श्रासिद्धपीठ वंशीवट महारास स्थल अखिल ब्रम्हाण्डनायक श्री देवकी नन्दन योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण चन्द्र के प्रमुख लीला स्थल वंशीवट में आपका स्वागत है यह वही वंशीवटनामक अति प्राचीन वंशीवट वृक्ष है जिसकी छाँव में श्री यशोदा नन्दन के बाल्यकाल का सर्वाधिक समय व्यतीत हुआ श्रीकृष्ण अपने मुख से स्वयं इस बात को प्रमाणित करते हैं कि
चार पहरवंशीवट भटक्यो साँझ परे घर आयो।
यह वही वंशीवट है जिसकी महत्ता का उल्लेख श्री गोपाल सहस्त्रनाम में भी मिलता हैं कि जो वंशीवट के नीचे बैठकर गोपाल सहस्रनाम का पाठ करता है तो उसे इन्ही नेत्रों से श्री कृष्ण का दर्शन प्राप्त हो जाता है । इसलिए वंशीवट के नीचे बैठ कर श्री गोपाल सहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिये।
वैष्णवजन नित्यही प्रार्थना में गायन करते है कि
वंशीवट सोवट नहीं श्री कृष्ण नाम सौ नाम
इसी वैशीवट वृक्ष पर चढकर श्री कृष्ण वंशी बजाकर गोपियों को रिझाया व गौओं को बुलाया करते थे महारास भी यहीं सम्पन्न हुआ यही गौचारण लीला काल में ही प्रलम्बा सुर का वध आदि असंख्य लीलाएँ सम्पन्न हुई यह वंशीवट वृक्ष भगवान श्री कृष्ण का सखा एवं वृक्ष से मी अत्यन्त पवित्र है अतः इसकी पवित्र बनाये रखें आज भी लाखौ भावुक श्रद्धालु गण इसमें कान लगाकर मृदंग आदि महारास की ध्वनि, सुनते हुये देखे जाते हैं इसके नीचे बैठ कर एक माला जप करने से अन्नत फल की प्राप्ति होती है।
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वशावट सी वट नहीं श्री कृष्ण नाम सो नाम इसलिए इसके नीचे बैठ कर जातप पाठ आदि करें इसके पत्ते आदिम तोड़े यह व कल्प इस से भीगीत पनि सती
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