।। वर्ग की एक अन्य सर्वसमिका (Identity) ।।
हमारी वैदिक संस्कृति कितनी भव्य थी उसी को हम गणितीय विचारधारा के अनुसार आपको बताने का प्रयास करते हैं।
हम गणित की बीजगणितीय शाखा की एक सर्वसमिका (Identity) पर चर्चा करेंगे जो हमारे प्राचीन वैदिक गणितीय ज्ञान को न सिर्फ प्रमाणित करेगा बल्कि गणित को घटनाओं को सरल तथा रोचक बनाने में मदद करेगी।
तथ्य (1)
प्राचीन गणित का प्रसिद्ध कथन
वरगान्तरं तु योगान्तरघातसमो भवन्ति।
अर्थात :- किन्हीं दो वर्ग संख्याओं का अन्तर उन्ही संख्याओं के योग तथा अन्तर के फलों के गुणन के समतुल्य होता है।
(a)² – (b)² = (a + b) (a – b)
उदाहरणत: 35 ² – 15 ²
35 ² – 15 ² = (35 + 14) × (35 – 15)
= 50 × 20
= 1000
तथ्य (2)
इस सूत्र या सर्वसमिका (Identity) का विलोम भी होता है।
(a + b) (a – b) = (a)² – (b)²
उदाहरणत: 43 × 37
43 × 37
=(40+3)(40-3)
=40²–3²
= 1600 – 9
= 1591
तथ्य (3)
वरगान्तरं तु योगान्तरघातसमो भवन्ति।
यदि इस सर्वसमिका [(a)² – (b)² = (a + b) (a – b)] को हम ध्यान में देखें और b² को पक्षांतरित कर दें, तो हम समीकरण का जो सूत्र पाते हैं वह इस प्रकार प्राप्त होता है।
(a)² = (a + b) × (a – b) + (b)²
श्रीधराचार्य ने की एक विधि के अन्तर्गत इसी सर्वसमिका को प्रकट कर एक प्रसिद्ध सर्वसमिका बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है है।
इष्टोनयुतवधो वा तदिष्ट-वर्गान्वितो वर्गाः।
( —त्रिशतिका, श्लोक - 11)
अर्थात :- जिस संख्या का वर्ग करना है, उसमें किसी इष्ट संख्या को घटावें तथा उसमें उसी को जोड़े। पुनः घटाई गई तथा जोड़ी गई संख्या का आपस में गुणन करें तथा तथा इस गुणनफल में इष्ट संख्या को जोड़ने से उस संख्या का वर्ग प्राप्त होता है।
a² = ( a + b) × ( a – b) + b²
(1) यह हमें संख्या a का वर्ग निकालना है । तो हम कोई ऐसी संख्या लेते हैं । जो इसके निकटतम आधार के पास हो।
मान ले कि हमें 17 का वर्ग निकालना है उसका निकटतम आधार 20 होगा। अर्थात इसमें 3 संख्या जोड़नी है 3 घटानी है
( 17) ² = ( 17 + 3) × ( 17 – 3)
(2) अब इस संख्या में जो संख्या में जोड़ी और घटाई है उस संख्या का वर्ग करके जोड़ना है अर्थात हमें इसमें 3 का वर्ग और जोड़ना होगा।
( 17) ² = ( 17 + 3) × ( 17 – 3) + 3²
(3) अब पूरी गणना समझते हैं जो इस प्रकार होगी।
( 17) ² = ( 17 + 3) × ( 17 - 3) + 3 ²
= 20 × 14 + 9
= 280+9
= 289 ( उत्तर)
भास्कराचार्य द्वारा
इष्टोनयुग्राशिवधः कृतिः स्यादिष्टस्य वर्गेण समन्वितो वा।
(—लीलावती, अभिन्नपरिकर्माष्टक, श्लोक - 9)
अर्थात :- वर्ग करने योग्य संख्या से किसी कल्पित संख्या को एक जगह जोड़कर तथा दूसरी जगह घटाकर उन दोनों योगान्तरों के गुणनफल में उस कल्पित संख्या का वर्ग जोड़ देने से उस ईष्ट संख्या का वर्ग प्राप्त होता है।
यहां भी यही साबित होता है।
a² = ( a + b) × ( a – b) + b²
प्राचीन गणित का प्रसिद्ध कथन
वरगान्तरं तु योगान्तरघातसमो भवन्ति।
अर्थात :- किन्हीं दो वर्ग संख्याओं का अन्तर उन्ही संख्याओं के योग तथा अन्तर के फलों के गुणन के समतुल्य होता है।
इस नियम को गणित की भाषा में इस प्रकार लिखते हैं —
a² = ( a + b) × ( a - b) + b²
उदाहरण (Example) :-
( 67) ² = ( 67 + 3) × ( 67 - 3) + 3 ²
= 70 × 64 + 9
= 4489 ( उत्तर)
प्राप्त करते हैं —
a ² — b ² = ( a + b) ( a + b)
वरगान्तरं तु योगान्तरघातसमो भवन्ति।
a ² — b ² = ( a + b) ( a + b)
[अर्थात :- किन्हीं दो वर्ग संख्याओं का अन्तर उन्ही संख्याओं के योग तथा अन्तर के फलों के गुणन के समतुल्य होता है। ]
इस सूत्र या सर्वसमिका (Identity) का विलोम भी होता है।
(a + b) (a – b) = (a)² – (b)²
इस सूत्र या सर्वसमिका (Identity) के विलोम का प्रयोग भी बहुत से स्थानों पर किया जाता है।
उपरोक्त सूत्र का प्रयोग गणित के विभिन्न अध्याय में होता है। जो कि विषय को सरलता तथा मनोरंजक तरीके से हल करने के लिए आवश्यक है।
अभ्यास (Exercise) :-
(1) 10 ² - 11 ²
(2) 33 ² - 17 ²
(3) 38 ² - 32 ²
(4) 45 ² - 15 ²
(5) 69 ² - 11 ²
(6) 43 × 37
(7) 32 × 48
(8) 92 × 108
(9) 101 × 99
(10) 203 × 107
(11) (23)²
(12) (37)²
(13) (48)²
(14) (59)²
(15) (67)²
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