Monday, November 16, 2020

लड्डू गोपाल की सेवा

लड्डू गोपाल की सेवा.............

एक नगर में दो वृद्धस्त्रियां बिल्कुल पास पास रहा करती थी। उन दोनो में बहुत घनिष्ठता थी। उन दोनों का ही संसार में कोई नहीं था इसलिए एक दूसरे का सदा साथ देतीं और अपने सुख-दुःख आपस में बाँट लेती थीं। एक स्त्री हिन्दू थी तथा दूसरी जैन धर्म को मानने वाली थी। हिन्दू वृद्धा ने अपने घर में लड्डू गोपाल को विराजमान किया हुआ था। वह प्रतिदिन बड़े प्रेम से लड्डू गोपाल की सेवा करा करती थी। प्रतिदिन उनको स्नान कराना, धुले वस्त्र पहनाना, दूध व फल आदि भोग अर्पित करना उसका नियम था। वह स्त्री लड्डू गोपाल के भोजन का भी विशेष ध्यान रखती थी। सर्दी, गर्मी, बरसात हर मौसम का ध्यान उसको रहता था। वह जब भी कभी बाहर जाती लड्डू गोपाल के लिए कोई ना कोई खाने की वस्तु, नए वस्त्र खिलोने आदि अवश्य लाती थी। लड्डू गोपाल के प्रति उसके मन में आपार प्रेम और श्रद्धा का भाव था। उधर जैन वृद्धा भी अपनी जैन परम्परा के अनुसार भगवान् के प्रति सेवा भाव में लगी रहती थी। उन दोनों स्त्रिओं के मध्य परस्पर बहुत प्रेम भाव था, दोनों ही एक दूसरे के भक्ति भाव और धर्म की प्रति पूर्ण सम्मान की भावना रखती थी। । जब किसी को कोई समस्या होती तो दूसरी उसका साथ देती, दोनों ही वृद्धाएं स्वाभाव से भी बहुत सरल और सज्जन थी। भगवान की सेवा के अतिरिक्त उनका जो भी समय शेष होता था वह दोनों एक दूसरे के साथ ही व्यतीत करती थीं।

एक बार हिन्दू वृद्धा को एक माह के लिए तीर्थ यात्रा का अवसर प्राप्त हुआ उसने दूसरी स्त्री से भी साथ चलने का आग्रह किया किन्तु वृद्धावस्था के कारण अधिक ना चल पाने के कारण उस स्त्री ने अपनी विवशता प्रकट करी, हिन्दु वृद्धा ने कहा कोई बात नहीं में जहां भी जाउंगी भगवान् से तुम्हारे लिए प्रार्थना करुँगी। फिर वह बोली में तो एक माह में लिए चली जाउंगी तब तक मेरे पीछे मेरे लड्डू गोपाल का ध्यान रखना। उस जैन वृद्धा ने सहर्ष ही उसका यह अनुरोध स्वीकार कर लिया। हिन्दू वृद्धा ने उस जैन वृद्धा को लड्डू गोपाल की सेवा के सभी नियम व आवश्यकताएँ बता दी उस जैन वृद्धा ने सहर्ष सब कुछ स्वीकार कर लिया। 

कुछ दिन बाद वह हिन्दू वृद्धा तीर्थ यात्रा के लिए निकल गई। उसके जाने के बाद लड्डू गोपाल के सवा का कार्य जैन वृद्धा ने अपने हाथ में लिया।  वह बहुत उत्त्साहित थी कि उसको लड्डू गोपाल की सेवा का अवसर प्राप्त हुआ। उस दिन उसने बड़े प्रेम से लड्डू गोपाल की सेवा करी, भोजन कराने से लेकर रात्री में उनके शयन तक के सभी कार्य पूर्ण श्रद्धा के साथ वैसे ही पूर्ण किए जैसे उसको बताए गए थे। लड्डू गोपाल के शयन का प्रबन्ध करके वह भी अपने घर शयन के लिए चली गई।

अगले दिन प्रातः जब वह वृद्धा लड्डू गोपाल के सेवा के लिए हिन्दू स्त्री के घर पहुंची तो उसने सबसे पहले लड्डू गोपाल को स्नान कराने की तैयारी करी, नियम के अनुरूप जब वह लड्डू गोपाल को स्नान कराने लगी तो उसने देखा की लड्डू गोपाल के पाँव पीछे की और मुड़े हुए हैं।  उसने पहले कभी लड्डू गोपाल के पाँव नहीं देखे थे जब भी उनको देखा वस्त्रों में ही  देखा था। वह नहीं जानती थी की लड्डू गोपाल के पाँव हैं ही ऐसे, घुटनों के बल बैठे हुए। लड्डू गोपाल के पाँव पीछे की और देख कर वह सोंचने लगी अरे मेरे लड्डू गोपाल को यह क्या हो गया इसके तो पैर मुड़ गए है। उसने उस हिन्दू वृद्धा से सुन रखा था की लड्डू गोपाल जीवंत होते हैं। उसने मन में विचार किया की में इनके पैरो की मालिश करुँगी हो सकता है इनके पाँव ठीक हो जाएं।  बस फिर क्या था भक्ति भाव में डूबी उस भोली भाली वृद्धा ने लड्डू गोपाल के पैरों की मालिश आरम्भ कर दी।  उसके बाद वह नियम से प्रति दिन पांच बार उनके पैरों की मालिश करने लगी। उस भोली वृद्धा की भक्ति और प्रेम देख कर ठाकुर जी का हृदय द्रवित हो उठा, भक्त वत्सल भगवान् अपनी करुणा वश अपना प्रेम उस वृद्धा पर उड़ेल दिया। एक दिन प्रातः उस जैन वृद्धा ने देखा की लड्डू गोपाल के पाँव ठीक हो गए हैं और वह सीधे खड़े हो गए हैं, यह देख कर वह बहुत प्रसन्न हुई और दूसरी स्त्री के आने की प्रतीक्षा करने लगी।

कुछ दिन पश्चात् दूसरी स्त्री वापस लोटी तो उसने घर आकर सबसे पहले अपने लड्डू गोपाल के दर्शन किये, किन्तु जैसे ही वह लड्डू गोपाल के सम्मुख पहुंची तो देखा कि वह तो अपने पैरों पर सीधे खड़े हैं, यह देखकर वह अचंभित रह गई। वह तुरंत उस दूसरी स्त्री के पास गई और उसको सारी बात बताई और पूंछा कि मेरे लड्डू गोपाल कहा गए। यह सुनकर उस जैन स्त्री ने सारी बात बता दी उसकी बात सुनकर वह वृद्ध स्त्री सन्न रह गई और उसको लेकर अपने घर गई वहां जाकर उसने देखा तो लड्डू गोपाल मुस्करा रहे थे, वह लड्डू गोपाल के चरणों में गिर पड़ी और बोली है गोपाल आपकी लीला निराली है, मेने इतने वर्षो तक आपकी सेवा करी किन्तु आपको नहीं पहचान सकी। तब वह उस जैन वृद्धा से बोली की तू धन्य है, तुझको नहीं मालूम की हमारे लड्डू गोपाल के पाँव तो ऐसे ही हैं, पीछे की और किन्तु तेरी भक्ति और प्रेम ने तो लड्डू गोपाल पाँव भी सीधे कर दिया। 

उस दिन के बाद उन दोनों स्त्रिओं के मध्य प्रेम भाव और अधिक बड़ गया दोनों मिल कर लड्डू गोपाल की सेवा करने लगी।  वह दोनों स्त्री जब तक जीवित रही तब तक लड्डू गोपाल की सेवा करती रहीं।

#तरस_गये_बांके_बिहारीजी_आपके
             #दीदार_को,
#दिल_फिर_भी_आपका_ही_इंतज़ार
             #करता_है,
#हमसे_अच्छा_तो_आपकी_चौखट
          #का_वो_परदा_है,
#जो_हर_रोज़_आपका_दीदार
           #तो_करता_है।।।
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  ༺꧁ #Զเधॆ_Զเधॆ꧂༻

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