साक्षात पति सामने है तो ओर किसी की पूजा क्यों करें?

➖हे गोविन्द संसार का जितना भी संबंध है केवल देह तक सिमित है। चाहे वो पति का हो पुत्र का हो, भाई का हो। सभी आप ही तो है किसी न किसी रूप में। गोपियों ने भगवान को कहा की हम सारे सम्बन्ध आपमें ही देख रही है। 

➖क्योंकि आप प्रत्येक जीव की आत्मा है। लेकिन आपके चरणों तक पहुंचने से पहले व्यक्ति को सब विषयों का त्याग करना पड़ता है। जब तक जीव विषयों का त्याग नही करता तब तक आपके चरणों तक पहुंच ही नही सकता। और हमने आपके लिए उन विषयों का त्याग किया है। और आप हमें यहाँ से जाने के लिए कह रहे है।

मैवं विभोऽर्हति भवान् गदितं नृशंसम् सन्त्यज्य सर्वविषयांस् तव पादमूलम्।
भक्ता भजस्व दुरवग्रह मा त्यजास्मान् देवो यथादिपुरुषो भजते मुमुक्षून्।

➖गोपियाँ कहती हैं आपने ठीक नही किया जो आप हमें जाने के लिए कह रहे हो। पहले तो बुलाते हो फिर जाने के लिए कहते हो। आप जाने की बात मत करो। हम आपको नही छोड़ रहे हैं तो आप क्यू छोड़ रहे हो।गोपियाँ कहती हैं हे नाथ हम संसार के सारे विषयों को छोड़ कर आपके दिव्य प्रेम को पाने के लिए आई हैं।

➖इस प्रकार भगवान ने पहले रास किया हैं। उस रास में गोपियों को थोड़ा मद हो गया। की आज भगवान श्री कृष्ण हमारे साथ रास रचा रहे हैं। हम कितनी सौभाग्यशाली हैं। गोपियों को लगा की हमने सारा संसार छोड़ दिया। हमारे जैसा कृष्ण को प्रेम करने वाला और कोई नही। बस इतना ही मद आया था की भगवान अपनी राधा रानी को लेकर वहां से अंतर्ध्यान को गए।

अन्तर्हिते भगवति सहसैव व्रजाङ्गनाः।
अतप्यंस् तम् अचक्षाणाः करिण्य इव यूथपम्।

➖भगवान चले गए। गोपियों को दर्शन नही हुआ। गोपियाँ तड़पने लगी रोने लगी। भगवान को खूब खोज रही हैं पर भगवान मिल नहीं रहे हैं। जो भगवान के चरणों में खुद खो जायेगा, पूर्ण समर्पित  हो जायेगा वहां भगवान मिल जायेंगे।

➖गोपियाँ ने भगवान को बहुत खोज है। लेकिन भगवान सामने नहीं आ रहे है। राधा रानी को प्रणय कोप के दौरान मान हो गया । जब बहुत देर हो गई राधा रानी बोली की प्यारे! आप प्रकट हो जाएं। देखिये ये गोपियाँ आपके वियोग में कितना झुलस रही है। 

➖भगवान बोले की राधे आप थोड़ा आगे चलो फिर में प्रकट होऊंगा। राधा रानी बोली की मैं थक गई हूँ। भगवान ने एक मिट्टी का चबूतरा श्री राधा रानी को दिखाया है और कहा की आप इस चबूतरे पर खड़ी हो जाओ। श्री राधा रानी  मान करके उस चबूतरे पर खड़ी हुई। भगवान नीचे की और झुके मानो भगवान राधा रानी को अपने कंधों की और झुकाएँगे। तत क्षण भगवान वहां से अंतर्ध्यान हो गए। जब श्री राधा रानी ने भगवान का दर्शन नही किया तो पछाड़ खा कर भूमि में गिर पड़ी। 

हा नाथ रमण प्रेष्ठ क्वासि क्वासि महाभुज । 
दास्यास् ते कृपणाया मे सखे दर्शय सन्निधिम्।

भगवान कहते हैं राम अवतार के समय में भी सीता जी की खोज में वन-वन भटका था। थोड़ा सा राधा जी को भी तो उस चीज के एहसास हो।

हे नाथ! हे स्याम सुन्दर! पीछे से गोपियाँ अन्वेषण करते हुए आ रही थी। जब गोपियों ने राधा रानी को गिरे हुए देखा तो अपने हाथ का सहारा दिया है। और लेकर राधा रानी को यमुना तट पर आई और गोपी गीत का पाठ किया है। जिसमे 19 श्लोक हैं। चैतन्य महाप्रभु जी कहते थे की जो गोपी गीत का प्रतिदिन पाठ करते हैं उन्हें साक्षात भगवान श्री कृष्ण की प्राप्ति होगी।

गोपियों ने इस गोपी गीत को गाकर भगवान स्यामसुंदर का आह्वान किया। जब भगवान ने गोपियों के गोपी गीत को सुना तो साक्षात प्रकट हो गए। 

जब भगवान प्रकट हुए तो गोपियों ने भगवान से तीन प्रकार के प्राणियों के विषय में पूछा।
एक व्यक्ति वो हैं जो प्रेम करने वाले से प्रेम करता हैं।
दूसरा व्यक्ति वो हैं जो सबसे प्रेम करता हैं चाहे उससे कोई करे या न करे।
तीसरे प्रकार का प्राणी प्रेम करने वाले से कोई सम्बन्ध नही रखता और न करने वाले से तो कोई संबंध हैं ही नही।

आप इन तीनो में कोनसे व्यक्ति की श्रेणियों में आते हो?

भगवान ने कहा की गोपियों!

मिथो भजन्ति ये सख्यः स्वार्थैकान्तोद्यमा हि ते । 
न तत्र सौहृदं धर्मः स्वार्थार्थं तद्द् हि नान्यथा ।

जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। बस ये स्वार्थ हैं।

दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के , गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं।

लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं-
आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता हैं। पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं।

कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं। गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं।

गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाइ जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।

मैं देवताओं की आयु प्राप्त करने के बाद भी तुम्हारे कर्ज से मुक्त नही हो सकता।

पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महाराज में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवन ने रास किया है।

एक गोपी और एक कृष्ण , दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण

इस महारास में कामदेव ने गोपियों को माध्यम बनाकर 5 तीर छोड़े थे। इसकी एक सुंदर कथा हैं- एक बार कामदेव भगवान के पास पहुंचे थे। और कहते हैं की भगवान आपसे युद्ध करने की इच्छा हैं।

बाप के सामने जब बेटा ताल ठोके तो बाप को बर्दाश्त नही होगा। भगवान बोले ठीक हैं आ जाओ मैदान में युद्ध करते हैं। कामदेव बोले नही भगवान मैदानी लड़ाई नही करनी हैं।

भगवान बोले की ठीक हैं- शरद रात्रि की सुन्दर पूर्णिमा होगी। गोपियों का साथ होगा। सुन्दर वंशीवट और यमुना तट होगा। तुम आ जाना वहां पर। अब महारास के समय कामदेव ने 5 तीर छोड़े-

1. आलिंगन 2. नर्महास 3. करळकावलिस्पर्श ४. नखाग्रपात 5 . षस्मित्कटाक्षपात

➖ये पांच तीर कामदेव ने गोपियों के माध्यम से छोड़े थे लेकिन भगवान ने हर तीर को परास्त किया।

 भगवान शिव का महा रास में प्रवेश!!!!!

जब महारास की गूंज सारी त्रिलोकी में गई तो हमारे भोले बाबा के कानों में भी महारास की गूंज गई। भगवान शिव की भी इच्छा हुई के मैं महारास में प्रवेश करूँ। भगवान शिव बावरे होकर अपने कैलाश को छोड़कर ब्रज में आये । पार्वती जी ने मनाया भी लेकिन त्रिपुरारि माने नहीं। भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त श्रीआसुरि मुनि, पार्वती जी, नन्दी, श्रीगणेश, श्रीकार्तिकेय के साथ भगवान शंकर वृंदावन के वंशीवट पर आ गये।

वंशीवट जहाँ महारास हो रहा था, वहाँ गोलोकवासिनी गोपियाँ द्वार पर खड़ी हुई थीं। पार्वती जी तो महारास में अंदर प्रवेश कर गयीं, किंतु द्वारपालिकाओं श्री ललिता जी ने ने श्रीमहादेवजी और श्रीआसुरि मुनि को अंदर जाने से रोक दिया, बोलीं, “श्रेष्ठ जनों” श्रीकृष्ण के अतिरिक्त अन्य कोई पुरुष इस एकांत महारास में प्रवेश नहीं कर सकता।

भगवान शिव बोले की तो क्या करना पड़ेगा?
ललिता सखी बोली की आप भी गोपी बन जाओ। भगवान शिव बोले की जो बनाना हैं जल्दी बनाओ लेकिन मुझे महारास में प्रवेश जरूर दिलाओ।

भगवान शिव को गोपी बनाया जा रहा हैं। मानसरोवर में स्नान कर गोपी का रूप धारण किया हैं। 

श्रीयमुना जी ने षोडश श्रृंगार कर दिया, तो सुन्दर बिंदी, चूड़ी, नुपुर, ओढ़नी और ऊपर से एक हाथ का घूँघट भी भगवान शिव का कर दिया। साथ में युगल मन्त्र का उपदेश भगवान शिव के कान में किया हैं। भगवान शिव अर्धनारीश्वर से पूरे नारी-रूप बन गये। बाबा भोलेनाथ गोपी रूप हो गये।फिर क्या था, प्रसन्न मन से वे गोपी-वेष में महारास में प्रवेश कर गये।

भगवान ने जब भगवान शिव को देखा तो समझ गए। भगवान ने सोचा की चलो भगवान शिव का परिचय सबसे करवा देते हैं जो गोपी बनकर मेरे महारास का दर्शन करने आये हैं। सभी गोपियाँ भगवान शिव के बारे में सोच के कह रही हैं ये कौन सी गोपी हैं। हैं तो लम्बी तगड़ी और सुन्दर। 

कैसे छम-छम चली जा रही हैं। भगवान कृष्ण शिव के साथ थोड़ी देर तो नाचते रहे लेकिन जब पास पहुंचे तो भगवान बोले की रास के बीच थोड़ा हास-परिहास हो जाएं तो रास का आनंद दोगुना हो जायेगा। भगवान बोले की अरी गोपियों तुम मेरे साथ कितनी देर से नृत्य कर रही हो लेकिन मैंने तुम्हारा चेहरा देखा ही नहीं हैं। क्योंकि कुछ गोपियाँ घूंघट में भी हैं।

गोपियाँ बोली की प्यारे आपसे क्या छुपा हैं?

लेकिन जब भगवान शंकर ने सुना तो भगवान शंकर बोले की ये कन्हैया को रास के बीच क्या सुझा, अच्छा भला रास चल रहा था मुख देखने की क्या जरुरत थी। ऐसा मन में सोच रहे थे की आज कन्हैया फजीहत कराने पर  ही तुला हैं।

भगवान कृष्ण बोले की गोपियों तुम सब लाइन लगा कर खड़ी हो जाओ। और मैं सबका नंबर से दर्शन करूँगा।

भगवान शिव बोले अब तो काम बन गया। लाखों करोड़ों गोपियाँ हैं। मैं सबसे अंत में जाकर खड़ा हो जाऊंगा। कन्हैयाँ मुख देखते देखते थक जायेगा। और मेरा नंबर भी नही आएगा।

सभी गोपियाँ एक लाइन में खड़ी हो गई। और अंत में भगवान शिव खड़े हो गए। जो कन्हैया की दृष्टि अंत में पड़ी तो कन्हैया बोले नंबर इधर से शुरू नही होगा नंबर उधर से शुरू होगा।

➖भगवान शिव बोले की ये तो मेरा ही नंबर आया। भगवान शिव दौड़कर दूसरी और जाने लगे तो भगवान कृष्ण गोपियों से बोले गोपियों पीछे किसी गोपी का मैं मुख दर्शन करूँगा पहले इस गोपी का मुख दर्शन करूँगा जो मुख दिखने में इतनी लाज शर्म कर रही हैं। इतना कहकर भगवान शिव दौड़े और दौड़कर भगवान शिव को पकड़ लिया। और घूँघट ऊपर किया और कहा आओ गोपीश्वर आओ। आपकी जय हो। बोलिए गोपेश्वर महादेव की जय। शंकर भगवान की जय।।

श्रीराधा आदि श्रीगोपीश्वर महादेव के मोहिनी गोपी के रूप को देखकर आश्चर्य में पड़ गयीं। तब श्रीकृष्ण ने कहा, “राधे, यह कोई गोपी नहीं है, ये तो साक्षात् भगवान शंकर हैं। हमारे महारास के दर्शन के लिए इन्होंने गोपी का रूप धारण किया है। तब श्रीराधा-कृष्ण ने हँसते हुए शिव जी से पूछा, “भगवन! आपने यह गोपी वेष क्यों बनाया?

 भगवान शंकर बोले, “प्रभो! आपकी यह दिव्य रसमयी प्रेमलीला-महारास देखने के लिए गोपी-रूप धारण किया है। इस पर प्रसन्न होकर श्रीराधाजी ने श्रीमहादेव जी से वर माँगने को कहा तो श्रीशिव जी ने यह वर माँगा “हम चाहते हैं कि यहाँ आप दोनों के चरण-कमलों में सदा ही हमारा वास हो। आप दोनों के चरण-कमलों के बिना हम कहीं अन्यत्र वास करना नहीं चाहते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण ने `तथास्तु’ कहकर कालिन्दी के निकट निकुंज के पास, वंशीवट के सम्मुख भगवान महादेवजी को `श्रीगोपेश्वर महादेव’ के नाम से स्थापित कर विराजमान कर दिया।

श्रीराधा-कृष्ण और गोपी-गोपियों ने उनकी पूजा की और कहा कि व्रज-वृंदावन की यात्रा तभी पूर्ण होगी, जब व्यक्ति आपके दर्शन कर लेगा। आपके दर्शन किये बिना यात्रा अधूरी रहेगी। भगवान शंकर वृंदावन में आज भी `गोपेश्वर महादेव' के रूप में विराजमान हैं और भक्तों को अपने दिव्य गोपी-वेष में दर्शन दे रहे हैं। गर्भगृह के बाहर पार्वतीजी, श्रीगणेश, श्रीनन्दी विराजमान हैं। आज भी संध्या के समय भगवान का गोपीवेश में दिव्य श्रृंगार होता है।

इसके बाद सुन्दर महारास हुआ हैं। भगवान कृष्ण ने कत्थक नृत्य किया हैं और भगवान शिव ने तांडव। जिसका वर्णन अगर माँ सरस्वती भी करना चाहे तो नहीं कर सकती हैं। खूब आनंद आया हैं। भगवान कृष्ण ने ब्रह्मा की एक रात्रि ले ली हैं। 

लेकिन गोपियाँ इसे समझ नही पाई। केवल अपनी गोपियों के प्रेम के कारण कृष्ण ने रात्रि को बढाकर इतना दीर्घ कर दिया। भगवान ने गोपियों को चीर घाट लीला के समय दिए वचन को पूरा कर हैं। गोपियों ने एक रात कृष्ण के साथ अपने प्राणप्रिय पति के रूप में बिताई हैं लेकिन यह कोई साधारण रात नही थी। ब्रह्मा की रात्रि थी और लाखों वर्ष तक चलती रही। 

आज भी वृन्दावन में निधिवन में प्रतिदिन भगवान कृष्ण रास करते हैं। कृष्ण के लिए सब कुछ करना संभव हैं। क्योंकि वो भगवान हैं। इस प्रकार भगवान ने महारास लीला को किया हैं। शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। और उसका ह्रदय रोग भी ठीक होता हैं।

रास पंचाध्यायी का आखिरी श्लोक इस बात की पुष्टि भी करता है।

विक्रीडितं व्रतवधुशिरिदं च विष्णों: श्रद्धान्वितोऽनुुणुयादथवर्णयेघः भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य कामंहृद्रोगमाश्वहिनोत्यचिरेण धीरः

वस्तुतः समस्त रोग कामनाओं से उत्पन्न होते हैं जिनका मुख्य स्थान हृदय होता है। मानव अच्छी-बुरी अनेक कामनाएं करता है। उनको प्राप्त करने की उत्कृष्ट इच्छा प्रकट होती है। इच्छा पूर्ति न होने पर क्रोध-क्षोभ आदि प्रकट होने लगता है। वह सीधे हृदय पर ही आघात करता है।

जय श्री राधेकृष्ण 🙏

ब्रज चौरासी कोस यात्रा

.                    "ब्रज चौरासी कोस यात्रा"           ब्रज  चौरासी कोस की परिकम्मा एक  देत।           लख  चौरासी योनि  के  संकट ...