औलाइ दर्शन क्या है? इस बारे मे हमारे पास बहुत प्रश्न आते है, इसलिये इस ब्लॉग मे आज इसी बारे मे बताने जा रहे है। वृंदावन के श्री राधारमण देव जी के मंदिर मे शयन आरती से पहले प्यारे जू का विशेष श्रृंगार किया जाता है जिसे औलाइ दर्शन कहते है। क्या विशेष होता है इस श्रृंगार मे एवम् क्यों होता ऐसा श्रृंगार, विस्तार मे जानने के लिए आगे पढ़े …
प्यारे राधारमण लाल के मंगला आरती से शयन आरती सेवा
• सुबह मंगला आरती की बेला में हमारे प्यारे श्रीराधारमण जू की जब आरती होती हैं एक तो उनके मुख-मण्डल पर अल्साय हुए दर्शन प्रतीत होते हैं सभी भक्तों को। मंगला आरती पर 3 बत्ती द्वारा आरती सेवा होती हैं।
• फिर लगभग सुबह 9 बजे धूप आरती की जाती हैं। जिसमें श्रीराधारमण जू सज-संवरकर अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए अति लालायित रहते हैं। जितनी प्रतीक्षा भक्तों को रहती हैं उससे कहीं ज्यादा इन्हें। धूप आरती में 1 बत्ती द्वारा सेवा होती हैं।
• फिर श्रृंगार आरती दर्शन में श्रीराधारमण जू को पुष्पों की माला पहनाई जाती हैं। वोह पुष्प भी धन्य अति धन्य हैं जो श्रीठाकुर-ठकुरानी के अंगों का स्पर्श करते हैं। श्रृंगार आरती सेवा 5 बत्ती द्वारा होती हैं।
• राजभोग में आरती सेवा गर्मीयों में पुष्पों द्वारा होती हैं। सर्दियों में आरती सेवा 5 बत्ती द्वारा की जाती हैंl
• संध्या धूप आरती समय 1 बत्ती द्वारा सेवा की जाती हैं। परन्तु अगर कोई विशेष-विशेष उत्सव हो। जैसे प्राकटय् उत्सव-श्रीकृष्ण-जन्मोत्सव इत्यादि तो 13 बत्ती द्वारा सेवा की जाती हैं।
• सांयकालीन संध्या आरती में 9 बत्ती द्वारा सेवा की जाती हैं संध्या समय जो परिवेश हैं प्राँगण का। विशेष ग्रीष्म ऋतु में श्रीठाकुर-ठकुरानी जी बाहर पधारते हैं। एक-एक अंग की छवि का दर्शन आहा ! जितना कहाँ जायें कम ही होगा। रसिक जनों द्वारा समाज गायन एवं भक्तवृन्द जनों द्वारा नृत्य। ह्रदय एवं आत्मा नाच उठती हैं।
• फिर औलाई दर्शन का आनन्द प्राप्त होता हैं। श्रीठाकुर जी गौ-चारण के पश्चात धुल-धुसरित वस्त्रों से घर पर पधारते हैं तब श्री यशोदा मैया श्रीठाकुर जी का अच्छी तरह से मार्जन कर हल्के वस्त्र धारण करवाती हैं। क्या सीमा होगी ऐसे आनन्द की। अगर एक बार इसका चिन्तन किया जायें तो जीव इसी में डूब जायें।
• तत्पश्चात शयन आरती की सेवा 3 बत्ती द्वारा की जाती हैं। साथ में बांसुरी वादन की मधुरतम आवाज मदमस्त कर देती हैं। मन्दिर का परिवेश बिलकुल शान्त एवं आनन्दप्रदायक हो जाता हैं। ऐसे इष्टदेव पर बारम्बार बलिहार ! बलिहार ! बलिहार !
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