Saturday, April 26, 2025

कामवन

कामवन
जिला भरतपुर, राजस्थान का एक उपखंड और तहसील 

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कामां या कामवन राजस्थान के भरतपुर जिले का एक उपखंड और तहसील मुख्यालय है। इसका वर्तमान नाम 'कामां' है। लेकिन अब यह उपखंड क्षेत्र भरतपुर जिले से हटकर नए बनाए गए जिले डीग के अंतर्गत आता है लेकिन कामां एक बड़ा ही प्राचीन और ऐतिहासिक क़स्बा है। आसपास के क़स्बे/ शहर हैं : नगर, नंदगाँव, पुनहाना, पलवल और अलवर सत्यभामा धाम सतवास आदि।

कामां
कामवन, काम्यवन
— राजस्थान का एक नगर —
कामां स्थित श्री विमल बिहारी के मंदिर का विग्रह
समय मंडल: आईएसटी (यूटीसी+५:३०)
देश भारत
राज्य। राजस्थान
ज़िला भरतपुर
निर्देशांक: 27°39′13″N 77°16′11″E / 27.65361°N 77.26972°E

इसके ध्रुवीय निर्देशांक हैं : 27°39'13"N 77°16'11"E

पौराणिक महत्ता

कामवन ब्रज का प्रसिद्ध तीर्थ भी है। इसका पौराणिक नाम काम्यकवन, कामवन था। ब्रज की चौरासी कोस परिक्रमा मार्ग में इस स्थान का अपना महत्त्व है।

इंद्र स्तुति करते हैं कि 'हे श्रीकृष्ण! आपके ब्रज में अति रमणीक स्थान हैं। उन में हम सभी जाने की इच्छा करते हैं पर जा नहीं सकते। (कारण, 'अहो मधुपुरीधन्या वैकुण्ठाच्चगरीयसी। विनाकृष्णप्रसादेन क्षणमेकं न तिष्ठति॥' यानी यह मधुपुरी ब्रज धन्य और वैकुण्ठ से भी श्रेष्ठ है, क्योंकि वैकुण्ठ में तो मनुष्य अपने पुरुषार्थ से पहुँच सकता है पर यहाँ श्रीकृष्ण की आज्ञा के बिना कोई एक क्षण भी नहीं ठहर सकता)।

बृज के 12 प्राचीनतम वनों में कामवन पांचवा वन है। मथुरा से 65 किमी पश्चिम दिशा में गोवर्धन और डीग होते हुए सड़क मार्ग से कामवन (कामां) पंहुचा जा सकता है।

प्रमुख दर्शनीय स्थल

1. विमल कुण्ड : यहां सरोवर मात्र न होकर लोक-समाज के लिए आज भी तीर्थ स्थल की तरह है। आज भी यहां यह लोक मान्यता है कि आप चाहे चारों धाम की तीर्थ-यात्रा कर आएं, यदि आप विमल कुण्ड में नहीं नहाये तो आपकी तीर्थ-भावना अपूर्ण रहेगी।
2. विमल बिहारी मंदिर
3. कामेश्वर महादेव
4. चरण पहाडी
5. भोजन थाली
6. कदम्ब खंडी
7. प्राचीन महलों के भग्नावशेष
8. श्री सूर्यनारायण मन्दिर सतवास
9. कल्प वृक्ष दर्शन सतवास

कामां के अन्य मंदिर

कामां, जिसे पौराणिक नगरी होने का गौरव हासिल है, मध्यकाल से पूर्व की बहुत प्राचीन नगरी है। इसका ब्रज के वनों में केंद्रीय स्थान रहा है। कोकिलावन भी इसके बहुत नज़दीक है। वहाँ नंदगांव हो कर जाते हैं। नंदगांव, कामां के पास ही सीमावर्ती कस्बा है, यद्यपि वह उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद में आता है।

ब्रज-संस्कृति में प्रेम तत्त्व ही प्रधान रहा है, जिसके प्रति रसखान जैसा पठान कवि इतना सम्मोहित हो गया कि उसने जन्म जन्मान्तर तक हर रूप में यहीं का होकर रहने की कामना की।

शुद्धाद्वैत दर्शन के प्रणेता, पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक तथा सूर सरीखे महान कवि के प्रेरणा स्रोत वल्लभाचार्य के पुत्र गुसाईं जी विट्ठलनाथ ने जब अष्टछाप का गठन किया तो जिन वात्सल्य रूप कृष्ण अर्चना की नयी भक्ति-पद्धति विकसित की उसमें सवर्णों के साथ दलितों और स्त्रियों तक को जगह दी गयी, यद्यपि मीरा जैसी स्वाधीनचेता कवि आग्रह के बावजूद इसमें शामिल नहीं हुई, इस नगर कामवन में शुद्धाद्वैत पुष्टिमार्ग की दो प्रधान पीठ (तीसरी) और (सातवीं) स्थापित है- एक गोकुलचन्द्रमा जी और दूसरी मदनमोहन जी।| कामवन में आचार्य वल्लभाचार्य की बैठक भी भक्त वैष्णवों में पूज्य है।

कामां में चौरासी खम्भा नामक मस्जिद हिंदू मंदिर के ध्वंसावशेषों से निर्मित जान पड़ती है। मस्जिद के स्तंभ घट- पल्लव के अलंकरण तथा प्रतिमाओं से युक्त हैं। इन प्रतिमाओं से ही यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि ये स्तंभ वैष्णव और शैव मंदिरों के सभा मण्डप के अंग थे। एक स्तंभ पर अंकित "नमः शिवाय" अभिलेख इस तथ्य की पुष्टि करता है। अभिलेख के लिपि के अनुसार यह मंदिर आठवीं शताब्दी ईस्वी का प्रतीत होता है। इसके अतिरिक्त एक अन्य अभिलेख युक्त स्तंभ से विष्णु मंदिर के निर्माण का पता चलता है। शूरसेन वंश के दुर्गगण की पत्नी विच्छिका ने एक विष्णु मंदिर बनवाया था।[1]

काम्यवन को ब्रज के बारह वनों में से एक उत्तम वन कहा गया है। काम्यवन के आस-पास के क्षेत्र में तुलसी जी की प्रचुरता के कारण इसे कहीं आदि-वृन्दावन भी कहा जाता है। (वृन्दा तुलसी जी का ही पर्याय है।) वृन्दावन की सीमा का विस्तार पहले दूर-दूर तक फ़ैला हुआ था, गिरिराज-पर्वत, बरसाना, नन्दगाँव आदि स्थलियाँ वृन्दावन की सीमा के अन्तर्गत ही मानी गयीं थीं। महाभारत में वर्णित काम्यवन भी यही माना गया है जहाँ कुछ वक़्त पाण्डवों ने अज्ञातवास किया था। वर्तमान में यहाँ अनेक ऐसे स्थल मौजूद हैं जिससे इसे महाभारत से सम्बन्धित माना जा सकता है। पाँचों पाण्डवों की मूर्तियाँ, धर्मराज युधिष्ठिर के नाम से धर्मकूप तथा धर्मकुण्ड भी यहाँ प्रसिद्ध है।

विष्णु पुराण के अनुसार यहाँ कामवन की परिधि में छोटे-बड़े असंख्य तीर्थ हैं। कामवन अपने चौरासी कुंडों, चौरासी खम्भों और चौरासी मंदिरों के लिए जाना जाता है। 84 तीर्थ, 84 मन्दिर, 84 खम्भे आदि राजा कामसेन ने बनवाये थे, जो यहाँ की अमूल्य धरोहर हैं। यहाँ कामेश्वर महादेव, श्री गोपीनाथ जी, श्रीगोकुल चंद्रमा जी, श्री राधावल्लभ जी, श्री मदन मोहन जी, श्रीवृन्दा देवी आदि aमन्दिर हैं। यद्यपि अनुरक्षण के अभाव में यहाँ के अनेक मंदिर नष्ट भी होते जा रहे हैं, फ़िर भी यहाँ के कुछ तीर्थ आज भी अपना गौरव और श्रीकृष्ण की लीलाओं को दर्शाते हैं। कामवन को सप्तद्वारों के लिये भी जाना जाता है।

काम्यवन में सात दरवाज़े हैं–
डीग दरवाज़ा– काम्यवन के अग्नि कोण में (दक्षिण–पूर्व दिशा में) अवस्थित है। यहाँ से डीग (दीर्घपुर) और भरतपुर जाने का रास्ता है।
लंका दरवाज़ा– यह काम्यवन गाँव के दक्षिण कोण में अवस्थित है। यहाँ से सेतुबन्ध कुण्ड की ओर जाने का मार्ग है।
आमेर दरवाज़ा– काम्यवन गाँव के नैऋत कोण में (दक्षिण–पश्चिम दिशा में) अवस्थित है। यहाँ से चरणपहाड़ी जाने का मार्ग है।
देवी दरवाज़ा– यह काम्यवन गाँव के पश्चिम में अवस्थित है। यहाँ से वैष्णवीदेवी (पंजाब) जाने का मार्ग है।
दिल्ली दरवाज़ा –यह काम्यवन के उत्तर में अवस्थित है। यहाँ से दिल्ली जाने का मार्ग है।
रामजी दरवाज़ा– गाँव के ईशान कोण में अवस्थित है। यहाँ से नन्दगांव जाने का मार्ग है।
मथुरा दरवाज़ा– यह गाँव के पूर्व में अवस्थित है। यहाँ से बरसाना हो कर मथुरा जाने का मार्ग है। 

एक अन्य अभिलेख कामां में काम्यकेश्वर नाम से प्रख्यात शिवायतन का उल्लेख करता है। इस दान अभिलेख से यह भी ज्ञात होता है कि इस मंदिर में शिव के साथ- साथ विष्णु एवं चामुण्डा आदि देवताओं की पूजा भी होती थी। यहाँ से प्राप्त चतुर्मुख शिवलिंग के चारों ओर उत्कीर्ण प्रमुख देवों की प्रतिमाएँ भी इसी तथ्य की पुष्टि करते हैं। काम्यकेश्वर मंदिर में ७८६ और ८९६ ई. के बीच के काल में ही शिव- पार्वती और विष्णु की प्रतिमाएँ प्रस्थापित कर दी गई थीं। शूरसेन राजाओं के आश्रम में कामां में चामुण्डा, शिव और विष्णु के मंदिरों के साथ श्वेताम्बर संप्रदाय के काम्यक गच्छ के जैन मंदिरों के निर्माण का भी उल्लेख मिलता है।[2]

कामां में यक्ष सरोवर के अलावा चार शिवलिंगों के भी दर्शन किए जा सकते हैं। इन शिवलिंगों को पांचाली ने अपने पतियों की कुशलकामना के लिए स्थापित किया था। यहां उस इमारत के खंडहर आज भी मौजूद हैं, जहां पांडवों ने विश्राम किया था। [3]

इस नगरी का जयपुर रियासत से अठारहवीं सदी में रिश्ता तब हुआ, जब सवाई जयसिंह ने यहाँ अपने एक सूबेदार कीरत सिंह को भेजा, जिसका परिणाम भरतपुर रियासत के जन्म के रूप में हुआ।

कामां के निकटवर्ती गाँव कनवारा हैं जिसमे कर्ण कुंड स्थित हैं तथा इससे थोड़ा आगे कदमखंडी वन क्षेत्र हैं जहां श्री नागा जी की प्रतिमा है और नागा जी की समाधि स्थल स्थित है तथा इस वन में अनेक साधु तपस्या करते हैं।

1. सत्यभामा धाम सतवास।

भौगोलिक स्थिति

कामां क्षेत्र उत्तरप्रदेश व हरियाणा की सीमाओं से जुड़ा हुआ है अगर ब्रज क्षेत्र की बात करें तो 84 कोस यात्रा में इसका प्रमुख महत्व है क्योंकि इसे आदि वृंदावन के नाम से भी जाना जाता है।

ब्रज का भूगोल

ब्रज का भूगोल

किसी भी सांस्कृतिक भू-खंड के सास्कृतिक वैभव के अध्धयन के लिये उस भू-खंड का प्राकृतिक व भौगोलिक अध्ययन अति आवश्यक होता है। संस्कृत और ब्रज भाषा के ग्रन्थों में ब्रज के धार्मिक महत्व पर अधिक प्रकाश डाला गया है, किन्तु उनमें कुछ उल्लेख रूप में कुछ प्राकृतिक और भौगोलिक स्थित से भी सम्बधित वर्णन प्रस्तुत हैं। ये उल्लेख ब्रज के उन भक्त कवियों के कृतियों में प्रस्तुत है, जिन्होंने १६वीं शती के बाद यहां निवास कर अपनी रचनाएँ स्त्रजित की थी। उनमें से कुछ महानुभावों ने ब्रज के लुप्त स्थलों और भूले हुए उपकरणों का अनुवेषण कर उनके महत्व को पुनः स्थापित करने का प्रयास किया था। ऐसे मनीषी लेखकों में सर्वश्री रुपगोस्वामी, नारायणभटट, गंगवाल और जगतनंद के नाम विशेष उल्लेखनीय है। रुपगोस्वामी कृत - 'मथुरा माहत्म्य', नारायणभटट कृत - 'ब्रजभक्ति विलास' और जगतनंद कृत - 'ब्रज वस्तु वर्णन' में इस विषय से सम्बधित कुछ महत्वपूर्ण सूचनाएँ वर्णित हैं।

भू-संरचना

ब्रज प्रदेश यमुना नदी के मैदानी भाग में स्थित है साधारणतः यहां की भूमि का निर्माण यमुना नदी के द्वारा वहाकर लाई-गई मिटटी के जमाव से सम्पन्न हो सका है। यहां की भूमि प्रायः समतल है। यहां की भूसतह की समुद्रतल से ऊँचाई लगभग ६०० फीट है। ब्रज का उत्तरी भाग ६०० फीट से भी अधिक ऊँचा है जवकि दक्षिणी भाग ६०० फीट से कम है अत यहां की भूसतह का ढलाव उत्तर से दक्षिण की ओर है और इसके मध्य से होकर यमुना नदी की धारा उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर निरन्तर प्रवाहित है।

भू-संरचना की दृष्टि से ब्रज को तीन प्राकृतिक भागों में विभाजित किया जा सकता है - (१) मैदानी भाग (२) पथरीला या पहाड़ी भाग और (३) खादर का भाग। मैदानी भाग विस्तृत है जो यमुन नदी के दोनों ओर पूर्व और पश्चिम दिशाओं में फैला हुआ है। प्राचीन काल में इस भाग में यमुना के दोनों ओर बड़े-बड़े बन थे जो अत्यधिक सघन थे, जिनके कारण ब्रज प्रदेश में अतिसय बर्षा होती थी। उस समय यह भाग अत्यधिक रमणीक और उपजाऊ था। प्राचीन बनों के निरन्तर काटे जाने के कारण अव यहां वर्षा कम होने लगी है और राजिस्थानी सूखाग्रस्त रेगिस्तान का फैलाव इधर बढ़ने लगा है, जिससे इस क्षेत्र की जलवायु और उपज पर अत्यधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। फिर भी यमुना से पूर्व दिशा वाला मैदानी भाग अधिक उपजाऊ बना हुआ है क्योंकि यह दोमट मिटटी से निर्मित है। पश्चिम दिशा वाले मैदानी भाग की भूमि बालूदार और मटियार है, अतः यह पूर्वी भाग की दोमट भूमि की अपेक्षा कम उपजाऊ है।

पथरीला और पहाड़ी भाग ब्रज की उत्तरी-पश्चिमी दिशाओं में है। इस भाग में कई छोटी पहाड़िया स्थित हैं, जिनका धार्मिक महत्व अधिक है। हालांकि ये नाम-मात्र की पहाड़ियां हैं क्योंकि इनकी वास्तविक ऊँचाई १०० फीट के लगभग है। ब्रज का अधिकांश भाग यमुना नदी के मैदानी भाग मे होने के कारण यहां कोई पर्वत और पहाड़ नहीं हैं। जैसा पहिले अंकित है कि इसके पश्चिमी भाग में कुछ नीची पहाड़ियां है, जो अरावली पर्वत श्रखलाओं की टूटी हुई स्थिति में विधमान है। इन नीची और साधारण पहाड़ियों को इनके धार्मिक महत्व के कारण ही 'गिरी' या पर्वत कहा जाता है।

ब्रज में पर्वत

कवि जगतनंद के वर्णनानुसार ब्रज में ५ पर्वत या पहाड़िया हैं:

द • वा • ब्रज के पहाड़
 • गोबर्धन • नंदगाँव • बरसाना • कामबन • चरण • टीले

गोबर्धन पहाड़ी

मथुरा नगर के पश्चिम में लगभग मील की दूरी पर यह पहाड़ी स्थित है। इसकी वास्तविक ऊँचाई पहाड़ी समतुल्य नहीं है, किन्तु इसके अनुपम धार्मिक महत्व के कारण इसे धर्मसम्मत कवियों और लेखकों ने अपने विवरणों में 'गिरिराज' (पर्वतों के राजा) के रूप में वर्णित किया है। इसकी ऊँचाई लगभग १०० फीट और लम्बाई ५ मील के लगभग है। ऐसी अनुश्रुति है कि इसकी ऊँचाई पहिले बहुत अधिक थी, किन्तु वह धटते-धटते इतनी कम अधिशेष रह गई है। प्राचीन बृदावन का विस्तार थी प्राचीन काल में गोबर्धन तक विस्तत था तथा इसके समीप से यमुना नदी प्रवाहित होती थी। गर्गसंहिता में गोबर्धन पर्वत की वंदना करते हुए इसे वृन्दावन में विराजमान और वृन्दावन की गोद में निवास करने वाला गोलोक का मुकुटमणि कहा गया है। २ पौराणिक उल्लेखों के अनुसार भगवान कृष्ण के काल में यह अत्यन्त हरा-भरा रमणीक पर्वत था। इसमें अनेक गुफा अथवा कदराएँ थी और उनसे शीतल जल के अनेक झरने झरा करते थे। उस काल के ब्रज-वासी गण उसके निकट अपनी गायें चराया करते थे, अत वे उक्त पर्वत को बड़ी श्रद्धा की द्रष्टि से देखते थे। भगवान श्री कृष्ण ने इंद्र की परम्परागत पूजा बन्द कर गोबर्धन की पूजा ब्रज में प्रचलित की थी, जो उसकी उपयोगिता के लिये उनकी श्रद्धांजलि थी।

ब्रज के भक्त महानुभावों ने, विशेषकर बल्लभ सम्प्रदायी कवियों ने गोबर्धन के प्रति अत्यधिक श्रद्धा व्यक्त की है। अष्टछाप के कवियों ने गिरिराज-गोवर्धन को राधा-कृष्ण की केलि-क्रीड़ाओं का केन्द्र वतलाते हुए उसके प्राकृतिक सौदर्य का भी बड़ा ही भव्य वर्णन प्रस्तुत किया है। चतुर्भुज दास ने कहा है - वहां शीतल, मंद, सुगन्धित पवन प्रवाहित होती है, सुन्दर झरना झरते हैं, समस्त ॠतुओं में खिलने वाले सुन्दर पुष्प और फल विधमान रहते हैं। ३ अन्य कवियों ने भी इसके सुन्दर शिखरों पर विधमान नवीन वनस्पति, मनोरम दल, फूल-फल तथा पवित्र झरनों का वर्णन प्रस्तुत किया है। ४

भगवान श्री कृष्ण के काल में इन्द्र के प्रकोप से एक बार ब्रज में भयंकर वर्षा हुई थी। उस समय सम्पूर्ण ब्रज के जल मग्न हो जाने का आशंका उत्पन्न हो गई थी। भगवान श्री कृष्ण ने उस समय गोवर्धन के द्वारा समस्त ब्रजवसियों की रक्षा की थी। भक्तों का विश्वास है, श्री कृष्ण ने उस समय गोवर्धन को छाता के समान धारण कर उसके नीचे समस्त ब्रजवासियों को एकत्र कर लिया था, उस अलौकिक घटना का उल्लेख अत्यन्त प्राचीन काल से ही पुराणादि धार्मिक ग्रन्थों में और कलाकृतियों में होता रहा है। ५ ब्रज के भक्त कवियों ने उसका बड़ा उल्लासपूर्ण कथन किया है। ६ आजकल के वैज्ञानिक युग में उस आलौकिक घटना को उसी रूप में मानना संभव नहीं है। उसका बुद्धिगम्य अभिप्राय यह ज्ञात होता है कि श्री कृष्ण के आदेश अनुसार उस समय ब्रजवासियों ने गोवर्धन की कंदराओं में आश्रय लेकर वर्षा से अपनी जीवन रक्षा की थी।

गोवर्धन के महत्व की सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना यह है कि यह भगवान कृष्ण के काल का एक मात्र स्थिर रहने वाला चिन्ह है। उस काल का दूसरा चिन्ह यमुना नदी भी है, किन्तु उसका प्रवाह लगातार परिवर्तित होने से उसे स्थाई चिन्ह नहीं कहा जा सकता है। समस्त भारतवर्ष से लाखों नर-नारी प्रतिवर्ष गोवर्धन के दर्शन और उसकी परिक्रिमा करने के लिये आते हैं। ब्रज यात्रा के अवसर पर यहां यात्रीगण कई दिनों तक ठहरते हैं। उस समस यहां पर अनेक उत्सवों का आयोजन होता है। उपाषकों की मान्यतानुसार गोवर्धन भगवान श्रीकृष्ण का प्रतिरुप ही है। ७

नंदगाँव की पहाड़ी

इसे 'नदीश्वर' अथवा 'रुद्रगिरि' भी कहा जाता है। १ यह ब्रज के नन्दगाँव नामक ग्राम में स्थित है, जो कृष्ण काल में भगवान श्री कृष्ण के पालक-पिता नंद गोप की राजधानी थी। यह मथुरा शहर के पश्चिम में स्थित है इसकी लम्बाई लगभग आधी मील और ऊँचाई लगभग फीट है। इसके सवसे ऊँचे भाग पर नंदराय जी का मन्दिर है। पहाड़ी के चतुर्दिक ढलाव पर उसके नीचे नंदगाँव की बस्ती है। ब्रज के भक्त कवियों ने इस पहाड़ी की अपने वर्णनों में प्रशंसा वर्णित की है।

१. नंदीश्वर र्तृ नंद जसोदा गोपिन न्यौंत बुलाए। (कुंभनदास)

वरसाना की पहाड़ी

इसे ब्रम्हगिरि भी कहते हैं। यह ब्रज के वरसाना नामक ग्राम में स्थित है और इसकी स्थिति वर्तमान मथुरा शहर के पश्चिम में है और यह नंदगाँव से लगभग ४ मील दक्षिण में है। भगवान कृष्ण के काल में यह राधा जी के पिता बृषभानु गोप का निवास स्थान था। वरसाना की पहाड़ी नंदगाँव पहाड़ी से कुछ बड़ी है और इसमें कई धार्मिक स्थल हैं, जो प्राकृतिक दृष्टिसे भी बड़े रमणीक हैं।

इस पहाड़ी के ऊँचे स्थल पर भी लाडिली जी का सुन्दर मन्दिर है तथा दूसरे स्थलों पर अन्य मन्दिर निर्मित हैं। इसके चतुर्दिक बरसाना ग्राम की बस्ती है। ब्रज के भक्त कवियों ने वरसाना का भी वर्णन राधा-कृष्ण की लीलाओं के प्रसंग में किया है। १

१. बरसाने बृषभान गोप के लाल की भई सगैया। (परमानन्द दास) चले कुँवर लै बरसाने कों, प्रफुलित मन बृज राज। (कुंभनदास)

कामबन की पहाड़ी

यह पहाड़ी राजस्थान के कामबन नामक स्थान में स्थित है, जो ब्रज सीमान्तर्गत। इस पहाड़ी को कामगिरि भी कहा जाता है। यह लगभग ४०० गज में विस्तृत है।

चरण की पहाड़ी

यह छोटी पहाड़ी नंदगाँव और बरसाना की पहाड़ियों की भाँति मथुरा जिले की छाता तहसील में स्थित है। नंदगाँव से लगभग ६ मील उत्तर-पूर्व की ओर यह ब्रज के छोटी बठैंन नामक ग्राम में है। यह लगभग ४०० गज लंबा और लगभग १० फीट ऊँचा पत्थरों का एक ढेर मात्र है, किन्तु इसके धार्मिक महत्व के कारण 'चरण पहाड़ी' कहा जाता है। भक्तों की मान्यता है कि यहां पर भगवान श्री कृष्ण के चरण चिन्ह हैं। ब्रज में एक दूसरी चरण पहाड़ी भी है, जो कामबन के समीप स्थित है, वहां भी भगवान श्री कृष्ण के चरण चिन्ह होने का विश्वास किया जाता है।

उपर्युक्त पाँचों पहाड़ियों के अतिरिक्त बरसाने के निकटवर्ती ऊँचा गाँव में भी एक छोटी सी पहाड़ी है, जिसे सखीगिरि कहा जाता है। उसी के समीप रनकौली ग्राम में भी एक छोटी पहाड़ी है। ब्रज के भक्त कवियों की रचनाओं मे इन पहाड़ियों का वर्णन नहीं वर्णित है। परमानंद दास के एक पद में केवल चरण चरण पहाड़ी का वर्णन मिलता है। १

१. लुकि लुकि खेलत आँख मिचौंनी 'चरन पहाड़ी' ऊपर। (परमानंददास)

टीले

ब्रज में उपर्युक्त पक्की पहाड़ियों के अतिरिक्त कच्चे टीले भी बहुत सखया में हैं। मथुरा नगर का अधिकांश भाग इन टीलों पर बसा हुआ है और नगर के चारों ओर भी दूर-दूर तक अनेक टीले फैले हुए हैं। इनमें से अधिकांश टीलों के अन्दर मथुरा नगर के प्राचीन काल में बार-बार बसने और उजड़ने के पुरातात्विक अवशेष छुपे हुऐ हैं। इनमें कंकाली यीला, भूतेश्वर टीला, कटरा केशवदेव टीला, गोकर्णश्वर टीला, सप्तॠषि टीला, जेल टीला, चौबारा टीला आदि उल्लेखनीय हैं। इनकी खुदाई से वहुसख्यक पुरातात्विक महत्व के पुरावशेप पाये गये हैं जिनके सहयोग से ब्रज के वैभवपूर्ण सास्कृतिक इतिहास की रचना हो सकी है।

मथुरा शहर के अतिरिक्त सम्पूर्ण ब्रज मंडल में प्राचीन मानवीय बस्तियों से सम्वधित अनेकों टीले विखरे हुए हैं जिनके विषय में कहीं उल्लेख तक नहीं है जबकि कुछ भी प्राचीनता का सव्यापन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के द्वारा किया गया है जिनमें मुख्य है कंकाली टीला, भूतेश्वर टीला, सोंख टीला, सतोहा टीला, अड़ीग टीला, गनेशरा टीला और महोली के समतल किये गये टीले, छाता का टीला, भौगाँव का टीला, नगला सांकी का टीला, सुनरख के टीले, वृन्दावन के पुराने गोविन्द मन्दिर टीला, मदनमोहन मन्दिर टीला, गोंदा आटस का टीला, कीकी नगला का टीला, माँट का टीला, गौसना का टीला, भरतपुर का नोंह का टीला आदि-आदि टीलें ब्रज की प्राचीन संस्कृति को संरक्षित और सुरक्षित किये हुए हैं।

ब्रज के घाट

ब्रज में मथुरा, वृन्दाबन, महाबन और गोकुल आदि स्थानों में यमुना नदी पर अनेक धाच निर्मित हैं। इनसे स्नानार्थियों को सुविधा होने के साथ ही साथ यमुना तट के सौंदर्य की भी बृद्धि होती है। वर्तमान काल में यहां पर वहुसख्यक घाट निर्मित हैं, किन्तु पहिले इनकी संखया अल्प थी, कवि जगतनंद ने ब्रज १६ पुराने घाटों का नाम उल्लेख किया है। उनके समय में अरथात १७ वीं शताबदी में यहां पर नये घाट भी निर्मित किये गये थे, जिनकी संख्या कालान्तर में कृमशः वढ़ती रही है।

पुराने घाट

कवि जगतनंद द्वारा उल्लखित पुराने घाटों के नाम निम्नलिखित हैं -
(१) व्रमहांड घाट (महाबन), (२) गौ घाट, (३) गोविन्द घाट, (४) ठकुरानी घाट, (५) यशोदा घाट, (६) उत्तरेश्वर घाट (गोकुल), (७) वैकुंठ घाट, (८) विश्रांत घाट, (९) प्रयाग घाट, (१०) बंगाली घाट (मथुरा), (११) राम घाट, (१२) केशी घाट, (१३) विहार घाट, (१४) चीर घाट, (१५) नंद घाट औ (१६) गोप घाट (वृन्दाबन) १

इस समय मथुरा के घाटों की संख्या विश्राम घाट सहित २५ है। इनमें से १२ घाट विश्राम घाट के उत्तर दिशा में हैं और १२ उसके दक्षिण में हैं। वृन्दाबन में कलियदह से केसीघाट तक अनेक घाट हैं, जिनकी संख्या लगभग ३५ है। इसी प्रकार गोकुल और महाबन में भी कई प्राचीन और प्रसिद्ध घाट निर्मित हैं। ये सब घाट सुन्दर लाल बलुआ प्रस्तर से निर्मित हैं। इनमें से बहुतों पर कलापूर्ण बुर्जियां और छतरियाँ भी निर्मित हैं। इन्हे समय-समय पर अनेक श्रद्धालु राजा-महाराजाओं और समृद्ध व्यक्तियों ने निर्मित कराया है। पिछले अने वर्षो से यमुना नदी ने बहुत घाटों को छोड़ दिया है, जिससे वे शोभाहीन होकर भग्वानस्था में उपेक्षित पड़े हुए हैं। अब भी जव वर्षा ॠतु में यमुना का फैलाव बढ़ जाता है, तब उसका प्रवाह इन सभी धाटों पर होने लगता है। उस समय यमुना तट की जो अनुपम शोभा होती है, ससे दर्शनों का मन मुग्ध हो जाता है।


ब्रज की नदियां,‌ झीलें, सरोवर, कुंड, ताल पोखर, बावड़ी और कूप

ब्रज की नदियां,‌ झीलें, सरोवर, कुंड, ताल पोखर, बावड़ी और कूप

ब्रज क्षेत्र में बहने वाली नदियां

ब्रज में कई नदियां आतीं हैं। उनमें से प्रमुख है यमुना नदी।। जो ब्रज मंडल की ही नहि अपितु सारे भारत की भी एक मुख़्य नदी है।

यमुना

ब्रज की अन्य नदियाँ

ब्रज मंडल में यमुना के अतिरिक्त कोई दूसरी स्वतंत्र नदी नहीं है। यहां पर यमुना की कुछ सहायक नदियाँ अवश्य वहती हैं, जिनमें पटबाह, सेंगर, करबन, सिरसा बांन गंगा और गंभीर के नाम उल्लेखनीय हैं।

पटवाह

यह एक छोटी वरसाती नदी है, जो मेरठ जिला से निकल कर अलीगढ़ जिला की खैर एवं मथुरा जिला की भाँट तहसीलों में बहती है। इसके तट का एक मात्र उल्लेखनीय ग्राम बाजना है, जहाँ से आगे यह नौहझील के निकट यमुना में मिल जाती है। इससे भाँट तहसील की भूमि को सिंचित किया जाता है।

करबन

इसे कारों भी कहते हैं। यह भी एक प्रकार से एक बरसाती नदी है, जो गर्मी में प्राय सूख जाती है, किन्तु वर्षा ॠतु में इसका आकार बहुत बड़ जाता है। यह बुलंदशहर की खुरजा तहसील से आकर हाथरस जिला सहित उसकी खैर और इगलास तहसीलों में बहती है फिर हाथरस जिला की ही सादाबाद तहसील से होकर आगरा जिला की एत्मादपुर तहसीलों में प्रवाहित होती है। उसके बाद यह नदी आगरा नगर से कुछ आगे यमुना में मिल जाती है इससे ब्रज की कई तहसीलों की कृषि भूमि सिंचित होती है। इसके तटवर्ती ग्रामों और कस्बों में चंदौस खैर और इगलास उल्लेखनीय है।

सेंगर और सिरसा

ये भी यमुना की ही छोटी सहायक नदियां हैं, जो अलीगढ़, हाथरस जिले के सासनी ब्बालाक हाथरस सलेमपुर नगला अबू जलेसर फिरोजाबाद

द और शिकोहाबाद नगर और कस्बों में बहती हैं। इनके तटके समीप बरहद, जलेसर और शिकोहाबाद नामक स्थान बसे हैं।

बांन गंगा और गंभीर

ये छोटी नदियाँ राजस्थान के भरतपुर क्षेत्र में तथा आगरा जिला की खैरागढ और फतेहबाद तहसीलों में बहती हैं। इन्हें उटंगन भी कहा जाता है। बांन गंगा भरत पुर क्षेत्र की कई नहरों तथा बाँधो को पानी देकर अपना अस्तित्व समाप्त कर देती है और गंभी नदी बटेश्वर के उत्तर-पश्चिम में यमुना में मिल जाती है। इसकी सहायक नदी खादी है।

लुप्त नदियाँ

उपर्युक्त छोटी बरसाती नदियों के अतिरिक्त यमुना की दो सहायक नदियाँ और थीं, जिनके नाम 'सरस्वती' और 'कृष्णगंगा' कहे जाते हैं। ये दोनों किसी समय में मथुरा के पश्चिमी भाग में प्रवाहित होकर यमुना में मिलती थीं। वर्तमान काल में ये नदियों के रूप में प्रवाहित नहीं होती हैं, किन्तु इनके अवशिष्ट रूप अब भी ब्रज में विधमान हैं। ब्रजमंडल की इन लुप्त नदियों का जो वृत्तान्त उपलब्ध होता है, वह इस प्रकार है -

सरस्वती नदी

प्राचीन काल में मथुरा के निकटवर्ती अंबिकाबन में यह नदी प्रवाहित होती थी और यमुना में उस स्थान पर

कृष्ण गंगा नदी

प्राचीन काल में श्री कृष्ण के जन्म स्थान के निकटवर्ती भाग में बहकर यमुना में उस स्थान पर मिलती थी, जहाँ आजकल कृष्ण गंगा धाट, धारा पत्तन धाट और धंट भरण धाट है। ये धाट उक्त नदी के नाम तथा कुछ ऊँचाई से यमुना में गिरने के कारण उसके तुमुलधोष के सूचक हैं। इस समय उक्त नदी के अस्तित्व के बजाय एक नाला है, जो बरसात में बहता है। मथुरा नगर के नवीन निर्माण के कारण उसका पुराना मार्ग बदल गया है। अब वह श्री कृष्ण जन्म स्थान, मंडी रामदास और चौक बाजार के बरसाती जल को समेटता हुआ स्वामी धाट के पास यमुना में मिलता है।

तथाकथित गंगाएँ

ब्रज में कतिपय बरसाती नदियाँ तथा सरोवरों को भी गंगा कहते हैं, जो उनके निकटवर्ती स्थानों के धार्मिक महत्व का सूचक है। एसे जलाशयों के नाम इस प्रकार हैं -

कृष्ण गंगा (मथुरा), मानसी गंगा (गोबर्धन), अलखगंगा (आदिबदरी कामबन), पांडव गंगा (कामबन), चरण गंगा (चरण पहाड़ी छोटी बठैन)

ब्रज के अन्य जल स्रोत

ब्रज की झील

ब्रज की सीमान्तर्गत कई छोटी-बड़ी झीलें हैं, जिनके नाम निम्न प्रकार हैं -

नोहझील -
यह मथुरा जिलाकी भाँट तहसील के अन्तर्गत इसीनाम के ग्राम के समीप स्थित है

मोती झील
यह भी भाँट तहसील में भाँट ग्राम के पास स्थित है। यह अब यमुना नदी की धारा में समा गई है।

कीठम झील
यह दिल्ली आगरा राष्ट्रीय राजमार्ग सख्या-२ पर रुनकुता नामक ग्राम के समीप स्थित है। ब्रज की यह सरम्य स्थली सैलानियों के लिये आकर्षण का भी केन्द्र है।

मोती झील (दूसरी)
यह भरतपुर के समीप का जलाशय है, जो वहाँ की रुपारेल नामक छोटी नदी के पानी से भरा जाता है।

केवला झील
यह अत्यन्त सुंदर झील भरतपुर के समीप है, जो अजान बंध के जल से भरी जाती है। शरद ॠतु में इस झील के किनारे देश-विदेश के अगणित जल पक्षी विहार करने हेतु पहुँचते हैं। सैलानी उन पक्षियों को देखने के लिए यहां आते हैं।

मोती झील
यह वृन्दाबन रमणरेती में स्वामी अखंडानंद आश्रम का एक जलाशय है। यह कफी गहरा है और इसके फर्स सहित चारों ओर से पक्का है। इसमें उतरने के लिये चारों ओ सीड़िया निर्मित हैं, जो पस्तर की हैं। इसमें वर्षा के जल को संचित कर लिया जाता है, किन्तु वर्तमान समय में अल्प वर्षा के कारण खाली रह जाती है और इसमें जो अल्प जल रहता भी है तो वह वहुत पवित्र नहीं है।

ब्रज की सरोवरें

कवि जगतनंद के अनुसार चार सरोवर हैं जिनके नाम हैं - पान सरोवर, मान सरोवर, चंद्र सरोवर और प्रेम सरोवर।

पान सरोवर
ब्रज के नंदगाँव का यह एक छोटा जलाशय है। १

मानसरोवर
वृन्दावन के समीप यमुना के उस पार है। यह हित हरिवंश जी का प्रिय स्थल है यहाँ फाल्गुन में कृष्ण पक्ष ११ को मेला लगता है।

चन्द्र सरोवर
यह गोबर्धन के समीप पारासौली ग्राम में स्थित है। इसके समीप बल्लभ सम्प्रदायी आचार्यो द्वारा वैठकें आयोजित की जाती थीं और यह सूरदास जी का निवास स्थल है।

प्रेम सरोवर
यह वरसाना के समीप है। इसके तट के समीप एक मंदिर है। भाद्रपद मास में इस सरोवर पर नौका लीला का आयोजन और मेला होता है।

कुंड

ब्रज में अनेक कुंड हैं, जिनका अत्यन्त धार्मिक महत्व है। आजकल इनमें से अधिकांश जीर्ण-शीर्ण और अरक्षित अवस्था में हैं, जो प्राय सूखे और सफाई के अभाव में गंदे पड़े हैं। इनके जीर्णोद्धर और संरक्षण की अत्यन्त आवश्यकता है, क्योंकि इन कुंडों के माध्यम से भूगर्भीय जल स्तर की बड़ोतरी होती है साथ-ही-साथ भूगर्भीय जल की शुद्धता और पेयशीलता बड़ती है। कवि जगतनंद के अनुसार ब्रज में पुराने कुंडों की सख्या १५९ है तथा बहुत से नये कुंड भी हैं। उन्होंने लिखा है पुराने १५९ कुंडों में से ८४ तो केबल कामबन में हैं शेष ७५ ब्रज के अन्य स्थानों में स्थित है। १

१. उनसठ ऊपर एकसौ, सिगरे ब्रज में कुंड। चौरासी कामा लाखौ, पतहत्तर ब्रज झुँड।। औरहि कुंड अनेक है, ते सब नूतन जान। कुंड पुरातन एकसौ उनसठ ऊपर मान।। (ब्रजवस्तु वर्णन)

ताल

ब्रज में बहुत से तलाब हैं जो काफी प्रसिद्ध हैं। कवि जगतनंद ने केवल दो तलाबों - रामताल और मुखारीताल का वर्णन प्रस्तुत किया है। १ इनके अतरिक्त भी बहुत से तालाब हैं, जिनमें मथुरा का शिवताल प्रसिद्ध है।

१. दोइ ताल ब्रज बीच हैं, रामताल लखिलेहु। और मुखारी ताल है, 'जगतनंद' करि नेहु।। (ब्रजवस्तु वर्णन)

पोखर

ब्रज में अनेकों पोखर अथवा वरसाती कुंड हैं। कवि जगतनंद ने उनमें से ६ का नामोल्लेख किया है वे पोखर हैं -
(१) कुसुमोखर (गोबर्धन) (२) हरजी ग्वाल की पोखर (जतीपुरा) (३) अंजनोखर (अंजनौ गाँव) (४) पीरी पोखर और (५) भानोखर बरसाना तथा ईसुरा जाट की पोखर (नंदगाँव) है। १ उनमें कुसुम सरोवर को ब्रज के जाट राजाओं ने पक्के विशाल कुंड के रूप में निर्मित कराया था।

बावडी

इनका प्रयोग ब्रज प्रजा पेय जल के प्राप्त करने के लिये करती थी। ब्रज में अभी भी कई प्रसिद्ध और सुन्दर बावड़ी है, किन्तु ये जीर्ण अवस्था में पड़ी है। इनमें मुख्य निम्न वत हैं - ज्ञानवापी (कृष्ण जन्मस्थान, मथुरा), अमृतवापी (दुर्वासा आश्रम, मथुरा), ब्रम्ह बावड़ी (बच्छ बन), राधा बावड़ी (वृन्दाबन) और कात्यायिनी बावड़ी (चीरधाट) हैं।

कूप

ब्रज में वहुसख्यक कूप हैं जिनका उपयोग आज भी ब्रजवासी पेय जल प्राप्त करने के लिये करते हैं। ब्रज मंडल के अधिकांश ग्रामों की आवसीय परिशर में भूगर्भीय जल खारी है अथवा पीने के लिये अन उपयोगी है। अतः इस संदर्भ में कहावत प्रचलित कि भगवान कृष्ण ने बचपन की सरारतों के चलते ब्रज के ग्रामों की आवसीय परिशर के भू-गर्भीय जल को इस लिये खारी (क्षारीय) और पीने के लिये अन उपयोगी बना दिया ताकि ब्रज गोपियाँ अपनी गागर लेकर ग्राम से बाहर दैनिक पेय जल लेने के लिये निकले और कृष्ण उनके साथ सरारत करें, उनकी गागरों को तोड़ें और उनके साथ लीला करें। आज भी ब्रज ग्रामीण नारियों को सिर पर मटका रख ग्राम से बाहर से जल लाते हुए समुहों के रूप में ग्राम बाहर के पनधट और कूपों पर देखा जा सकता है। पेय जल के साथ-साथ इन कूपों का ब्रज में धार्मिक महत्व भी है। कवि जगतनंद के समय में १० कूप अपनी धार्मिक महत्ता के निमित्त प्रसिद्ध थे। इनके नाम इस प्रकार वर्णित हैं -

(१) सप्त समुद्री कूप, (२) कृष्ण कूप, (३) कुब्जा कूप (मथुरा), (४) नंद कूप (गोकुल और महाबन), (५) चन्द्र कूप (चन्द्र सरोवर गोबर्धन), (६) गोप कूप (राधा कुंड), (७) इन्द्र कूप (इंदरौली गाँव-कामबन), (८) भांडीर कूप (भाडीर बन), (९) कर्णवेध कूप (करनाबल) और वेणु कूप (चरण पहाड़ी कामबन) १

भूतेश्वर महादेव, मथुरा, उत्तर प्रदेश, भारत

भूतेश्वर महादेव

भूतेश्वर महादेव

भूतेश्वर मंदिर मथुरा के बारे में

मथुरा में श्री कृष्ण जन्मस्थान के पास स्थित है, भूतेश्वर महादेव मंदिर । यह मंदिर शहर के सबसे पुराने और भगवान शिव को समर्पित सबसे पूजनीय स्थलों में से एक है। यहाँ के मुख्य देवता भूतेश्वर महादेव के रूप में पूजे जाते हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग 2 पर स्थित इस मंदिर का गर्भगृह लगभग 100 वर्ग मीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है, जो यहां आने वाले भक्तों के लिए शांतिपूर्ण और आध्यात्मिक वातावरण प्रदान करता है।

भूतेश्वर महादेव की कहानी वाल्मीकि रामायण और मंदिर की मौखिक परंपराओं दोनों में देखने को मिलती है। किंवदंतियों के अनुसार, श्रावण के महीने में, भगवान शत्रुघ्न ने शक्तिशाली राक्षस लवणासुर नामक राक्षस का वध किया। राक्षस लवणासुर को हराने के बाद शत्रुघ्न ने मथुरापुरी नामक शहर की स्थापना की थी। अतः मथुरा में भूतेश्वर मंदिर उसी युग से स्थापित है। इस मंदिर का कथा की जड़ें त्रेता और द्वापर युग से जुड़ी हैं। 

किंवदंतियों के अनुसार, त्रेता युग में मधु के बेटे लवणासुर ने अमर होने के लिए भगवान शिव की तपस्या की और भगवान शिव ने उसे एक त्रिशूल प्रदान किया, और कहा कि जब तक यह त्रिशूल उसके महल में रहेगा, तब तक उसे कोई भी नहीं मार सकेगा। लवणासुर ने वह त्रिशूल अपनी महल में स्थापित कर दिया।

इस वरदान से सशक्त होकर लवणासुर निडर हो गया और उसने मथुरा में आतंक मचाना शुरू कर दिया। वह ऋषियों के अनुष्ठानों में बाधा डालता और कभी कभी उन्हें मार भी डाला।

मदद की तलाश में, ऋषि अयोध्या गए, जहाँ भगवान राम शासन कर रहे थे। उन्होंने भगवान राम से सहायता मांगी। ऋषियों की सहायता के लिए भगवान राम ने शत्रुघ्न को भेजा। उन्होंने शत्रुघ्न से कहा कि जब मथुरा के राजा लवणासुर को हराकर वहां पर राज्य करो। लेकिन शत्रुघ्न ने लवणासुर को हराने का तीन बार प्रयास किया। युद्ध में लवणासुर को हराने के तीन असफल प्रयासों के बाद, शत्रुघ्न पराजित महसूस करते हुए अयोध्या लौट आए। 

भगवान राम ने शत्रुघ्न को मथुरा वापस जाने और शक्ति के लिए मथुरा में स्थित भूतेश्वर महादेव की पूजा करने की सलाह दी। उन्होंने कहा शत्रुघ्न जैसे मैंने लंका में युद्ध करने से पहले रामेश्वर महादेव की पूजा की थी। उसी प्रकार युद्ध करने से पहले मथुरा में स्थित भूतेश्वर महादेव की पूजा कर उनसे आशीर्वाद  प्राप्त करो। 

शत्रुघ्न ने उनकी सलाह का पालन किया और भूतेश्वर महादेव की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भूतेश्वर महादेव ने वर मांगने के लिए कहा तो शत्रुघ्नन कहा बड़े भैया राम की आज्ञा है कि लवणासुर को मार कर मथुरा नगरी पर शासन करू। परंतु में हर बार असफल रहा हूं। 

शत्रुघ्न तुम्हारे बड़े भाई राम की तरह लावना सुरभि मेरा अनन्य भक्त है उसने भी मेरी भक्ति करके मुझसे एक त्रिशूल प्राप्त किया है। जब तक वह त्रिशूल उसके महल में रहेगा उसे कोई नहीं मार सकता।

लवणासुर की कमजोरी को उजागर होने के उपरांत हनुमानजी की सहायता से वह त्रिशूल प्राप्त किया। इसके बाद शत्रुघ्न लवणासुर को मारने और मथुरा में अपना राज्य स्थापित करने में सफल हो सके। 

द्वापर युग में भी भूतेश्वर महादेव के महत्व का वर्णन मिलता है।भगवान कृष्ण के समय में द्वापर युग था। गोकुल में पाँच वर्ष बिताने और सात वर्ष तक अपनी दिव्य लीलाएँ करने के बाद, कृष्ण ने 11 वर्ष और 28 दिन की आयु में अत्याचारी कंस का वध किया। 

महाभारत के बाद, कृष्ण मथुरा लौट आए, जहाँ उनके माता-पिता ने उन्हें चार धाम की तीर्थ यात्रा करने के उनके वादे की याद दिलाई। फलस्वरूप, कृष्ण ने 33 करोड़ देवी-देवताओं, पवित्र तीर्थ, नदियों के साथ-साथ सभी चार धामों के देवताओं के पास जाने के बजाय उन्हें ब्रज में रहने के लिए आमंत्रित करने का फैसला किया। परिणामस्वरूप, बृज में सभी देवता निवास करने लगे, जिससे ब्रज को गोलोक भी कहा जाने लगा।

हालाँकि, इन देवों में देवी गंगा और भगवान काशी विश्वनाथ नहीं आए। गंगा ने संकोच किया कि बहन यमुना को पार करने से बहन के मान का मर्दन अर्थात का अपमान होगा, इसलिए भगवान कृष्ण ने मानसी गंगा के रूप में गंगा को प्रकट किया। 

इसी तरह, भगवान काशी विश्वनाथ ने घोषणा कर कृष्ण को बताया कि वे पहले से ही मथुरा में भूतेश्वर महादेव के रूप में मौजूद हैं। श्रीकृष्ण ने इनको ब्रज चौरासी कोस का मालिक बना दिया, इसलिए भूतेश्वर महादेव को मथुरा का कोतवाल भी कहा जाता है। और भगवान भूतनाथ भूतेश्वर अपने चार रूपों में स्थित होकर मथुरा की चारों दिशाओं से रक्षा करने लगे । चारों दिशाओं में स्थित होने के कारण भगवान शिव को मथुरा का कोतवाल कहते हैं। 

मथुरा के चारों ओर चार शिव मंदिर आज भी स्थापित हैं- पूर्व में पिपलेश्वर महादेव का, दक्षिण में रंगेश्वर महादेव का और उत्तर में गोकर्णेश्वर महादेव का और पश्चिम में भूतेश्वर महादेव का मन्दिर है। मथुरा को आदि वाराह भूतेश्वर क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है।


कृष्ण ने भूतेश्वर महादेव को ब्रज के 84 कोस क्षेत्र का रक्षक नियुक्त किया।


यही कारण है कि भूतेश्वर महादेव को मथुरा का रक्षक कहा जाता है। 

भूतेश्वर महादेव मंदिर की एक अनूठी विशेषता यह है कि इसका संबंध 52 शक्तिपीठों से है, जहाँ माना जाता है कि भगवान शिव प्रत्येक स्थल की रक्षा करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि सती के बाल इसी स्थान पर गिरे थे, जिससे यह ग्यारहवाँ शक्तिपीठ बन गया। इस पवित्र स्थल की रक्षा के लिए भूतेश्वर महादेव भूतेश्वर भैरव के रूप में यहाँ निवास करते हैं। इस कारण इन्हें भूतेश्वर भैरव के नाम से भी जानते है।

मंदिर में पाताल देवी की गुफा भी है, जो राजा कंस द्वारा पूजी जाने वाली देवी है, जो इसके ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व को और बढ़ाती है।


 ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव के आशीर्वाद के बिना मथुरा की स्थापना संभव नहीं होती, जिसके कारण उन्हें 'कोतवाल' या शहर के संरक्षक की उपाधि मिली।

भूतेश्वर महादेव को मथुरा के रक्षक के रूप में बहुत सम्मान दिया जाता है, और कई भक्त अपने दिन की शुरुआत और ब्रज यात्रा की शुरुआत सबसे पहले उनका आशीर्वाद लेकर करते हैं। 

किंवदंतियों के अनुसार, भगवान शिव भगवान कृष्ण की पवित्र भूमि के रक्षक के रूप में सेवा करने के लिए ब्रज आए थे। मंदिर में पाताल देवी की गुफा भी है, जो राजा कंस द्वारा पूजी जाने वाली देवी है, जो इसके ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व को और बढ़ाती है।

पांच पवित्र सोमवार (सोमवार) के दौरान, मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है जो अपनी पूजा-अर्चना करने आते हैं। भूतेश्वर महादेव मंदिर 52 शक्तिपीठों में से एक है, जो हिंदू पौराणिक कथाओं में इसके पवित्र महत्व को बढ़ाता है और इसे मथुरा आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए एक ज़रूरी गंतव्य बनाता है।

स्थान - भूतेश्वर, मथुरा, उत्तर प्रदेश 281001

भूतेश्वर महादेव मंदिर, मथुरा का इतिहास

भूतेश्वर भैरव

भूतेश्वर महादेव की कहानी वाल्मीकि रामायण और मंदिर की मौखिक परंपराओं दोनों में निहित है। किंवदंतियों के अनुसार, श्रावण के महीने में, भगवान शत्रुघ्न ने शक्तिशाली राक्षस लवणासुर नामक राक्षस का वध किया। को हराने के बाद मथुरापुरी शहर की स्थापना की थी। राक्षस के वध के बाद श्री राम के छोटे भाई शत्रुघ्न ने मथुरा शहर की स्थापना की। मथुरा में भूतेश्वर मंदिर उसी युग से स्थापित है।

भगवान शिव के एक रूप भूतेश्वर महादेव को मथुरा का संरक्षक देवता माना जाता है। जिस तरह भगवान राम ने लंका पर विजय प्राप्त करने के लिए युद्ध से पहले रामेश्वर की पूजा की थी, उसी तरह भगवान राम ने अपने भाई शत्रुघ्न को लवणासुर का सामना करने से पहले भूतेश्वर महादेव की पूजा करने का आदेश दिया था। भक्ति के इस कार्य के माध्यम से, शत्रुघ्न ने शक्तिशाली राक्षस को हराने, मथुरा को उसके अत्याचार से मुक्त करने और शहर में अपना शासन स्थापित करने की शक्ति प्राप्त की।

त्रेता युग में , जब देवी चंडी


ने मधु और कैटभ नामक राक्षसों का वध किया था। मधु के बेटे लवणासुर ने तपस्या की और भगवान शिव ने उसे एक त्रिशूल प्रदान किया, इस शर्त के साथ कि जब तक यह उसके महल में रहेगा, कोई भी उसे नहीं मार सकेगा। इस वरदान से सशक्त होकर लवणासुर निडर हो गया और उसने मथुरा में आतंक मचाना शुरू कर दिया, ऋषियों के अनुष्ठानों में बाधा डाली और उनमें से कई को मार डाला।

मदद की तलाश में, ऋषि अयोध्या गए, जहाँ भगवान राम शासन कर रहे थे। उन्होंने उनसे लवणासुर को हराने और मथुरा का राजा बनने के लिए शत्रुघ्न को भेजने के लिए कहा। भगवान राम ने शत्रुघ्न को इस मिशन पर भेजा, लेकिन युद्ध में लवणासुर को हराने के तीन असफल प्रयासों के बाद, शत्रुघ्न पराजित महसूस करते हुए अयोध्या लौट आए। भगवान राम ने उन्हें मथुरा वापस जाने और मार्गदर्शन और शक्ति के लिए भूतेश्वर महादेव की पूजा करने की सलाह दी, जैसे राम ने लंका में युद्ध करने से पहले रामेश्वर की पूजा की थी। शत्रुघ्न ने उनकी सलाह का पालन किया और भूतेश्वर महादेव ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर लवणासुर की कमजोरी को उजागर किया। इस ज्ञान के साथ, शत्रुघ्न लवणासुर को मारने और मथुरा में अपना राज्य स्थापित करने में सक्षम थे।

भूतेश्वर महादेव का महत्व भगवान कृष्ण के समय में द्वापर युग में भी वर्णित है। गोकुल में पाँच वर्ष बिताने और सात वर्ष तक अपनी दिव्य लीलाएँ करने के बाद, कृष्ण ने 11 वर्ष और 28 दिन की आयु में अत्याचारी कंस का वध किया। महाभारत के बाद, कृष्ण मथुरा लौट आए, जहाँ उनके माता-पिता ने उन्हें चार धाम की तीर्थ यात्रा करने के उनके वादे की याद दिलाई। हालाँकि, कृष्ण ने 33 करोड़ देवी-देवताओं के साथ-साथ सभी चार धामों के देवताओं को उनके पास जाने के बजाय ब्रज में रहने के लिए आमंत्रित करने का फैसला किया।

परिणामस्वरूप, जहाँ भी कृष्ण अपनी गायें चराते थे, वहाँ ये देवता निवास करने लगे, जिससे ब्रज को गोलोक भी कहा जाने लगा। हालाँकि, गंगा और काशी विश्वनाथ नहीं आए। गंगा ने संकोच किया क्योंकि यमुना को पार करने से उनका अपमान होगा, इसलिए भगवान कृष्ण ने मानसी गंगा के रूप में गंगा को प्रकट किया। इसी तरह, भगवान काशी विश्वनाथ ने घोषणा की कि वे पहले से ही मथुरा में भूतेश्वर महादेव के रूप में मौजूद हैं। कृष्ण ने भूतेश्वर महादेव को ब्रज के 84 कोस क्षेत्र का रक्षक नियुक्त किया।

यही कारण है कि भूतेश्वर महादेव को मथुरा का रक्षक कहा जाता है। भूतेश्वर महादेव मंदिर की एक अनूठी विशेषता यह है कि इसका संबंध 52 शक्तिपीठों से है, जहाँ माना जाता है कि भगवान शिव प्रत्येक स्थल की रक्षा करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि सती के बाल इसी स्थान पर गिरे थे, जिससे यह ग्यारहवाँ शक्तिपीठ बन गया। इस पवित्र स्थल की रक्षा के लिए भूतेश्वर महादेव भूतेश्वर भैरव के रूप में यहाँ निवास करते हैं।

भूतेश्वर महादेव मंदिर का समय

सुबह: 05:00 बजे – 01:00 बजे
शाम: 04:30 बजे – 10:30 बजे रात


केदारनाथ के उपलिंग के रूप में मथुरा में विराजमान हैं भगवान भूतेश्वर।

श्रीराम ने रामेश्वर, शस्त्रुघ्न ने की भूतेश्वर की आराधना।

भगवान भूतेश्वर मथुरा के कोतवाल हैं। लंका पर विजय प्राप्त करने के लिए जिस प्रकार भगवान राम ने रामेश्वर की स्थापना कर पूजा की और विजय प्राप्त की ठीक उसी प्रकार भगवान राम की आज्ञा से शस्त्रुघ्न ने भूतेश्वर महादेव की पूजा कर शक्तिशाली और आताताई दैत्य लवणासुर की हत्या कर मथुरा को दैत्यों से मुक्ति दिलाई और यहां अपना राज्य स्थापित किया। त्रेता युग में मधु और केटव नाम के दो राक्षस थे जिनका वध चंडी ने किया। मधु का पुत्र लवणासुर हुआ, लवणासुर ने तपस्या की और भगवान भूतेश्वर से अजय (त्रिशूल) वरदान मांगा भगवान शिव ने लवणासुर को वरदान दिया कि जब तक महल में त्रिशूल रहेगा कोई तुम्हारा वध नहीं कर सकेगा। वरदान मिलने के बाद लवणासुर मृत्यु के भय से मुक्त हो गया और मथुरा में आतंक मचा दिया। लवणासुर ने ऋषि मुनियों को यज्ञ करने नहीं दिए और उनकी हत्या करने लगा। इससे दुःखी होकर ऋषि मुनी अपनी रक्षा का भाव लेकर अयोध्या पहुंचे जहां भगववान राम का रामराज था। ऋषि मुनियों ने भगवान राम से विनती की, कि वह शस्त्रुघ्न को उनकी रक्षा के लिए मथुरा भेजें और उन्हें मथुरा का राजा घोषित करें। भगवान राम ने ऋषियों की रक्षा के लिए शस्त्रुघ्न को मथुरा जाने का आदेश दिया। शस्त्रुघ्न मथुरा पहुंचे लेकिन तीन युद्ध करने के बाद भी लवणासुर पर विजय प्राप्त नहीं कर सके। हताश शस्त्रुघ्न वापस अयोध्या आ गए और भगवान राम को तीन युद्धों के बाद भी विजय प्राप्त नहीं कर पाने की बात बताई। 

इस पर श्री राम ने उन्हें वापस मथुरा जाने और युद्ध से पहले ठीक उसी प्रकार भूतेश्वर महादेव की अर्चना करने की बात कही जिस प्रकार लंका पर चढ़ाई करने से पहले श्रीराम ने वानर सेना के साथ रामेश्वरम में रामेश्वर की पूजा की थी। शस्त्रुघ्न ने ठीक वैसा ही किया और लवणासुर को मार कर मथुरा पर राज्य स्थापित किया। 

द्वापर युग में भी भगवान भूतेश्वर की महिमा का वर्णन मिलता है। भगवान श्री कृष्ण पांच साल तक गोकुल में रहे, सात साल तक लीलाएं की और ग्यारह वर्ष 28 दिन की आयु में कंश का वध किया। इसके बाद द्वारिका चले गए। कुरुक्षेत्र के युद्ध की समाप्ति पर फिर मथुरा लौटे तो माता पिता ने उन्हें वचन याद दिलाया कि उन्होंने चारधाम की यात्रा का वचन दिया था जिसे पूरा करें। श्रीकृष्ण ने कहा कि में अकेला और आप चार हैं इसलिए चारों धामों और 33 कोटि देवी-देवताओं को ब्रज में ही आमंत्रित करते हैं। 

इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने जहां-जहां गाय चराई वहां देवता विराजमान हो गए। इसलिए गौलोक भी कहा जाता है। गंगाजी और काशी विश्वनाथ नहीं आए। इस पर गंगाजी ने कहा कि मथुरा पहुंचने के लिए यमुना जी को पार करना पड़ेगा जिससे बहन का मान मर्दन होगा। श्रीकृष्ण ने मानसी गंगा के रूप में गंगाजी को अवतरित किया। इसी प्रकार भगवान काशी विश्वनाथ ने मथुरा में भूतेश्वर महादेव के उपस्थिति होने की बात कह कर खुद के भगवान भूतेश्वर महादेव के रूप में ब्रज में उपस्थित होने की बात कही भगवान भोले नाथ ने कहा आप अपने क्षेत्र में भूतेश्वर को कोतवाल बनाएं और श्रीकृष्ण ने इनको ब्रज चौरासी कोस का मालिक बना दिया, इसलिए भूतेश्वर महादेव को मथुरा का कोतवाल भी कहा जाता है। 

इस मंदिर की विशेषता है कि 52 शक्तिपीठों की रक्षा करने के लिए भगवान हर जगह मौजूद है यहां सती जी के केश गिरे थे जो कि ग्यारहवां रूप कहा गया है। उस पिंड की रक्षा करने के लिए भूतेश्वर महादेव भूतेश्वर भैरव के नाम से मौजूद है।

मथुरा नगर की स्थापना 

मथुरा, भगवान कृष्ण की जन्मस्थली और भारत की प्राचीन नगरी है। हालांकि उत्खनन द्वारा प्राप्त इस नगर का साक्ष्य कुषाण कालीन है। पुराण कथा अनुसार शूरसेन देश की यहाँ राजधानी थी। पौराणिक साहित्य में मथुरा को अनेक नामों से संबोधित किया गया है जैसे- शूरसेन नगरी[5], मधुपुरी, मधुनगरी, मधुरा आदि। भारतवर्ष का वह भाग जो हिमालय और विंध्याचल के बीच में पड़ता है, जो प्राचीनकाल में आर्यावर्त कहलाता था। यह यमुना नदी के किनारे बसा हुआ है। यह आगरा से दिल्ली की ओर और दिल्ली से आगरा की ओर क्रमश: 58 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम एवं 145 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में यमुना के किनारे राष्ट्रीय राजमार्ग 2 पर स्थित है।

वाल्मीकि रामायण में मथुरा को मधुपुर या मधुदानव का नगर कहा गया है तथा यहाँ लवणासुर की राजधानी बताई गई है। इस नगरी को इस प्रसंग में मधुदैत्य द्वारा बसाई, बताया गया है। लवणासुर, जिसको शत्रुघ्न ने युद्ध में हराकर मारा था इसी मधुदानव का पुत्र था। इससे मधुपुरी या मथुरा का रामायण-काल में बसाया जाना सूचित होता है। रामायण में इस नगरी की समृद्धि का वर्णन है। इस नगरी को लवणासुर ने भी सजाया संवारा था। दानव, दैत्य, राक्षस आदि जैसे संबोधन विभिन्न काल में अनेक अर्थों में प्रयुक्त हुए हैं, कभी जाति या क़बीले के लिए, कभी आर्य अनार्य सन्दर्भ में तो कभी दुष्ट प्रकृति के व्यक्तियों के लिए। प्राचीनकाल से अब तक इस नगर का अस्तित्व अखण्डित रूप से चला आ रहा है।

मथुरा के चारों ओर चार शिव मंदिर हैं- पूर्व में पिपलेश्वर का, दक्षिण में रंगेश्वर का और उत्तर में गोकर्णेश्वर का और पश्चिम में भूतेश्वर महादेव का मन्दिर है। चारों दिशाओं में स्थित होने के कारण भगवान शिव को मथुरा का कोतवाल कहते हैं। मथुरा को आदि वाराह भूतेश्वर क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है। वाराह जी की गली में नीलवारह और श्वेतवाराह के सुंदर विशाल मंदिर हैं।

श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने श्री केशवदेवजी की मूर्ति स्थापित की थी पर औरंगजेब के काल में वह रजधाम में पधरा दी गई व औरंगजेब ने मंदिर को तोड़ डाला और उसके स्थान पर मस्जिद खड़ी कर दी। बाद में उस मस्जिद के पीछे नया केशवदेवजी का मंदिर बन गया है। प्राचीन केशव मंदिर के स्थान को केशवकटरा कहते हैं। खुदाई होने से यहाँ बहुत सी ऐतिहासिक वस्तुएँ प्राप्त हुई थीं।मुगलकाल में सौंख का किला जाट राजा हठी सिंह की वीरता के लिए प्रसिद्ध था।

पास ही एक कंकाली टीले पर कंकालीदेवी का मंदिर है। कंकाली टीले में भी अनेक वस्तुएँ प्राप्त हुई थीं। यह कंकाली वह बतलाई जाती है, जिसे देवकी की कन्या समझकर कंस ने मारना चाहा था पर वो उसके हाथ से छूटकर आकाश में चली गई थी। (देखें विद्याधर चक्रवर्ती) मस्जिद से थोड़ा सा पीछे पोतराकुण्ड के पास भगवान्‌ श्रीकृष्ण की जन्मभूमि है, जिसमें वसुदेव तथा देवकी की मूर्तियाँ हैं, इस स्थान को मल्लपुरा कहते हैं। इसी स्थान में कंस के चाणूर, मुष्टिक, कूटशल, तोशल आदि प्रसिद्ध मल्ल रहा करते थे। नवीन स्थानों में सबसे श्रेष्ठ स्थान श्री पारखजी का बनवाया हुआ श्री द्वारकाधीश का मंदिर है। इसमें प्रसाद आदि का समुचित प्रबंध है। संस्कृत पाठशाला, आयुर्वेदिक तथा होमियोपैथिक लोकोपकारी विभाग भी हैं।

इस मंदिर के अलावा गोविंदजी का मंदिर, किशोरीरमणजी का मंदिर, वसुदेव घाट पर गोवर्द्धननाथजी का मंदिर, उदयपुर वाली रानी का मदनमोहनजी का मंदिर, विहारीजी का मंदिर, रायगढ़वासी रायसेठ का बनवाया हुआ मदनमोहनजी का मंदिर, उन्नाव की रानी श्यामकुंवरी का बनाया राधेश्यामजी का मंदिर, असकुण्डा घाट पर हनुमान्‌जी, नृसिंहजी, वाराहजी, गणेशजी के मंदिर आदि हैं, जिनमें कई का आय-व्यय बहुत है, प्रबंध अत्युत्तम है, साथ में पाठशाला आदि संस्थाएँ भी चल रही हैं। विश्राम घाट या विश्रान्त घाट एक बड़ा सुंदर स्थान है, मथुरा में यही प्रधान तीर्थ है। विश्रांतिक तीर्थ (विश्राम घाट) असिकुंडा तीर्थ (असकुंडा घाट) वैकुंठ तीर्थ, कालिंजर तीर्थ और चक्रतीर्थ नामक पांच प्रसिद्ध मंदिरों का वर्णन किया गया है। इस ग्रंथ में कालवेशिक, सोमदेव, कंबल और संबल, इन जैन साधुओं को मथुरा का बतलाया गया है। जब यहाँ एक बार घोर अकाल पड़ा था तब मथुरा के एक जैन नागरिक खंडी ने अनिवार्य रूप से जैन आगमों के पाठन की प्रथा चलाई थी।


भगवान्‌ ने कंस वध के पश्चात्‌ यहीं विश्राम लिया था। नित्य प्रातः-सायं यहाँ यमुनाजी की आरती होती है, जिसकी शोभा दर्शनीय है। यहाँ किसी समय दतिया नरेश और काशी नरेश क्रमशः 81 मन और 3 मन सोने से तुले थे और फिर यह दोनों बार की तुलाओं का सोना व्रज में बांट दिया था। यहाँ मुरलीमनोहर, कृष्ण-बलदेव, अन्नपूर्णा, धर्मराज, गोवर्द्धननाथ आदि कई मंदिर हैं। यहाँ चैत्र शु. 6 (यमुना-जाम-दिवस), यमद्वितीया तथा कार्तिक शु. 10 (कंस वध के बाद) को मेला लगता है। विश्रान्त से पीछे श्रीरामानुज सम्प्रदाय का नारायणजी का मंदिर, इसके पीछे पुराना गतश्रम नारायणजी का मंदिर, इसके आगे कंसखार हैं। सब्जी मंडी में पं॰ क्षेत्रपाल शर्मा का बनवाया घंटाघर है। पालीवाल बोहरों के बनवाए राधा-कृष्ण, दाऊजी, विजयगोविंद, गोवर्द्धननाथ के मंदिर हैं। रामजीद्वारे में श्री रामजी का मंदिर है, वहीं अष्टभुजी श्री गोपालजी की मूर्ति है, जिसमें चौबीस अवतारों के दर्शन होते हैं। यहाँ रामनवमी को मेला होता है। यहाँ पर वज्रनाभ के स्थापित किए हुए ध्रुवजी के चरणचिह्न हैं। चौबच्चा में वीर भद्रेश्वर का मंदिर, लवणासुर को मारकर मथुरा की रक्षा करने वाले शत्रुघ्नजी का मंदिर, होली दरवाजे पर दाऊजी का मंदिर, डोरी बाजार में गोपीनाथजी का मंदिर है।


आगे चलकर दीर्घ विष्णुजी का मंदिर, बंगाली घाट पर श्री वल्लभ कुल के गोस्वामी परिवारों के बड़े-छोटे दो मदनमोहनजी के और एक गोकुलेश का मंदिर है। नगर के बाहर ध्रुवजी का मंदिर, गऊ घाट पर प्राचीन विष्णुस्वामी सम्प्रदाय का श्री राधाविहारीजी का मंदिर, वैरागपुरा में प्राचीन विष्णुस्वामी सम्प्रदाय के विरक्तों का मंदिर है। वैरागपुरा में गोहिल छिपि जाति के चाउधरि श्रि गोर्धनदास नागर पुत्र श्रि हरकरन दास नागर ने सकल पन्च मथुरा को सम्वत १९८१ (सन १९२४) में मन्दिर बनाने के हेतु अपनै भुमि दान में दै। और उस भुमि के ऊपर दाउजि माहारज और रेवति देवि कि मुर्ति पधार क्र्र मन्दिर दान कर दिया। इससे आगे मथुरा के पश्चिम में एक ऊंचे टील पर महाविद्या का मंदिर है, उसके नीचे एक सुंदर कुण्ड तथा पशुपति महादेव का मंदिर है, जिसके नीचे सरस्वती नाला है। किसी समय यहाँ सरस्वतीजी बहती थीं और गोकर्णेश्वर-महादेव के पास आकर यमुनाजी में मिलती थीं।


एक प्रसंग में यह वर्णन है कि एक सर्प नंदबाबा को रात्रि में निगलने लगा, तब श्रीकृष्ण ने सर्प को लात मारी, जिस पर सर्प शरीर छोड़कर सुदर्शन विद्याधर हो गया। किन्हीं-किन्हीं टीकाकारों का मत है कि यह लीला इन्हीं महाविद्या की है और किन्हीं-किन्हीं का मत है कि अम्बिकावन दक्षिण में है। इससे आगे सरस्वती कुण्ड और सरस्वती का मंदिर और उससे आगे चामुण्डा का मंदिर है। चामुण्डा से मथुरा की ओर लौटते हुए बीच में अम्बरीष टीला पड़ता है, यहाँ राजा अम्बरीष ने तप किया था। अब उस स्थान पर नीचे जाहरपीर का मठ है और टीले के ऊपर हनुमान्‌जी का मंदिर है। ये सब मथुरा के प्रमुख स्थान हैं। इनके सिवाय और बहुत छोटे-छोटे स्थान हैं। मथुरा के पास नृसिंहगढ़ एक स्थान है, जहाँ नरहरि नाम के एक पहुंचे हुए महात्मा हो गए हैं। कहा जाता है इन्होंने 400 वर्ष के होकर अपना शरीर त्याग किया था।

मथुरा की परिक्रमा

प्रत्येक एकादशी और अक्षय नवमी को मथुरा की परिक्रमा होती है। देवशयनी और देवोत्थापनी एकादशी को मथुरा-गरुड गोविन्द्-वृन्दावन् की एक साथ परिक्रमा की जाती है। यह परिक्र्मा २१ कोसी या तीन वन की भी कही जाती है। वैशाख शुक्ल पूर्णिमा को रात्रि में परिक्रमा की जाती है, जिसे वनविहार की परिक्रमा कहते हैं। स्थान-स्थान में गाने-बजाने का तथा पदाकन्दा नाटक का भी प्रबंध रहता है। श्री दाऊजी ने द्वारका से आकर, वसन्त ऋतु के दो मास व्रज में बिताकर जो वनविहार किया था तथा उस समय यमुनाजी को खींचा था, यह परिक्रमा उसी की स्मृति है।

सात महापुरियों में से एक है मथुरा नगरी 

भारतवर्ष के सांस्कृतिक और आधात्मिक गौरव की आधारशिलाऐं इसकी सात महापुरियां हैं। 'गरुडपुराण' में इनके नाम इस क्रम से वर्णित हैं - इनमें मथुरा का स्थान अयोध्या के पश्चात अन्य पुरियों के पहिले रखा गया है। पदम पुराण में मथुरा का महत्व सर्वोपरि मानते हुए कहा गया है कि यद्यपि काशी आदि सभी पुरियाँ मोक्ष दायिनी है तथापि मथुरापुरी धन्य है। यह पुरी देवताओं के लिये भी दुर्लभ है। २ इसी का समर्थन 'गर्गसंहिता' में करते हुए बतलाया गया है कि पुरियों की रानी कृष्णापुरी मथुरा बृजेश्वरी है, तीर्थेश्वरी है, यज्ञ तपोनिधियों की ईश्वरी है यह मोक्ष प्रदायिनी धर्मपुरी मथुरा नमस्कार योग्य है।

ब्रज का प्राचीन संगीत

ब्रज के प्राचीन संगीतज्ञों की प्रामाणिक जानकारी 16वीं शताब्दी के भक्तिकाल से मिलती है। इस काल में अनेकों संगीतज्ञ वैष्णव संत हुए। संगीत शिरोमणि स्वामी हरिदास जी, इनके गुरु आशुधीर जी तथा उनके शिष्य तानसेन आदि का नाम सर्वविदित है। बैजूबावरा के गुरु भी श्री हरिदास जी कहे जाते हैं, किन्तु बैजू बावरा ने अष्टछाप के कवि संगीतज्ञ गोविन्द स्वामी जी से ही संगीत का अभ्यास किया था। निम्बार्क सम्प्रदाय के श्रीभट्ट जी इसी काल में भक्त, कवि और संगीतज्ञ हुए। अष्टछाप के महासंगीतज्ञ कवि सूरदास, नन्ददास, परमानन्ददास जी आदि भी इसी काल में प्रसिद्ध कीर्तनकार, कवि और गायक हुए, जिनके कीर्तन बल्लभकुल के मन्दिरों में गाये जाते हैं। स्वामी हरिदास जी ने ही वस्तुत: ब्रज–संगीत के ध्रुपद–धमार की गायकी और रास–नृत्य की परम्परा चलाई।


संगीत

मथुरा में संगीत का प्रचलन बहुत पुराना है, बांसुरी ब्रज का प्रमुख वाद्य यंत्र है। भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी को जन–जन जानता है और इसी को लेकर उन्हें 'मुरलीधर' और 'वंशीधर' आदि नामों से पुकारा जाता है। वर्तमान में भी ब्रज के लोक संगीत में ढोल मृदंग, झांझ, मंजीरा, ढप, नगाड़ा, पखावज, एकतारा आदि वाद्य यंत्रों का प्रचलन है। 16 वीं शती से मथुरा में रास के वर्तमान रूप का प्रारम्भ हुआ। यहाँ सबसे पहले बल्लभाचार्य जी ने स्वामी हरदेव के सहयोग से विश्रांत घाट पर रास किया। रास ब्रज की अनोखी देन है, जिसमें संगीत के गीत गद्य तथा नृत्य का समिश्रण है। ब्रज के साहित्य के सांस्कृतिक एवं कलात्मक जीवन को रास बड़ी सुन्दरता से अभिव्यक्त करता है। अष्टछाप के कवियों के समय ब्रज में संगीत की मधुरधारा प्रवाहित हुई। सूरदास, नन्ददास, कृष्णदास आदि स्वयं गायक थे। इन कवियों ने अपनी रचनाओं में विविध प्रकार के गीतों का अपार भण्डार भर दिया। स्वामी हरिदास संगीत शास्त्र के प्रकाण्ड आचार्य एवं गायक थे। तानसेन जैसे प्रसिद्ध संगीतज्ञ भी उनके शिष्य थे। सम्राट अकबर भी स्वामी जी के मधुर संगीत- गीतों को सुनने का लोभ संवरण न कर सका और इसके लिए भेष बदलकर उन्हें सुनने वृन्दावन आया करता था। मथुरा, वृन्दावन, गोकुल, गोवर्धन लम्बे समय तक संगीत के केन्द्र बने रहे और यहाँ दूर से संगीत कला सीखने आते रहे।

लोक गीत

ब्रज में अनेकानेक गायन शैलियां प्रचलित हैं और रसिया ब्रज की प्राचीनतम गायकी कला है। भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से सम्बन्धित पद, रसिया आदि गायकी के साथ रासलीला का आयोजन होता है। श्रावण मास में महिलाओं द्वारा झूला झूलते समय गायी जाने वाली मल्हार गायकी का प्रादुर्भाव ब्रज से ही है। लोकसंगीत में रसिया, ढोला, आल्हा, लावणी, चौबोला, बहल–तबील, भगत आदि संगीत भी समय –समय पर सुनने को मिलता है। इसके अतिरिक्त ऋतु गीत, घरेलू गीत, सांस्कृतिक गीत समय–समय पर विभिन्न वर्गों में गाये जाते हैं।

कला

यहाँ स्थापत्य तथा मूर्ति कला के विकास का सबसे महत्त्वपूर्ण युग कुषाण काल के प्रारम्भ से गुप्त काल के अन्त तक रहा। यद्यपि इसके बाद भी ये कलायें 12वीं शती के अन्त तक जारी रहीं। इसके बाद लगभग 350 वर्षों तक मथुरा कला का प्रवाह अवरूद्ध रहा, पर 16वीं शती से कला का पुनरूत्थान साहित्य, संगीत तथा चित्रकला के रूप में दिखाई पड़ने लगता है।

ब्रज के वन

ब्रज में बारह वन ब्रज के वन हैं जो कि द्वादश वन के नाम से प्रसिद्ध हैं।

ब्रज के सुप्रसिद्ध १२ बनों के नाम

(१) मधुबन, (२) तालबन, (३) कुमुदबन, (४) बहुलाबन, (५) कामबन, (६) खिदिरबन, (७) वृन्दाबन, (८) भद्रबन, (९) भांडीरबन, (१०) बेलबन, (११) लोहबन और (१२) महाबन हैं।

इनमें से आरंभ के ७ बन यमुना नदी के पश्चिम में हैं और अन्त के ५ बन उसके पूर्व में हैं। इनका संक्षिप्त वृतांत इस प्रकार है -

मधुबन 

यह ब्रज का सर्वाधिक प्राचीन वनखंड है। इसका नामोल्लेख प्रगैतिहासिक काल से ही मिलता है। राजकुमार ध्रुव इसी बन में तपस्या की थी। सत्रत्रुध्न ने यहां के अत्याचारी राजा लवणासुर को मारकर इसी बन के एक भाग में मथुरा पुरी की स्थापना की थी। वर्तमान काल में उक्त विशाल बन के स्थान पर एक छोटी सी कदमखंडी शेष रह गई है और प्राचीन मथुरा के स्थान पर महोली नामक ब्रज ग्राम बसा हुआ है, जो कि मथुरा तहसील में पड़ता है।

ताल बन

प्राचीन काल में यह ताल के बृक्षों का यह एक बड़ा बन था और इसमें जंगली गधों का बड़ा उपद्रव रहता था। भागवत में वर्णित है, बलराम ने उन गधों का संहार कर उनके उत्पात को शांत किया था। कालान्तर में उक्त बन उजड़ गया और शताब्दियों के पश्चात् वहां तारसी नामक एक गाँव बस गया, जो इस समय मथुरा तहसील के अंतर्गत है।

कुमुद बन

प्राचीन काल में इस बन में कुमुद पुष्पों की बहुलता थी, जिसके कारण इस बन का नाम 'कुमुद बन' पड़ गया था। वर्तमान काल में इसके समीप एक पुरानी कदमखड़ी है, जो इस बन की प्राचीन पुष्प-समृद्धि का स्मरण दिलाती है।

बहुलाबन

इस बन का नामकरण यहाँ की एक बहुला गाय के नाम पर हुआ है। इस गाय की कथा 'पदम पुराण' में मिलती है। वर्तमान काल में इस स्थान पर झाड़ियों से घिरी हुई एक कदम खंड़ी है, जो यहां के प्राचीन बन-वैभव की सूचक है। इस बन का अधिकांश भाग कट चुका है और आजकल यहां बाटी नामक ग्राम बसा हुआ है।

कामबन

यह ब्रज का अत्यन्त प्राचीन और रमणीक बन था, जो पुरातन वृन्दाबन का एक भाग था। कालांतर में वहां बस्ती बस गई थी। इस समय यह राजस्थान के भरतपुर जिला की ड़ीग तहसील का एक बड़ा कस्बा है। इसके पथरीले भाग में दो 'चरण पहाड़िया' हैं, जो धार्मिक स्थली मानी जाती हैं।

खिदिरबन

यह प्राचीन बन भी अब समाप्त हो चुका है और इसके स्थान पर अब खाचरा नामक ग्राम बसा हुआ है। यहां पर एक पक्का कुंड और एक मंदिर है।

वृन्दाबन

प्राचीन काल में यह एक विस्तृत बन था, जो अपने प्रकृतिक सौंदर्य और रमणीक बनश्री के लिये विख्यात था। जब मथुरा के अत्याचारी राजा कंस के आतंक से नंद आदि गोपों को वृद्धबन (महाबन) स्थित गोप-बस्ती (गोकुल) में रहना असंभव हो गया, तब वे सामुहिक रूप से वहां से हटकर अपने गो-समूह के साथ वृन्दाबन में जा कर रहे थे। भागवत् आदि पुराणों से और उनके आधार पर सूरदास आदि ब्रज-भाषा कावियों की रचनाओं से ज्ञात होता है कि उस वृन्दाबन में गोबर्धन पहाड़ी थी और उसके निकट ही यमुना प्रवाहित होती थी। यमुना के तटवर्ती सघन कुंजों और विस्तृत चारागाहों में तथा हरी-भरी गोबर्धन पहाड़ी पर वे अपनी गायें चराया करते थे।

वह वृन्दाबन पंचयोज अर्थात बीस कोस परधि का तथा ॠषि मुनियों के आश्रमों से युक्त और सघन सुविशाल बन था। ३ वहाँ गोप समाज के सुरक्षित रूप से निवास करने की तथा उनकी गायों के लिये चारे घास की पर्याप्त सुविधा थी। ४ उस बन में गोपों ने दूर-दूर तक अने बस्तियाँ बसाई थीं। उस काल का वृन्दाबन गोबर्धन-राधाकुंड से लेकर नंदगाँव-वरसाना और कामबन तक विस्तृत था।

संस्कृत साहित्य में प्राचीन वृंदाबन के पर्याप्त उल्लेख मिलते हैं, जिसमें उसके धार्मिक महत्व के साथ ही साथ उसकी प्राकृतिक शोभा का भी वर्णन किया गया है। महाकवि कालिदास ने उसके वन-वैभव और वहाँ के सुन्दर फूलों से लदे लता-वृक्षों की प्रशंसा की है। उन्होंने वृन्दाबन को कुबेर के चैत्ररथ नामक दिव्य उद्यान के सदृश वतलाया है। ५

वृन्दाबन का महत्व सदा से श्रीकृष्ण के प्रमुख लीला स्थल तथा ब्रज के रमणीक बन और एकान्त तपोभूमि होने के कारण रहा है। मुसलमानी शासन के समय प्राचीन काल का वह सुरम्य वृन्दाबन उपेक्षित और अरक्षित होकर एक बीहड़ बन हो गया था। पुराणों में वर्णित श्रीकृष्ण-लीला के विविध स्थल उस विशाल बन में कहाँ थे, इसका ज्ञान बहुत कम था। जव वैष्णव सम्प्रदायों द्वारा राधा-कृष्णोपासना का प्रचार हुआ, तब उनके अनुयायी भक्तों का ध्यान वृन्दाबन और उसके लीला स्थलों की महत्व-वृद्धि की ओर गया था। वे लोग भारत के विविध भागों से वहाँ आने लगे और शनै: शनै: वहाँ स्थाई रूप से बसने लगे।

इस प्रकार वृन्दाबन का वह बीहड़ वन्य प्रदेश एक नागरिक बस्ती के रूप में परणित होने लगा। वहाँ अनेक मन्दिर-देवालय वनाये जाने लगे। बन को साफ कर वहाँ गली-मुहल्लों और भवनों का निर्माण प्रारम्भ हुआ तथा हजारों व्यक्ति वहाँ निवास करने लगे। इससे वृन्दाबन का धार्मिक महत्व तो बढ़ गया, किन्तु उसका प्राचीन वन-वैभव लुप्त प्रायः हो गया।

उपर्युक्त सातों बन यमुना नदी की दाहिनी ओर अर्थात पश्चिम दिशा में हैं। निम्न पाँच बन यमुना की बायी ओर अर्थात पूर्व दिशा में स्थित हैं

८. भद्रबन, ९. भांडीरबन, १०. बेलबन - ये तीनों बन यमुना की बांयी ओर ब्रज की उत्तरी सीमा से लेकर वर्तमान वृन्दाबन के सामने तक थे। वर्तमान काल में उनका अधिकांश भाग कट गया है और वहाँ पर छोटे-बड़े गाँव बस गये हैं। उन गाँवों में टप्पल, खैर, बाजना, नौहझील, सुरीर, भाँट पानी गाँव उल्लेखनीय हैं।

लोहबन

यह प्राचीन बन वर्तमान मथुरा नगर के सामने यमुना के उस पार था। वर्तमान काल में वहाँ इसी नाम का एक गाँव बसा है।

महाबन

प्राचीन काल में यह एक विशाल सघन बन था, जो वर्तमान मथुरा के सामने यमुना के उस पार वाले दुर्वासा आश्रम से लेकर सुदूर दक्षिण तक विस्तृत था। पुराणों में इसका उल्लेख बृहद्बन, महाबन, नंदकानन, गोकुल, गौब्रज आदि नामों से हुआ है। उस बन में नंद आदि गोपों का निवास था, जो अपने परिवार के साथ अपनी गायों को चराते हुए विचरण किया करते थे। उसी बन की एक गोप बस्ती (गोकुल) में कंस के भय से बालक कृष्ण को छिपाया गया था। श्रीकृष्ण के शैशव-काल की पुराण प्रसिद्ध घटनाएँ - पूतना बध, तृणवर्त बध, शंकट भंजन, चमलार्जुन पतन आदि इसी बन के किसी भाग में हुई थीं। वर्तमान काल में इस बन का अधिकांश भाग कट गया है और वहाँ छोटे-बड़े कई गाँव वस गये हैं। उन गावों में बलदेव, महाबन, गोकुल और रावल के नाम से उल्लेखनीय है

ब्रज के २४ उपबन

ब्रज के पुराण प्रसिद्ध २४ उपबनों के नाम कवि जगतनंद ने इस प्रकार लिखे हैं -

(१) अराट (अरिष्टबन), (२) सतोहा (शांतनुकुंड), (३) गोबर्धन, (४) बरसाना, (५) परमदरा, (६) नंदगाँव, (७) संकेत, (८) मानसरोवर, (९) शेषशायी, (१०) बेलबन, (११) गोकुल, (१२) गोपालपुर, (१३) परासोली, (१४) आन्यौर, (१५) आदिबदरी, (१६) विलासगढ़, (१७) पिसायौ, (१८) अंजनखोर, (१९) करहला, (२०) कोकिला बन, (२१) दघिबन (दहगाँव), (२२) रावल, (२३) बच्छबन और (२४) कौरबबन। ६

ब्रज के अन्य बन

उक्त १२ बन और २४ उप-बनों के अतिरिक्त श्री नारायणभटट जी ने बाराह पुराण के आधार पर १२ प्रतिबन और १२ तपोबन तथा विष्णु पुराण के आधार पर १२ अधिबन के नाम उल्लिखित है। ७ इनके अतिरिक्त आदि पुराण में १२ मोक्ष बन, भविष्य पुराण में १२ काम बन, स्कंद पुराण में १२ अर्थ बन, स्मृति सार में १२ धर्म बन और विष्णु पुराण में १२ सिद्ध बन के नाम लिखे हैं। ८ श्री नारायण भटट जी ने उन समस्त बनों के अधिपतिदेवताओं का नामोल्लेख करते हुए उनके ध्यान मत्र भी उल्लखित हैं। भटट जी के मतानुसार इन समस्त बनों में से ९२ यमुना नदी के दाहिने ओर तथा ४२ बांयी ओर हैं। ९

वनों के अवशेष

यद्यपि प्राचीन बनों में से अधिकांश कट गये हैं और उनके स्थान पर बस्तियाँ बस गईहैं, तथापि उनके अवशेषों के रूप में कुछ बनखंड और कदम खंडियाँ विधमान हैं, जो ब्रज के प्राचीन बनों की स्मृति को बनाये हुए हैं।

वर्तमान वृन्दाबन में निधिबन और सेवाकुंज दो ऐसेस्थल हैं, जिन्हें प्राचीन वृन्दाबन के अवशेष कहा जा सकता है। ये संरक्षित बनखंडों के रूप में वर्तमान वृन्दाबन नगर के प्रायः मध्य में स्थित हैं। इनमें सघन लता-कुंज विधमान हैं, जिनमें बंदर-मोर तथा अन्य पशु-पक्षियों का स्थाई निवास है। इन स्थलों में प्रवेश करते ही प्राचीन वृन्दाबन की झाँकी मिलती है, किन्तु वह अधिक मनोरम नहीं है। कहने को यह संरक्षित धार्मिक स्थल हैं, किन्तु वास्तव में इनके संरक्षण और सम्वर्धन की ओर बहुत कम ध्यान दिया गय है। यदि इनकी उचित रूप में देखभाल की जाय, तो ये दर्शकों को मुग्ध करने वाले अत्यन्त रमणीक बनखंड बन सकते हैं।

निधिबन

यह स्वामी हरिदास जी पावन स्थल है स्वामी जी ने वृन्दाबन आने पर यहाँ जीवन पर्यन्त निवास किया और इस स्थान पर उनका देहावसान भी हुआ था। मुगल सम्राट अकबर ने तानसेन के साथ इसी स्थान पर स्वामी जी के दर्शन किये थे और उनके दिव्य संगीत का रसास्वादन किया था। स्वामी जी के उपरान्त उनकी शिष्य-परम्परा के आचार्य ललित किशोरी जी तक इसी स्थल में निवास करते थे। इस प्रकार यह हरिदासी संम्प्रदाय का प्रधान स्थान बन गया। यहाँ पर श्री विहारी जी का प्राकट्य स्थल, रंगमहल और स्वामी जी सहित अनेक आचार्यों की समाधियाँ हैं।

सेवा कुंज 

यह श्री हित हरिवंश जी का पुण्य स्थल है हित जी ने वृन्दाबन आने पर अपने उपास्य श्री राधाबल्लभ जी का प्रथम पाटोत्सव इसी स्थान पर स. १५९१ में किया था। बाद में मन्दिर बन जाने पर उन्हें वहाँ विराजमान किया गया था। इस समय इसके बीचों-बीच श्री जी का छोटा सा संगमर का मन्दिर है, जिसमें नाम सेवा होती है। इसके निकट ललिता कुंड है। भक्तों का विश्वास है, कि इस स्थान पर अब भी पर अब भी श्री राधा-कृष्ण का राम विलास होता है, अत रात्रि को यहाँ कोई नहीं रहता है। कांघला निवासी पुहकरदास वैश्य ने स. १६६० में यहाँ श्री जी के शैया-मंदिर का निर्माण कराया था और अयोध्या नरेश प्रतापनारायण सिंह की छोटी रानी ने स. १९६२ में इसके चारों ओर पक्की दीवाल निर्मित कराई।

कदंबखंडी 

ब्रज में संरक्षित बनखंडो के रूप में कुछ कदंबखंडियाँ थी, जहाँ बहुत बड़ी संख्या में कदंब के वृक्ष लगाये गये थे। उन रमणीक और सुरभित उपबनों के कतिपय महात्माओं का निवास था। कवि जगतनंद ने अपने काल की चार कदंवखंडियों का विवरण प्रस्तुत किया है। वे सुनहरा गाँव की कदंबखंडी, गिरिराज के पास जती पुरा में गोविन्द स्वामी की कदंबखंडी, जलविहार (मानसरोवर) की कदंबखंडी और नंदगाँव (उद्धवक्यार) की कदंबखंडी थी। १ इनके अतिरिक्त जो और हैं, उनके नाम कुमुदबन, वहुलाबन, पेंठा, श्याम ढाक (गोबर्धन) पिसाया, दोमिलबन कोटबन और करलहा नामक बनखंडियाँ हैं। वर्तमान काल में इनकी स्थित सोचनीय है।

अन्य रमणीक स्थल

पिसायौ -

इस रमणीक स्थल को 'ब्रजभक्ति विलास' में 'पिपासा बन' कहा गया है। इसके प्राकृतिक सौंदर्य की प्रशंसा करते हुए ग्राउज ने लिखा है - यह मथुरा जिले का सबसे सुन्दर स्थल है, जो काफी विस्तृत भी है। इसमें प्राकृतिक चौकों की कई पंक्तियाँ हैं, जिनके चारों और कदंब के वृक्षों की कतारें हैं। इनके साथ कहीं-कहीं पर छोटे वृक्ष पापड़ी, पसेंदू, ढ़ाक और सहोड़ के भी है। ये चौक ऐसे नियमित रूप में वन गये हैं, कि इन्हें प्राकृतिक कहना कठिन है। इन्हें बावन चौक कहा जाता है किन्तु वास्तव में इनकी संख्या कम है। इनमें बन्दर बहुत बड़ी संख्या में रहते हैं। इसके पूर्व की ओर जो जंगल है, उसमें पीलू, रेंमजा और करील की झाड़ियाँ हैं। पश्चिम की ओर कुछ दूरी पर बरसाने का मन्दिर दिखलाई पड़ता है। यहाँ पर अरनी के पौधे भी हैं, जिनके फूलों की सुगंध से समस्त बन का वातावरण महकता रहता है। पिसायौ गाँ के निकट किशोरी कुंड है और दो मन्दिर हैं। १

बंध बारोठा -

राजस्थान के भरतपुर जिला का यह बड़ा रमणीक स्थल है। भरतपुर नगर से यह २३ मील दूर है और वहाँ तक सड़क मार्ग उपलब्ध है। इस स्थल पर छोटी पहाड़ियों के मध्य में एक बंध बनाया है, जिसके पानी से वहाँ एक रमणीक झील निर्मित हो गयी है। इसमें कई स्थानों पर चटटानों जैसी सीड़ियों पर से पानी गिरता है, जिससे झरनों का सा द्रष्य दिखाई देता है पानी की धाराएँ कलख करती हुई और झाग उठाती हुई बड़ी सुहावनी जान पड़ती हैं। झील में भाँति-भाँति की मछलियाँ है, जंगल में अनेक प्रकार के शिकार है और समीप के दल-दल में मुरगाबियाँ है। इन सब के कारण यह सैलानियों और भ्रमणार्थियों का स्वर्ग सा बन गया है। इसके ऊपर पहाड़ी की चोटी पर भरतपुर के राजमहल हैं और नीचे राजा का नावघर है, जहाँ सैर के लिये मोटर नावें रखी जाती हैं।


मथुरा के दर्शनीय स्थल 

मथुरा संग्रहालय, कृष्ण जन्म भूमि, द्वारकाधीश मंदिर, 

दर्शनीय स्थल (मथुरा से वृन्दावन की ओर)

बाँकेबिहारी मंदिर, श्री गरुड् गोविन्द मन्दिर, शाडान्ग वन (छटीकरा), शांतिकुंज, बिडला मंदिर, राधावल्लभ मंदिर राधावल्लभ मंदिर

दर्शनीय स्थल (मथुरा से गोकुल की ओर)

ठकुरानी घाट, नवनीतप्रिया जी का मंदिर, रमण रेती, ८४ खम्बे, बल्देव, बह्मांड घाट महावन, चिंताहरण महादेव महावन

दर्शनीय स्थल (मथुरा से गोवर्धन की ओर)

गोवर्धन, जतीपुरा, बरसाना, नंदगाँव, कामवन, लोहवन, कोकिलावन


भूतेश्वर महादेव मंदिर तस्वीरें

भूतेश्वर महादेव के अंदर
भूतेश्वर महादेव का बाहरी द्वार
भूतेश्वर महादेव मूर्ति
मंदिर में नंदी जी

मथुरा में भूतेश्वर महादेव मंदिर शहर का सबसे पुराना मंदिर है। यह मंदिर भूतेश्वर चौराहे पर स्थित है जो मथुरा के रेलवे स्टेशन से लगभग 3 किमी दूर है। यह पवित्र और दिव्य मंदिर भगवान शिव को शिवलिंग के रूप में पूजता है और इसे भूतेश्वर इसलिए कहा जाता है क्योंकि माना जाता है कि यहाँ के देवता ब्रजवासियों को राक्षसों से बचाते हैं।   मथुरा में भूतेश्वर महादेव को मथुरा का रक्षक भगवान भी कहा जाता है।

बुराई से बचाव:

मथुरा में लोगों की मान्यताओं के अनुसार , भूतेश्वर महादेव शहर को बुराई से बचाते हैं। शहर में यह आम धारणा है कि भूतेश्वर का पवित्र मंदिर शहर और उसके निवासियों को बुरी शक्तियों से बचाने के लिए स्थापित किया गया था, इसलिए इसका नाम भूतेश्वर पड़ा। यह मंदिर शहर का सबसे प्राचीन मंदिर है और कहा जाता है कि इसे शहर की स्थापना के अवसर पर ही स्थापित किया गया था। किंवदंतियों के अनुसार, मथुरा की स्थापना तब हुई जब शत्रुघ्न ने मधु नामक राक्षस का वध किया। राक्षस के वध के बाद श्री राम के छोटे भाई शत्रुघ्न ने मथुरा शहर की स्थापना की। मथुरा में भूतेश्वर मंदिर उसी युग से स्थापित है।

तीर्थयात्रियों के लिए दैवीय सुरक्षा:

भगवान शिव के शिवलिंग के दर्शन के लिए दुनिया भर से तीर्थयात्री इस दिव्य मंदिर में आते हैं। भगवान शिव को ब्रह्मांड का रक्षक माना जाता है और जब मथुरा जैसे पवित्र शहर की सुरक्षा की बात आती है तो सर्वशक्तिमान में आस्था चरम पर होती है। मथुरा में भूतेश्वर महादेव मंदिर शहर का रक्षक है और श्रावण मास के दौरान सबसे अधिक दर्शनीय स्थल है, जो जुलाई-अगस्त में पड़ने वाला हिंदू महीना है। शहर में शिव की पूजा का मुख्य केंद्र होने के कारण यह मंदिर न केवल दुनिया भर से तीर्थयात्रियों बल्कि स्थानीय निवासियों के भक्तों द्वारा भी देखा जाता है। सुरक्षा का जादुई मंत्र शहर में आने वाले हर व्यक्ति का ध्यान आकर्षित करता है।

भूतेश्वर मंदिर मथुरा:

दर्शन समय:-

  • सुबह 05:00 बजे से दोपहर 01:00 बजे तक
  • शाम 04:30 बजे से 10:30 बजे तक

बृजवाले का लाभ:

बृजवाले एक बेहतरीन सूचना गाइड है जो मथुरा के विभिन्न मंदिरों के बारे में हर संभव जानकारी प्रदान करता है। हमारा उद्देश्य आपको मथुरा के हर मंदिर के दर्शन कराना है, इसलिए हम आपको ब्रज क्षेत्र के मंदिरों के विशेष त्योहारों और अवसरों के बारे में अपडेट रखने का प्रयास करते हैं। हमारे साथ जानकारी के अपने अंतिम स्रोत के रूप में, आप मथुरा की अपनी यात्राओं में यादगार यादें जोड़ने के लिए बाध्य हैं।


श्रीकृष्ण की लीला स्थली में हर-हर महादेव की गूंज
सावन में भगवान श्रीकृष्ण की लीला स्थली मथुरा भी भोलनाथ के जयकारों से गूंज रही है.जिले के सभी मंदिरों में शिव भक्त भगवान शिव और माता पार्वती को बेल पत्र और दूध से स्नान करा रहे हैं. पौराणिक मान्यता है कि भगवान शिव का यह विग्रह स्वयं प्राकट्य है. मधु ने तपस्या कर इनको प्रकट किया था. दैत्यों कासंहार करने की वजह से इनका नाम भूतेश्वर महादेव पड़ा. द्वापर में भगवान कृष्ण की पूजा करने और भगवान शिव द्वारा ब्रज वासियों की रक्षा के लिए यहां विराजमान होने के कारण भोलनाथ का नाम शहर कोतवाल पड़ गया. शास्त्रों में भगवान भूतेश्वर का उल्लेख केदारनाथ की उपलिंग के रूप में मिलता है.इसलिए जो भी भगवान भूतेश्वर महादेव के दर्शन करता है. उसे केदारनाथ के दर्शनों का फल मिलता है।


Thursday, April 3, 2025

भगवती यमुना जी का आविर्भाव

भगवती यमुना जी का आविर्भाव दिवस (चैत्र षष्ठी 'श्री यमुना जयंती') 
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सनातन धर्म में भगवान श्रीकृष्ण को सर्वेश्वर माना गया है। हिंदू धर्मग्रंथों में उनकी जिन आठ पटरानियों का उल्लेख है, भगवती यमुना भी उनमें से एक हैं।
पुराणों के अनुसार यमुना जी भगवान सूर्य की पुत्री होने के साथ यमराज एवं शनिदेव की बहन भी हैं।
द्वापर युग में भगवती यमुना का आविर्भाव चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दिन हुआ था, अत: यह पावन तिथि यमुना जयंती के नाम से प्रसिद्ध हो गई। 
ब्रज मंडल में प्रतिवर्ष यह महोत्सव बडे धूमधाम से मनाया जाता है। 
मार्कण्डेय पुराण के मतानुसार गंगा-यमुना सगी बहनें हैं, जिस तरह गंगा का उद्गम गंगोत्री के समीप स्थित गोमुख से हुआ है, उसी तरह यमुना जी जब भूलोक में पधारीं, तब उनका उद्गम यमुनोत्री के समीप कालिंदगिरि से हुआ।
द्वापर युग में श्रीकृष्ण लीला के समय सर्वेश्वर श्रीकृष्ण एवं यमुना जी के पुनर्मिलन का वृत्तांत कुछ इस प्रकार है:-
एक बार श्रीकृष्ण अर्जुन को साथ लेकर घूमने गए, यमुनातट पर एक वृक्ष के नीचे दोनों विश्राम कर रहे थे।
श्रीकृष्ण को ध्यान मग्न देखकर अर्जुन टहलते हुए यमुना के किनारे कुछ दूर निकल गए। 
वहां उन्होंने देखा कि यमुना नदी के भीतर स्वर्ण एवं रत्नों से सुसज्जित भवन में एक अतीव सुंदर स्त्री तप कर रही है। 
अर्जुन ने जब उससे परिचय पूछा तो उसने कहा:- "मैं सूर्यदेव की पुत्री कालिंदी हूं, भगवान श्रीकृष्ण के लिए मेरे मन में अपार श्रद्धा है और मैं उन्हीं को पाने के लिए तप कर रही हूं। 
मुझे पूर्ण विश्वास है कि मेरी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी।"
अर्जुन ने वापस लौटकर यह वृत्तांत श्रीकृष्ण को सुनाया तो श्यामसुंदर ने कालिंदी के पास जाकर उन्हें दर्शन दिया और उनके अनुरोध को स्वीकार कर लिया। 
इसके बाद श्रीकृष्ण ने सूर्यदेव के समक्ष उनकी पुत्री कालिंदी (यमुना) से विवाह का प्रस्ताव रखा तो उन्होंने श्रीकृष्ण के साथ कालिंदी का विवाह कर दिया, इस प्रकार वह द्वारकाधीश श्रीकृष्ण की पटरानी बन गई।
जहां श्री कृष्ण ब्रज संस्कृति के जनक कहे जाते है, वहां यमुना ब्रज संस्कृति की जननी मानी जाती है।  
उल्लेखनीय हैं। प्रयाग में यमुना एक विशाल नदी के रूप में प्रस्तुत होती है और वहाँ के प्रसिद्ध ऐतिहासिक किले के नीचे गंगा में मिल जाती है। ब्रज की संस्कृति में यमुना का महत्वपूर्ण स्थान है। पौराणिक स्रोत के अनुसार भूवनभास्कर सूर्य इसके पिता मृत्यु के देवता यम इसके भाई और भगवान श्री कृष्ण इसके परि स्वीकार्य किये गये हैं। जहाँ भगवान श्री कृष्ण ब्रज संस्कृति के जनक कहे जाते हैं, वहाँ यमुना इसकी जननी मानी जाती है। इस प्रकार यह सच्चे अर्थों में ब्रजवासियों की माता है। अतः ब्रज में इसे यमुना मैया कहते है। ब्रह्म पुराण में यमुना के आध्यात्मिक स्वरुप का स्पष्टीकरण करते हुए विवरण प्रस्तुत किया है जो सृष्टि का आधार है और जिसे लक्षणों से सच्चिदनंद स्वरूप कहा जाता है, उपनिषदों ने जिसका ब्रह्म रूप से गायन किया है, वही परमतत्व साक्षात् यमुना है।
यमुना भारत की एक नदी है। यह गंगा नदी की सबसे बड़ी सहायक नदी है जो यह यमुनोत्री (उत्तरकाशी से ३० किमी उत्तर, गढ़वाल में) नामक जगह ब्रजभाषा के भक्त कवियों और विशेषतः वल्लभ सम्प्रदायी कवियों ने गिरिराज गोवर्धन की भाँति यमुना के प्रति भी अतिशय श्रद्धा व्यक्त की है। इस सम्प्रदाय का शायद ही कोई कवि हो, जिसने अपनी यमुना के प्रति अपनी काव्य श्रद्धांजलि अर्पित न की हो। उनका यमुना स्तुति संबंधी साहित्य ब्रजभाषा भक्ति काव्य का एक उल्लेखनीय अंग है। है। पुराणों में यमुना की महिमा कही गयी है। संवत 1549 में जब महाप्रभु वल्लभाचार्य ने यमुना अष्टक' की रचना की, तब यमुना का स्वरूप मनोहारी था। यमुना जी के दोनों किनारे सुन्दर वनों से पुष्प यमुना जी में झरते हैं और देव-दानव अर्थात दीन भाव वाले भक्त भली-भाँति पूजा करते हैं। उनके जल में उठती तरंगे मानों उनके हाथ के कंगन हैं किनारों पर चमकती रेत कंगनों में फंसे मोती हैं। दोनों तट उनके नितंब हैं। आप अगणित गुणों से शोभित है। शिव, ब्रह्मा और देव आपकी स्तुति करते हैं। जल प्रपूरित मेघश्याम बादलों जैसा आपका वर्ण है। श्री यमुना के साथ गंगा का संगम होने से गंगा जी भगवान की प्रिय बन, फिर गंगा जी ने उनके भक्तों को भगवान की सभी सिध्दियां प्रदान की। आपको नमन है, आपका चरित्र अद्भुत है। आपके पय के पान करने से कभी यमराज की पीड़ाएं नहीं भोगनी पड़तीं। स्वयं की संतानें दुष्ट हो तो भी यमराज उन्हें किस तरह मारे।
यमुनाष्टकम
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मुरारिकायकालिमाललामवारिधारिणी
तृणीकृतत्रिविष्टपा त्रिलोकशोकहारिणी।
मनोऽनुकूलकूलकुञ्जपुञ्जधूतदुर्मदा
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥१॥
आपकी नदी का जल मुरारी (श्रीकृष्ण) के शरीर के सुंदर (नीले) रंग को छूता है।
और इसलिए कृष्ण के स्पर्श के कारण ये स्वर्ग को तुच्छ बनाकर, तीनों संसार के दुखों को दूर करने के लिए आगे बढ़ता है। श्री कृष्ण के द्वारा स्पर्श की गयी ये यमुना जी की धारा हमारे अहंकार को मिटा देती है और हमें भक्तिमय बना देती है।
हे कालिंदी नंदिनी , कृपया करके मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो।
मलापहारिवारिपूरभूरिमण्डितामृता
भृशं प्रपातकप्रवञ्चनातिपण्डितानिशम्।
सुनन्दनन्दनाङ्गसङ्गरागरञ्जिता हिता
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥२॥
आपकी नदी का पानी, जो अशुद्धियों को दूर करता है, प्रचुर मात्रा में अमृत जैसे गुणों से जो भरा है ,
जो पापियों के मन में गहरे बैठे पापों को धोने में एक विशेषज्ञ है, न जाने कितने युगो से सबके पाप आप धोती आ रही है लगातार, आपका जल अत्यंत लाभकारी है, पुण्य नंदा गोप के पुत्र के शरीर के स्पर्श से रंगीन हो रहा है
हे कालिंदी नंदिनी (कलिंदा पर्वत की पुत्री), कृपया मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो,
लसत्तरङ्गसङ्गधूतभूतजातपातका
नवीनमाधुरीधुरीणभक्तिजातचातका।
तटान्तवासदासहंससंसृता हि कामदा
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥३॥
आपकी चमक और चंचल लहरों का स्पर्श जीवित जीवों में उठने वाले पापों को धो देता है, इनमे कई चातक पक्षियों (प्रतीकात्मक) का निवास करते है जो भक्ति (भक्ति) से पैदा हुई ताजी मिठास भरे जल ले जाते हैं (और एक भक्त हमेशा भक्ति की ओर देखते हैं जैसे चातक पक्षी पानी की ओर देखते हैं) आप इतनी कृपामयी हो जल पे बैठे एक हंस को भी आशीर्वाद देती हो जो आपकी नदी के किनारों की सीमा पर अभिसरण और निवास करते हैं, हे कालिंदी नंदिनी (कालिंद पर्वत की पुत्री), कृपया मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो,
विहाररासखेदभेदधीरतीरमारुता
गता गिरामगोचरे यदीयनीरचारुता।
प्रवाहसाहचर्यपूतमेदिनीनदीनदा
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥४॥
हे यमुना महारानी आपके इस शांत नदी के किनारे हमे अतीत के वो राधा-कृष्णा और गोपियों की रास लीला की याद दिलाती है और इसे वृन्दावन की कई यादें जुड़ी हैं, और जब इन आध्यत्मिक संगम के साथ जो कोई आपका दर्शन करता है तब आपकी नदी के जल की सुंदरता और बढ़ जाती है। आपके जल के प्रवाह के साथ संबंध के कारण, पृथ्वी और अन्य नदियाँ भी शुद्ध हो गई हैं,
हे कालिंदी नंदिनी (कलिंदा पर्वत की पुत्री), कृपया मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो,
तरङ्गसङ्गसैकताञ्चितान्तरा सदासिता
शरन्निशाकरांशुमञ्जुमञ्जरीसभाजिता।
भवार्चनाय चारुणाम्बुनाधुना विशारदा
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥५॥
नदी के रेत हमेशा आपके बहने वाली लहरों के संपर्क में रहने से चमकती रहती है, नदी और नदी के किनारे शरद ऋतु की रात को और खूबसूरत दीखते है। जो आपके इस रूप की पूजा करते है आप उस संसार के लोगो के सभी पापो को धोने में परनता सक्षम हो। हे कालिंदी नंदिनी (कलिंद पर्वत की पुत्री), कृपया मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो।
जलान्तकेलिकारिचारुराधिकाङ्गरागिणी
स्वभर्तुरन्यदुर्लभाङ्गसङ्गतांशभागिनी
स्वदत्तसुप्तसप्तसिन्धुभेदनातिकोविदा।
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥६॥
आपकी नदी-देह उस सुंदर राधारानी के स्पर्श से रंगी है जो आपके इस जल से श्रीकृष्ण के साथ खेला करती थी। आप दूसरों को उस पवित्र स्पर्श (राधा-कृष्ण के) से पोषण करती हो , जिसे प्राप्त करना बहुत मुश्किल है, आप सप्त सिन्धु (सात नदियों) के साथ पवित्र स्पर्श को भी चुपचाप साझा करती हो, आप तेज और कृपा फ़ैलाने पे अति निपुण हैं। हे कालिंदी नंदिनी (कलिंदा पर्वत की पुत्री), कृपया मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो,
जलच्युताच्युताङ्गरागलम्पटालिशालिनी
विलोलराधिकाकचान्तचम्पकालिमालिनी।
सदावगाहनावतीर्णभर्तृभृत्यनारदा
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥७॥
आपके इस नदी जल में अच्युता (श्रीकृष्ण) का रंग मिल गया है, तभी आप श्यामल दिखती हो जब वह भावुक गोपियों के साथ खेलते थे , जो मधुमक्खियों की तरह उनके संग घूमती थी। और कभी कभी ऐसा लगता है जैसा राधा रानी के बालो पे लगे काम्पका फूल पे जैसे मधुमखियाँ घूम रही हो।
(और आपके नदी में भगवान के सेवक नारद, हमेशा स्नान करने के लिए उतरते हैं। हे कालिंदी नंदिनी (कलिंदा पर्वत की पुत्री), कृपया मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो,
सदैव नन्दनन्दकेलिशालिकुञ्जमञ्जुला
तटोत्थफुल्लमल्लिकाकदम्बरेणुसूज्ज्वला
जलावगाहिनां नृणां भवाब्धिसिन्धुपारदा
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥८॥
आपका नदी-तट सुंदर घाटियों में नंदा का बेटा (यानी श्रीकृष्ण) हमेशा खेलते हैं, और आपके नदी के किनारे मल्लिका और कदंब के फूलों के पराग (यानी फूल) के साथ चमकता ही रहता है। वे व्यक्ति जो आपकी नदी के पानी में स्नान करते हैं, आप उन्हें दुनियावी अस्तित्व के महासागर में ले जाते हैं उस परमांनद की अनभूति कराती है। हे कालिंदी नंदिनी (कलिंदा पर्वत की पुत्री), कृपया मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो,
यमुना अष्टकम पढ़ने के लाभ 
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यमुना महारानी जो की सूर्य की बेटी, जो लोग इस आठ गुना प्रशंसा का आनंद लेते हैं इसे पढ़ते है। उनकी सभी अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं और श्री कृष्ण उनको प्यार करते हैं। उसके माध्यम से सभी भक्ति शक्तियाँ प्राप्त होती हैं और श्री कृष्ण प्रसन्न होते हैं। वह भक्तों के स्वभाव को बदल देता है। जो व्यक्ति मुक्ति- भक्ति चाहते हैं, उन्हें नियमित रूप से यमुना अष्टकम का पाठ करना चाहिए।
* भगवान श्रीकृष्ण की प्रिया यमुना ब्रजमंडल की आराध्या हैं, ब्रजवासी इन्हें नदी नहीं, बल्कि साक्षात देवी ही मानते हैं। 
* मथुरा के विश्राम घाट तथा वृंदावन के केशी घाट पर प्रतिदिन होने वाली यमुना जी की आरती में अंसख्य श्रद्धालु भाग लेते हैं। 
* ब्रज में आने वाला हर तीर्थयात्री यमुना जी का पूजन करके उन्हें दीपदान अवश्य करता है। 
* मनोरथ पूर्ण होने पर भक्तगण अनेक साडियों को जोडकर यमुना जी को चुनरी चढाते हैं। 
* ब्रजमंडल में ठाकुर जी का स्नान तथा उनके भोग की तैयारी यमुना जल से ही होती है। 
* श्रीनाथ जी का श्रीविग्रह ब्रज से मेवाड भले ही पहुंच गया हो, पर उनकी सेवाओं में केवल यमुनाजल का ही प्रयोग होता है।
आज भी मथुरा से नित्य यमुनाजल सुरक्षित पात्रों में भरकर श्रीनाथद्वारा भेजा जाता है। 
* यमुनाजी का वाहन कच्छप (कछुआ) है।
आदिवाराह पुराण के अनुसार यमुनाजी में स्नान करने से जन्मान्तर के पाप भस्म हो जाते हैं।
इतना ही नहीं जो व्यक्ति दूर रहकर भी भक्ति भावना के साथ यमुनाजी का स्मरण करता है वह भी पवित्र हो जाता है, लेकिन अफसोस की बात यह है कि आज हमने यमुना जी को प्रदूषित कर दिया है। 
अत: उन्हें प्रदूषण से मुक्त कराने के लिए हमें सार्थक प्रयास करना होगा, तभी हमारा यमुना पूजन सफल होगा।
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ब्रज चौरासी कोस यात्रा

.                    "ब्रज चौरासी कोस यात्रा"           ब्रज  चौरासी कोस की परिकम्मा एक  देत।           लख  चौरासी योनि  के  संकट ...