Monday, November 16, 2020

भगवान नृसिंह प्राकट्य

*भगवान नृसिंह प्राकट्य 

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नृसिंह जयंती(नृसिंह चतुर्दशी) का व्रत वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को किया जाता है। पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार इसी पावन दिवस को भक्त प्रहलाद की रक्षा करने के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंह रूप में अवतार लेकर असुरों का अंत कर, धर्म कि रक्षा की थी। तभी से भगवान नृसिंह की जयंती संपूर्ण भारत वर्ष में धूम धाम से मनाई जाती है।
*नृसिंह मंत्र*
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_ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्।_
_नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ॥_

(हे क्रुद्ध एवं शूर-वीर महाविष्णु, आपकी ज्वाला एवं ताप चतुर्दिक फैली हुई है। हे नरसिंहदेव, आपका चेहरा सर्वव्यापी है, आप मृत्यु के भी यम हो और मैं आपके समक्ष आत्मसमर्पण करता हूँ।)

*श्री नृसिंह आरती*
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नमस्ते नृसिंहाय प्रहलादाहलाद-दायिने। 
हिरन्यकशिपोर्ब‍क्षः शिलाटंक नखालये॥

इतो नृसिंहो परतोनृसिंहो, यतो-यतो यामिततो नृसिंह। 
बर्हिनृसिंहो ह्र्दये नृसिंहो, नृसिंह मादि शरणं प्रपधे॥

तव करकमलवरे नखम् अद् भुत श्रृग्ङं। 
दलित हिरण्यकशिपुतनुभृग्ङंम्। केशव धृत नरहरिरुप, जय जगदीश हरे॥
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श्री नृसिंह जय नृसिंह जय जय नृसिंह। प्रहलादेश जय पदमामुख पदम भृग्ह्र्म॥ _________________________

*नृसिंह जी अवतरण कथा*
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सतयुग में ऋषि कश्यप के दो पुत्र थे हिरण्याक्ष और हिरणाकश्यप, हिरण्याक्ष भगवान ब्रह्मा से मिले वरदान की वजह से बहुत अहंकारी हो गया था। अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए वो भूदेवी को साथ लेकर पाताल में भगवान विष्णु की खोज में चला गया। भगवान विष्णु ने वराह अवतार में उसके साथ युद्ध किया और उसका विनाश कर दिया। लेकिन संसार के लिए खतरा अभी टला नही था क्योंकि उसका भाई हिरणाकश्यप अपने भाई की मृत्यु का प्रतिशोध लेने को आतुर था। उसने देवताओं से बदला लेने के लिए अपनी असुरों की सेना से देवताओं पर आक्रमण कर दिया। हिरणाकश्यप देवताओं से लड़ता लेकिन हर बार भगवान विष्णु उनकी मदद कर देते।

हिरणाकश्यप ने सोचा, “अगर मुझे विष्णु को हराना है तो मुझे अपनी रक्षा के लिए एक वरदान की आवश्यकता है, क्योंकि मैं जब भी देवतओं और मनुष्यों पर आक्रमण करता हूँ, विष्णु मेरी सारी योजना को नष्ट कर देते हैं।

 ……उनसे लड़ने के लिए मुझे शक्तिशाली बनना पड़ेगा | अपने मन में ऐसे विचार लेकर वो वन की तरफ निकल पड़ता है और ब्रह्मा जी की तपस्या में लीन हो जाता है। वो काफी लम्बे समय तक तपस्या में इसलिए रहना चाहता था, ताकि वो भगवान ब्रह्मा से अमर होने का वरदान मांग सके। इस दौरान वो अपने, और अपने साम्राज्य के बारे में भूलकर कठोर तपस्या में लग जाता है।

इस दौरान इंद्रदेव को ये ज्ञात होता है कि हिरणाकश्यप असुरों का नेतृत्व नहीं कर रहा है। इंद्रदेव सोचते हैं कि, ”यदि इस समय असुरों को समाप्त कर दिया जाए, तो फिर वो कभी आक्रमण नहीं कर पाएंगे। हिरणाकश्यप के बिना असुरों की शक्ति आधी है, अगर इस समय इनको समाप्त कर दिया जाए तो हिरणाकश्यप के लौटने पर उसका आदेश मानने वाला कोई शेष नही रहेगा।

”ये सोचते हुए इंद्रदेव दूसरे देवों के साथ असुरों के साम्राज्य पर आक्रमण कर देते हैं। इंद्रदेव की अपेक्षा के अनुसार हिरणाकश्यप के बिना असुर मुकाबले में कमज़ोर पड़ गये, और युद्ध में हार गये। इंद्रदेव ने असुरों के कई समूहों को समाप्त कर दिया।

हिरणाकश्यप की राजधानी को नष्ट कर इन्द्रदेव ने हिरणाकश्यप के महल में प्रवेश किया जहाँ पर उनको हिरणाकश्यप की पत्नी कयाधू नज़र आयी। इंद्रदेव ने हिरणाकश्यप की पत्नी को बंदी बना लिया, ताकि भविष्य में हिरणाकश्यप के लौटने पर उसको बंधक बनाने के लिए उपयोग कर पाए। इंद्रदेव जैसे ही कयाधू को इंद्र लोक लेकर जाने लगे, महर्षि नारद प्रकट हुए और उसी समय इंद्र को कहा, “इंद्रदेव रुक जाओ आप ये क्या कर रहे हो? ”महर्षि नारद, इंद्रदेव को कयाधू को अपने रथ में ले जाते देख क्रोधित हो गये। इंद्रदेव ने नतमस्तक होकर महर्षि नारद से कहा, “महर्षि, मैंने हिरणाकश्यप के नेतृत्व से विहीन असुरों पर आक्रमण किया है, और मेरा मानना है कि असुरों के आतंक को समाप्त करने का यही समय है।” 

वहाँ के विनाश को देखकर महर्षि नारद ने क्रोधित स्वर में कहा, “हाँ, ये सत्य है, मैं देख सकता हूँ। लेकिन कयाधू इसमें कहा से आयी? क्या इसने तुमसे युद्ध किया? मुझे ऐसा नहीं लग रहा है कि इसने तुम्हारे विरुद्ध कोई शस्र उठाया है। फिर तुम इसे क्यों चोट पंहुचा रहे हो ? “इंद्रदेव ने महर्षि नारद की तरफ देखते हुए जवाब दिया कि वो उसके शत्रु हिरणाकश्यप की पत्नी है, जिसे वो बंदी बना करले जा रहा है, ताकि हिरणाकश्यप कभी आक्रमण करे तो वो उसका उपयोग कर सकें। महर्षि नारद ने गुस्से में इन्द्रदेव को कहा, "केवल युद्ध जीतने के लिए दूसरे की पत्नी का अपहरण करोगे?" इस निरपराध स्त्री को ले जाना महापाप होगा।

इंद्रदेव के पास, महर्षि नारद की बातें सुनने के बाद कयाधू को रिहा करने के अलावा कोई विकल्प नही था। इंद्रदेव ने कयाधू को छोड़ दिया, और महर्षि नारद को उसका जीवन बचाने के लिए धन्यवाद दिया। महर्षि नारद ने पूछा कि असुरों के विनाश के बाद वो अब कहाँ रहेगी? कयाधू उस समय गर्भवती थी, अपनी संतान की रक्षा के लिए उसने महर्षि नारद को उसकी देखभाल करने की प्रार्थना की। महर्षि नारद उसको अपने घर लेकर चले गये और उसकी देखभाल की। इस दौरान वो कयाधू को विष्णु भगवान की कथायें भी सुनाया करते थे, जिसको सुनकर कयाधू को भगवान विष्णु से लगाव हो गया था, उसके गर्भ में पल रहे शिशु को भी विष्णु भगवान की कहानियों ने मोहित कर दिया था।

समय गुजरता गया एक दिन स्वर्ग की वायु इतनी गर्म हो गयी थी कि सांस लेना मुश्किल हो रहा था। कारण खोजने पर देवों को पता चला कि हिरणाकश्यप की तपस्या बहुत शक्तिशाली हो गयी थी, जिसने स्वर्ग को भी गर्म कर दिय था। इस असहनीय गर्मी को देखते हुए, देव भगवान ब्रह्मा जी के पास गये और मदद के लिए कहा। भगवान ब्रह्मा को हिरणाकश्यप से मिलने के लिए धरती पर प्रकट होना पड़ा। भगवान ब्रह्मा हिरणाकश्यप की कठोर तपस्या से बहुत प्रसन्न हुए, और उसे वरदान मांगने को कहा।

हिरणाकश्यप ने नतमस्तक होकर कहा “भगवान मुझे अमर बना दो। ”
भगवान ब्रह्मा ने अपना सिर हिलाते हुए कहा, “पुत्र, जिनका जन्म हुआ है उनकी मृत्यु निश्चित है, मैं सृष्टि के नियमो को नहीं बदल सकता हूँ, कुछ ओर मांग लो।”

हिरणाकश्यप अब सोच में पड़ गया, क्योंकि जिस वरदान के लिए उसने तपस्या की वो प्रभु ने देने से मना कर दिया। हिरणाकश्यप अब विचार करने लगा कि अगर वो असंभव शर्तों पर मृत्यु का वरदान माँगे तो उसकी साधना सफल हो सकती है। हिरणाकश्यप ने कुछ देर ओर सोचते हुए भगवान ब्रह्मा से वरदान मांगा।

“प्रभु मेरी इच्छा है कि मुझे ना तो मुझे मनुष्य मार सके और ना ही जानवर, ना मुझे कोई दिन में मार सके और ना ही रात्रि में, ना मुझे कोई स्वर्ग में मार सके और ना ही पृथ्वी पर, ना मुझे कोई घर में मार सके और ना ही घर के बाहर, ना कोई मुझे अस्त्र से मार सके और ना ही शस्त्र से।” 

हिरणाकश्यप का ये वरदान सुनकर एक बार तो ब्रह्मा खुद ही चकित रह गये, कि हिरणाकश्यप का ये वरदान बहुत विनाश कर सकता है, लेकिन उनके पास वरदान देने के अलावा ओर कोई विकल्प नहीं था। भगवान ब्रह्मा ने तथास्तु कहते हुए मांगे हुए वरदान के पूरा होने की बात कही, और वरदान देते ही भगवान ब्रह्मा अदृश्य हो गये। हिरणाकश्यप खुशी से अपने साम्राज्य लौट गया, और इंद्रदेव द्वारा किये विनाश को देखकर बहुत दुखी हुआ। उसने इंद्रदेव से बदला लेने की ठान ली और अपने वरदान के बल पर इंद्रलोक पर आक्रमण कर दिया। इंद्रदेव के पास कोई विकल्प ना होते हुए वो सभी देवों के साथ देवलोक चले गये। हिरणाकश्यप इंद्रलोक का राजा बन गया।

हिरणाकश्यप अपनी पत्नी कयाधू को खोजकर घर लेकर आ गया। कयाधू के विरोध करने के बावजूद हिरणाकश्यप मनुष्यों पर यातना ढाने लगा, और उसके विरुद्ध आवज़ उठाने वाला अब कोई नहीं था। कयाधू ने एक पुत्र को जन्म दिया जिनका नाम प्रहलाद रखा गया। जैसे-जैसे प्रहलाद बड़ा होता गया, वैसे-वैसे हिरणाकश्यप ओर अधिक शक्तिशाली होता गया। हालांकि प्रहलाद अपने पिता से बिलकुल अलग था, और किसी भी जीव को नुकसान नहीं पहुँचाता था। वो भगवान विष्णु का अगाध भक्त था। लोग उसके अच्छे व्यवाहर की वजह से, उनसे प्रेम करते थे।

एक दिन गुरु शुक्राचार्य प्रहलाद की शिकायत लेकर हिरणाकश्यप के पास पहुँचे, और कहा, “महाराज, आपका पुत्र हम जो पढ़ाते हैं, वो नहीं पढ़ता है, और सारे समय विष्णु का स्मरण करता रहता है।” हिरणाकश्यप ने उसी समय गुस्से में प्रहलाद को बुलाया और पूछा कि वो दिन भर विष्णु का नाम क्यों लेता रहता है?

प्रहलाद ने उत्तर दिया “पिताश्री, भगवान विष्णु ही सारे जगत के पालनहार हैं, इसलिए मैं उनका स्मरण करता हूँ, मैं दूसरों की तरह, आपके आदेशों को मानकर, आपकी पूजा नही कर सकता हूँ।"

हिरणाकश्यप ने अब शाही पुरोहितों से उसका ध्यान रखने को और विष्णु का जाप बंद कराने को कहा। लेकिन प्रहलाद को कोई फर्क नहीं पड़ा। इसके विपरीत गुरुकुल में प्रहलाद दूसरे शिष्यों को भी उसकी तरह भगवान विष्णु की आराधना करने के लिए प्रेरित करने लगा।

हिरणाकश्यप ने परेशान होकर फिर प्रहलाद को बुलाया और पूछा, “पुत्र तुम्हें सबसे प्रिय क्या है?”

प्रहलाद ने उत्तर दिया, “मुझे भगवान विष्णु का नाम लेना सबसे प्रिय लगता है। ”

अब हिरणाकश्यप ने पूछा, “इस सृष्टि में सबसे शक्तिमान कौन है ?”

प्रहलाद ने फिर उत्तर दिया, “तीन लोकों के स्वामी, और जगत के पालनहार भगवान विष्णु सबसे सर्वशक्तिमान है।“

अब हिरणाकश्यप को अपने गुस्से पर काबू नहीं रहा, और उसने अपने पहरेदारों से प्रहलाद को विष देने को कहा। प्रहलाद ने विष का प्याला पूरा पी लिया लेकिन उनकी मृत्यु नहीं हुई। सभी व्यक्ति इस चमत्कार को देखकर अचम्भित रह गये। अब हिरणाकश्यप ने आदेश दिया की प्रहलाद को बड़ी चट्टान से बांधकर समुद्र में फेंक दो, लेकिन फिर चमत्कार हुआ और रस्सियाँ अपने आप खुल गयी। भगवान विष्णु का नाम लेकर वो समुद्र जल से बाहर आ गये। इसके बाद एक दिन जब प्रहलाद भगवान विष्णु के ध्यान में मग्न थे, तब उस पर उन्मत्त हाथियों के झुण्ड को छोड़ दिया, लेकिन वो हाथी उनके पास शांति से बैठ गये।

अब हिरणाकश्यप ने अपनी बहन होलिका को बुलाया और कहा, “बहन तुम्हें भगवान से वरदान मिला है कि तुम्हें अग्नि से कोई नुकसान नही होगा, मैं तुम्हारे इस वरदान को परखना चाहता हूँ। मेरा पुत्र प्रहलाद दिन भर विष्णु का नाम जपता रहता है और मेरा सामना करता है। मैं उसकी सूरत नहीं देखना चाहता हूँ। मैं उसे मारना चाहता हूँ, क्योंकि वो मेरा पुत्र नहीं है। मैं चाहता हूँ, कि तुम प्रहलाद को गोद में बिठाकर अग्नि पर बैठ जाओ। होलिका ने अपने भाई की बात स्वीकार कर ली।

अब होलिका ने ध्यान करते हुए, प्रहलाद को अपनी गोद में बिठाया और हिरणाकश्यप को आग लगाने को कहा। हिरणाकश्यप प्रहलाद की भक्ति की शक्ति को नहीं जानता था। आग से प्रतिरक्षित होलिका जलने लगी, और उसके पापों ने उसका नाश कर दिया। जब आग बुझी तो प्रहलाद  उस जली हुई जगह के मध्य अभी भी ध्यान में बैठे हुआ थे, जबकि होलिका कहीं भी नज़र नहीं आयी।

अब हिरणाकश्यप भी घबरा गया और प्रहलाद को ध्यान से खींचते हुए ले गया, और चिल्लाते हुए बोला, “तुम कहते हो तुम्हारा विष्णु हर जगह पर है, बताओ अभी विष्णु कहा पर है? वो पेड़ के पीछे है या मेरे महल में है, या इस स्तंभ में है बताओ ?

प्रहलाद ने अपने पिता की आँखों में आँखे मिलाकर कहा, “हाँ पिताश्री, भगवान विष्णु हर जगह पर है।”

क्रोधित हिरणाकश्यप ने अपने गदा से स्तम्भ पर प्रहार किया और गुस्से से कहा, “तो बताओ वो कहाँ है? “

हिरणाकश्यप दंग रह गया, उसने देखा कि वो स्तम्भ चकनाचूर हो गया। उस स्तम्भ में से भगवान नृसिंहदेव प्रकट हुए। उनका मुख शेर का, और शरीर मनुष्य का था। 

हिरणाकश्यप भगवान के आधे सिंह और आधे मनुष्य रूप को देखकर पीछे हट गया। तभी भगवान ने कहा, “मैं नारायण का अवतार नरसिंह हूँ, और मैं तुम्हारा विनाश करने आया हूँ।“

हिरणाकश्यप उसे देखकर जैसे ही बच कर भागने लगा, तभी नृसिंहदेव ने उसे पंजो से जकड़ लिया। हिरणाकश्यप ने अपने आप को छुडाने के बहुत कोशिश की, लेकिन नाकाम रहा।

नरसिंह अब हिरणाकश्यप को घसीटते हुए दरवाजे की चौखट तक ले गये [जो ना घर में था और ना ही घर के बाहर]। उसे अपनी गोद में बिठा लिया [जो ना आकाश में थी और ना ही धरती पर ]। सांझ के समय [ना ही दिन था और ना ही रात ] हिरणाकश्यप का अपने पंजो [नाहे अस्त्र ना ही शस्त्र ] से वध कर दिया। हिरणाकश्यप का वध करने के बाद दहाड़ते हुए नरसिंह सिंहासन पर बैठ गये।

सारे असुर भगवान के इस रूप को देखकर भाग गये, और देवताओ की भी भगवान नृसिंह देव के पास जाने की हिम्मत नहीं हुई। बिना डरे हुए प्रहलाद आगे बढ़े, और नरसिंहदेव से प्यार से कहा, “प्रभु, मैं जानता हूँ कि आप मेरी रक्षा के लिए आये हो। ”

भगवान नरसिंह ने मुस्कुराकर उत्तर दिया, “हाँ पुत्र मै तुम्हारे लिए ही आया हूँ। तुम चिंता मत करो, तुम्हें इस कहानी का ज्ञान नहीं है, कि तुम्हारे पिता मेरे द्वारपाल विजय है उन्हें एक श्राप के कारण पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ा। तीन जन्मों के पश्चात उन्हें फिर वैकुण्ठ में स्थान मिल जाएगा। इसलिए तुम्हे चिंता करने की कोई आवश्यकता नही है”।

प्रहलाद ने अपना सिर हिलाते हुए कहा, “प्रभु अब मुझे कुछ नही चाहिए। “

नरसिंहदेव जी ने अपना सिर हिलाया और कहा, “नहीं पुत्र तुम प्रजा पर राज करने के लिए बने हो। तुम अपनी प्रजा की सेवा करने के पश्चात वैकुण्ठ आना। “

प्रहलाद अब असुरों के उदार और महान शासक बन गये, जिन्होंने अपने शाशनकाल के यश प्राप्त किया, और असुरों के पुराने क्रूर तरीके समाप्त कर दिए।

*भक्त शिरोमणि प्रह्लाद महाराज की जय।*
*भगवान नृसिंहदेव की जय।*

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