Tuesday, February 1, 2022

पृथ्वी का मान भंग करना

सनन्द जी कहते हैं कि पृथ्वी का मान भंग करने के लिए श्री भगवान ने ब्रज मंडल ही उन्हे सबसे पहले दर्शाया था। बात उस वक्त की है जब वाराह कल्प में जब श्री हरि वराह रूप में पृथ्वी का उद्धार करने के लिए हिरण्याक्ष का वध करके पृथ्वी को रसातल से उठाकर ला रहे थे। इस समय उनकी दृष्टा के अग्र भाग पर सुशोभित पृथ्वी को सर्वश्रेष्ठ स्थान पर स्थापित होने का मान हो गया। 

उस समय पृथ्वी ने श्री भगवान से पूछा, ‘‘ हे प्रभो ! इस समय सारा विश्व जलमग्न दिखाई दे रहा है। आप किस स्थल पर मेरी स्थापना करेंगें। ’’ 

इस पर वराह भगवान बोले, ‘‘हे नितम्बिने ! जब जल में उद्वेग भाव प्रकट हो तथा वृक्ष दिखाई देने लगें। तब उसी स्थान पर तुम्हारी स्थापना होगी। तुम वृक्षों को देखती चलो।’’ 

 इस बात को सुनकर पृथ्वी को बहुत आश्चर्य हुआ। वे श्री भगवान से बोलींं, ‘‘ भगवन ! स्थावर वस्तुओं की रचना तो मेरे ऊपर हुई है। फिर दूसरी धरणी कैसे हो सकती है ? क्योंकि धरणामयी धरणी तो केवल मैं ही हूँ।" 

पृथ्वी इतना कह ही पाई थी कि उन्हे सामने जल में मनोहारी वृक्ष दिखाई देने लगे। इस पर पृथ्वी को पुनः आश्चर्य हुआ। वे पुनः बोलीं, ‘‘ हे देव ! किस स्थल पर ये पल्लव सहित वृक्ष विद्यमान हैं? यह दृश्य मेरे मन में बडा आश्चर्य पैदा कर रहा है। 
कृपया इसका रहस्य बताइये। ’’ 

 इस पर वराह श्रीभगवान बोले, ‘‘हे नितम्बिने ! यह सामने दिव्य भूमि दिखाई दे रही है; वह दिव्य माथुर मंडल है। जो गोलोक की धरती से जुडा है। प्रलयकाल में भी इसका संहार नहीं होता। ’’ 

सनन्द बोले, इस प्रकार पृथ्वी को बडा आश्चर्य हुआ। वह अभिमान शून्य हो गई। इस प्रकार यह व्रजमंडल समस्त लाकों में महाशक्तिशाली है। अतः माथुर मंडल के ब्रजमंडल तीर्थ को तीर्थराज से भी उत्क्रष्ट समझना चाहिए। इस प्रकार कहते हुए भगवान विष्णु ने पृथ्वी को ले जाकर व्यवहार योग्य स्थान पर स्थिर कर अपनी आधार शक्ति का संचार कर दिया। ऐसा ही वर्णन भगवान शिव की नगरी काशी का आता है। वह भी ब्रजमंडल के समान नित्य नगरी है। इस जानकारी से हमें पता चलता है कि ब्रजमंडल अनादि है। इसका कभी संहार नहीं होता। अतः हमें ऐसा मानना चाहिए कि ब्रजमंडल पृथ्वी पर स्थित नहीं बल्कि पृथ्वी इस पर स्थित है। 

मथुरा मंडल धरा पर कब आया

माथुर मंडल अर्थात मथुरा मंडल हमेशा हमेशा के लिए गोलोक से जुडा हुआ है। इसी कारण प्रलयकाल में भी इसका संहार नहीं होता। ऐसा पुराग्रंथों में वर्णन आता है। अतः वृंदावन अनादि काल से धरा को आभूषित कर रहा है। 

जैसा कि हमने आपको बताया था कि नारद जी बताते है कि एक बार वाराह कल्प में श्री हरि वाराह रूप धारण करके अपनी दाढ़ पर पृथ्वी को रसातल से उठा कर ला रहे थे। इस पर पृथ्वी को अभिमान हो गया। उसने देखा कि मैं तो स्वयं भगवान के सबसे ऊपरि भाग पर विराज मान हूँ इसलिए मुझसे बडा भला कौन हो सकता है। इस पर श्री भगवान ने पृथ्वी को माथुर मंडल के दर्शन कराए तथा उसके बारे में बताया। 

यह ब्रज मंडल समस्त लोकों से अधिक महत्वशाली है। ब्रज मंडल का निमार्ण मैंने स्वयं अपने गोलोक से दी गई 84 कोस भूमि से किया है। इस प्रकार हम पाते हैं कि ब्रज 84 कोस का क्षेत्र गोलोक से पृथ्वी पर सनातन रूप में स्थापित है। इसका जन्म व संहार नहीं होता। अतः यह लोक नित्य है।

 मथुरा म ंडल मे ं वृंदावन की स्थिति :- एक बार नन्द के वयोवृद्ध मंत्री 
सनन्द स े नन्द बाबा ने वृंदावन के बार े में पूछा तो उन्होन े बताया कि 
बह्शित से इ र्षान कोण, यदुपुर के दक्षिण तथा षोणपुर के पष्चिमी भाग 
को माथुर मंडल या मथुरा मंडल कहा जाता है। इसके भीतर 20
योजन परिमाण में फैले विस्तृत भूभाग को मनीशियों ने दिव्य माथुर 
मंडल या ब्रज मंडल बताया है। 
 एक बार सनन्द जी वसुद ेव जी घर गए हुए थे। उसी समय 
वार्तालाप में वसुदेव जी के कुलग ुरू महर्शि गर्ग जी ने बताया था कि एक 
बार तीर्थराज प्रयाग ने भी इस माथुर मंडल की पजू ा की थी। इसके
वनों में मनोहारी वृंदावन स्थित है। कहा जाता है कि बैकुण्ठ से बढ़कर 
कोई लोक नहीं है परंतु धरा पर स्थित वृंदावन बैकुण्ठ से कम नहींं ह।ै
यहाँ गोवर्धन पर्वत ह।ै कालिन्दी के मंगल पुलिन हैं। वृहत्सानु
(बरसाना) पर्वत तथा नन्दीष्वर गिरि षोभायमान हैं। जो 24 कोस 
विस्तार में विषाल काननों, वनों तथा लता कुंजों से आवृत वन ही 
वृंदावन है।
श्री वल्लभाचार्य जी और कृश्ण भक्ति : - श्री वल्लभाचार्य जी का स्थल 
गोवर्धन परिक्रमा में ही पडता है। कहते हैं कि यहाँ पर श्रीनाथ जी 
प्रकट हुए थे। ऐसा भी कहा जाता है कि एक बार श्री वल्लभाचार्य जी 
को भगवान श्रीनाथ जी ने स्वप्न में दर्षन दिए। सपने में दर्षनों के बाद 
वल्लभाचार्य जी न े कृश्ण जी भक्ति और प्रचार-प्रसार का कार्य षुरू कर 
दिया। श्री वल्लभाचार्य जी से जुडे होने के कारण वल्लभ स ंप्रदाय के 
लोग आज भी गोवर्धन पर्वत परिक्रमा के लिए आते रहते हैं। यद्धपि 
यहाँ पर भक्तों को आना जाना पूर े वर्श लगा रहता है। परंतु पूर्णिमा के 
समय यहाँ पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है। 
उपासना म ें 11 अपराध : - परिक्रमा भी उपासना का एक रूप है। 
उपासना में किए गए कुकार्य, अपराध आदि पापों को जन्म देते हैं। 
अतः परिक्रमा में कुकार्यो से बचना चाहिए। पाप को जन्म देन े वाले 
अपराध निम्न लिखित हैं : - 01ण् भगवान के मन्दिर म ें या भगवान के 
सामने सवारी या वाहन सहित प्रवेष करना। 02ण् भगवान के मन्दिर में 
भगवान के सामने खड़ाऊँ, जूते, चप्पल आदि पहनकर प्रवेष करना। 
03ण् भगवान के मन्दिर में या भगवान के सामने माँस, मछली, मदिरा आदि तामसिक भोजन व षयन करना। 04ण् भगवान के मन्दिर में 
भगवान के सामने जोर से वार्तालाप, कटुवचन, बोलना, अषलील भाशण 
करना, किसी की निन्दा करना, लड़ना-झगड़ना व घर-बार व कारोबार 
की बाते करना आदि। 05ण् भगवान के मन्दिर में या भगवान के सामने 
झूठ बोलना, अपनी प्रषंसा करना। 06ण् भगवान के मन्दिर में या 
भगवान के सामने भगवान को छोड़कर दूसरों को प्रणाम करना, उनकी 
ओर पैर करके या पैर फैलाकर बैठना। 07ण् भगवान के मन्दिर में या 
भगवान के सामने या भगवान के श्री विग ्रह के पास कोई कुकर्म करना, 
षौंच आदि जाना व अपान वायु (पाद) छोड़ना। 08ण् भगवान के मन्दिर
में या भगवान के सामने कुर्सी, तख्त या चारपाई पर बैठना। 09ण्
भगवान के मन्दिर में या भगवान के सामने पूजा पाठ न करना। 10ण्
भोजन से पूर्व भगवान को भोग न लगाना व भोग लगाकर स्वयं प्रसाद 
ग्रहण न करना। 11ण् अपने ईश्ट देव या भगवान या धर्म ग ्रंथों की 
निन्दा स ुनना व निन्दा करना।


ब्रज चौरासी कोस यात्रा

.                    "ब्रज चौरासी कोस यात्रा"           ब्रज  चौरासी कोस की परिकम्मा एक  देत।           लख  चौरासी योनि  के  संकट ...