भूतेश्वर महादेव

भूतेश्वर मंदिर मथुरा के बारे में
मथुरा में श्री कृष्ण जन्मस्थान के पास स्थित है, भूतेश्वर महादेव मंदिर । यह मंदिर शहर के सबसे पुराने और भगवान शिव को समर्पित सबसे पूजनीय स्थलों में से एक है। यहाँ के मुख्य देवता भूतेश्वर महादेव के रूप में पूजे जाते हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग 2 पर स्थित इस मंदिर का गर्भगृह लगभग 100 वर्ग मीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है, जो यहां आने वाले भक्तों के लिए शांतिपूर्ण और आध्यात्मिक वातावरण प्रदान करता है।
भूतेश्वर महादेव की कहानी वाल्मीकि रामायण और मंदिर की मौखिक परंपराओं दोनों में देखने को मिलती है। किंवदंतियों के अनुसार, श्रावण के महीने में, भगवान शत्रुघ्न ने शक्तिशाली राक्षस लवणासुर नामक राक्षस का वध किया। राक्षस लवणासुर को हराने के बाद शत्रुघ्न ने मथुरापुरी नामक शहर की स्थापना की थी। अतः मथुरा में भूतेश्वर मंदिर उसी युग से स्थापित है। इस मंदिर का कथा की जड़ें त्रेता और द्वापर युग से जुड़ी हैं।
किंवदंतियों के अनुसार, त्रेता युग में मधु के बेटे लवणासुर ने अमर होने के लिए भगवान शिव की तपस्या की और भगवान शिव ने उसे एक त्रिशूल प्रदान किया, और कहा कि जब तक यह त्रिशूल उसके महल में रहेगा, तब तक उसे कोई भी नहीं मार सकेगा। लवणासुर ने वह त्रिशूल अपनी महल में स्थापित कर दिया।
इस वरदान से सशक्त होकर लवणासुर निडर हो गया और उसने मथुरा में आतंक मचाना शुरू कर दिया। वह ऋषियों के अनुष्ठानों में बाधा डालता और कभी कभी उन्हें मार भी डाला।
मदद की तलाश में, ऋषि अयोध्या गए, जहाँ भगवान राम शासन कर रहे थे। उन्होंने भगवान राम से सहायता मांगी। ऋषियों की सहायता के लिए भगवान राम ने शत्रुघ्न को भेजा। उन्होंने शत्रुघ्न से कहा कि जब मथुरा के राजा लवणासुर को हराकर वहां पर राज्य करो। लेकिन शत्रुघ्न ने लवणासुर को हराने का तीन बार प्रयास किया। युद्ध में लवणासुर को हराने के तीन असफल प्रयासों के बाद, शत्रुघ्न पराजित महसूस करते हुए अयोध्या लौट आए।
भगवान राम ने शत्रुघ्न को मथुरा वापस जाने और शक्ति के लिए मथुरा में स्थित भूतेश्वर महादेव की पूजा करने की सलाह दी। उन्होंने कहा शत्रुघ्न जैसे मैंने लंका में युद्ध करने से पहले रामेश्वर महादेव की पूजा की थी। उसी प्रकार युद्ध करने से पहले मथुरा में स्थित भूतेश्वर महादेव की पूजा कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करो।
शत्रुघ्न ने उनकी सलाह का पालन किया और भूतेश्वर महादेव की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भूतेश्वर महादेव ने वर मांगने के लिए कहा तो शत्रुघ्नन कहा बड़े भैया राम की आज्ञा है कि लवणासुर को मार कर मथुरा नगरी पर शासन करू। परंतु में हर बार असफल रहा हूं।
शत्रुघ्न तुम्हारे बड़े भाई राम की तरह लावना सुरभि मेरा अनन्य भक्त है उसने भी मेरी भक्ति करके मुझसे एक त्रिशूल प्राप्त किया है। जब तक वह त्रिशूल उसके महल में रहेगा उसे कोई नहीं मार सकता।
लवणासुर की कमजोरी को उजागर होने के उपरांत हनुमानजी की सहायता से वह त्रिशूल प्राप्त किया। इसके बाद शत्रुघ्न लवणासुर को मारने और मथुरा में अपना राज्य स्थापित करने में सफल हो सके।
द्वापर युग में भी भूतेश्वर महादेव के महत्व का वर्णन मिलता है।भगवान कृष्ण के समय में द्वापर युग था। गोकुल में पाँच वर्ष बिताने और सात वर्ष तक अपनी दिव्य लीलाएँ करने के बाद, कृष्ण ने 11 वर्ष और 28 दिन की आयु में अत्याचारी कंस का वध किया।
महाभारत के बाद, कृष्ण मथुरा लौट आए, जहाँ उनके माता-पिता ने उन्हें चार धाम की तीर्थ यात्रा करने के उनके वादे की याद दिलाई। फलस्वरूप, कृष्ण ने 33 करोड़ देवी-देवताओं, पवित्र तीर्थ, नदियों के साथ-साथ सभी चार धामों के देवताओं के पास जाने के बजाय उन्हें ब्रज में रहने के लिए आमंत्रित करने का फैसला किया। परिणामस्वरूप, बृज में सभी देवता निवास करने लगे, जिससे ब्रज को गोलोक भी कहा जाने लगा।
हालाँकि, इन देवों में देवी गंगा और भगवान काशी विश्वनाथ नहीं आए। गंगा ने संकोच किया कि बहन यमुना को पार करने से बहन के मान का मर्दन अर्थात का अपमान होगा, इसलिए भगवान कृष्ण ने मानसी गंगा के रूप में गंगा को प्रकट किया।
इसी तरह, भगवान काशी विश्वनाथ ने घोषणा कर कृष्ण को बताया कि वे पहले से ही मथुरा में भूतेश्वर महादेव के रूप में मौजूद हैं। श्रीकृष्ण ने इनको ब्रज चौरासी कोस का मालिक बना दिया, इसलिए भूतेश्वर महादेव को मथुरा का कोतवाल भी कहा जाता है। और भगवान भूतनाथ भूतेश्वर अपने चार रूपों में स्थित होकर मथुरा की चारों दिशाओं से रक्षा करने लगे । चारों दिशाओं में स्थित होने के कारण भगवान शिव को मथुरा का कोतवाल कहते हैं।
मथुरा के चारों ओर चार शिव मंदिर आज भी स्थापित हैं- पूर्व में पिपलेश्वर महादेव का, दक्षिण में रंगेश्वर महादेव का और उत्तर में गोकर्णेश्वर महादेव का और पश्चिम में भूतेश्वर महादेव का मन्दिर है। मथुरा को आदि वाराह भूतेश्वर क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है।
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