Monday, November 16, 2020

झूलन लीला

🌹झूलन लीला🌹
निकुंज में एक बड़ी प्यारी लीला है “झूलन लीला” एक बार राधा जी भगवान के बाई तरफ बैठी झूला झूल रही थी और सारी सखियाँ राधा माधव को झूला रही है. इतने में राधा जी को लगता है कि ये सुख मेरी सखियों को भी मिले .उनका तो यहीं व्रत है जो सुख मुझे मिले वो सारी सखियों को मिले.
राधा रानी जी प्रेमकल्पलता है, राधा लता है और पुष्प गोपियों है. जैसे लता अपना रस पुष्प को देकर पुष्प को पुष्ट करती है उनको वो रस देती है. वैसे ही राधा जी कल्पलता है . गेापियों को रस देती हैं उन्हें प्रफुल्लित करती है . राधा जी के रोम से सखी प्रकट हुई है. तो झूलन लीला में राधा जी ने कृष्ण को बताया कि मेरी तरह सारी सखियों को झूले में बिठाओ राधा रानी जी के एक इशारे पर सुखदान की लीला श्यामसुदंर ने शुरू कर दी.
पहले तो ललिता जी को दूसरी तरफ भगवान ने बिठा लिया एक ओर राधा रानी जी है ओर दूसरी ओर ललिता जी भगवान बीच में है . इस लीला का चित्रण बड़ा प्यारा है.निकुंज में कदम के पेड में वो झूला है, झूले पर राधा माधव बैठे है तो ललिता जी को बाये बैठा लिया और उनके कंधे पर अपना हस्त कमल रख दिया और उन्हें राधा की ही भांति सुख देने लगे.
इतने में ही एक सखी कुंदलता जी कहने लगी - कि देखो ! ये कलंकहीन चंद्र आज अपने राधा और अनुराधा को वाम और दक्षिण में लिए हुए शोभा का विस्तार कर रहे है. भगवान तो पूर्ण चंद है. तो राधा जी का त्याग देखे वो कहती है कि अब दोनों ओर सखियों को बिठाओ जैसे सखिया हम राधा माधव को झुलाती है, और वे स्वयं झूला झुलाने लगी. तो ऐसे ही सारी सखियों को बारी-बारी बिठाकर सुख देने लगे,कितना त्याग है कितना बड़ा आदर्श राधा रानी जी का.
और सखियो का त्याग देखो निज सुख की कामना से हिडोंलें में आकर नहीं बेठी है . वो तो राधा जी के सुख के लिए झूले में बैठी है . उनको कोई निज स्वार्थ नहीं है. इस लीला केा भगवान चाहते थे राधा जी के सुख इच्छा को पूर्ण करने के लिए, राधा रानी जी ऐसा चाहती थी. इसलिए गेापियों ने लीला को स्वीकारा किया. ये गोपी प्रेम की पराकाष्ठा है, राधा का सुख कहा ? “कृष्ण में” और गोपियों का सुख “राधारानी” में जिससे राधा-कृष्ण सुखी हो, वो ही गोपियों के जीवन का उददेष्य है. और राधा जी का महान त्याग उनके प्रेमानुगमन करने वाली सखियों को राधा जी सुख देती है. कैसा अलौकिक और दिव्य सुख है .
गेापियों के प्रेम महत्व की विशेता क्या है? वह है “अभिमान शून्यता” उनमें कोई अहंकार नहीं है. कृष्ण मेरे अधीन है ये उनको अहंकार नहीं है राधा जी भगवान के पास बैठी है झूला झूल रही है .और गोपियों को भी नहीं है कि कृष्णा हमारे कंधे पर हाथ रखकर बैठे है. क्योकि साधना में कोई बाधक है. तो वो है "अंहकार" उनके त्याग, प्रेम में, सबसे बडी वस्तु “दैन्य” और “अंहकार” रहित सेवा कर रही है. भगवन की सब कुछ भगवान को अर्पण कर दिया है . सब कुछ निछावर कर चुकी है पर फिर भी मन में यहीं भाव है कि मै प्रियतम से लेती हूँ, देती कुछ नहीं, बल्कि वो तो सब कुछ तन,मन, धन, शरीर, घर, बार, परिवार, सबो का त्याग कर दिया है . कृष्ण के चरणों में सब अर्पण कर दिया. ये अभिमान नहीं है कि हम देते है. “अभिमान शून्यता” “दैन्य” और “त्याग” ये तीन ही ही गोपियों के जीवन को महान बनाती है.
ऐसा राधारानी जी का सखियों के प्रति और सखियों का राधारानी जी के प्रति प्रेम है.यही प्रेम उन्हें प्रेम का आदर्श बनाता है.
🌺🍀🌺जय जय श्री राधे 🌺🍀🌺

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