Saturday, September 10, 2022

वृन्दावन धाम कैसा है ?

💠 किसी👳🏻‍♀ ने मुझ से पूछा वृन्दावन धाम कैसा है ।💠


मैं 👵🏻बोला
" अरे , बिल्कुल मत जाना । बड़ी मायावी नगरी है , एक बार गए तो सही सलामत वापिस नही आ पाओगे । " कहीं से भी ढोल , नगाड़े , मंजीरे बज उठते हैं और पांव नाचने को मजबूर हो जाते हैं ।

👳🏻‍♀--"क्यों ? ऐसा क्या है उस नगरी में ?"

👵🏻-- माया की नगरी है , वहां का राजा जादूगर है और बहुत बड़ा लूटेरा भी । इधर कदम धरा , उधर सब लुट गया समझो। मनुष्य को बांवरा कर देता है । पागल से भी बदतर ।

👳🏻‍♀-- मैं बहुत समझदार हूँ , मैं ना आता उसकी बातों में ।

👵🏻-- वो बात करेगा तभी तो समझदारी दिखाओगे । तुम्हारा काम तो उस काल कलूटे राजा की नगरी में पांव धरते ही हो जाएगा । सयाने लोगों को तो वो चुन चुन कर अपने पागलखाने में भर्ती करता है। जो जितना ज्ञानी उतना बड़ा उसका शिकार ।

👳🏻‍♀-- में छुप कर जाऊंगा उस नगरी , फिर देखता हूँ कैसे पागल बनाता है ।

👵🏻 -- हाहाहा, भाई वहां का पत्ता पत्ता उस का गुप्तचर है । हवाएं उसके इशारे पर चलती हैं ।
तुम उसकी सीमा में गये नही कि लूट जाओगे ।

👳🏻‍♀-- ऐसे कैसे लूट लेगा ?

👵🏻-- सुना है , उसने गाय फैला रखी हैं गुप्तचर बना कर और उनकी आंखों में कैमरे हैं जो घुसते ही तुम्हारी फ़ोटो खींच उसे भेज देंगी । वो गाय ऐसा गोबर करती है कि उसकी खुशबू से मनुष्य के दिमाग पर असर होना शुरू हो जाता है ।

👳🏻‍♀-- मैं सतर्क रहूँगा । मुंह ढक कर नाक बांध कर जाऊंगा ।
👵🏻 -- भाई , किस किस से छुपेगा । उसके मायावी ग्वाल बाल बात बात में तुझपर जादू कर देंगे । उसका एक जादुई मंत्र है जो वहां हर वक्त हवा में तैरता रहता है " राधे " ।
ये मन्त्र सुना नही कि तू बेसुध हो जाएगा ।

👳🏻‍♀-- मैं कान में रुई डाल लूंगा ।

👵🏻-- वहां की मिट्टी तो सबसे अधिक खतरनाक है इधर तुम्हारे पैर को छूई नही कि हो गया तुम्हारा काम , स्वयं चल कर सीधे राजा के दरबार में पहुंच जाओगे ।

👳🏻‍♀-- 🤔🤔 ऐसा क्या ?? मैं अच्छे से जुराब जूते बांध कर जाऊंगा ।

👵🏻-- अरे भाई , वहां जा कर तो अपनी देह भी देह नही रहती । साफ इंकार कर देती है कि मैं तो इस काले राजा की हूँ तेरी ना मानूंगी । वहां के मनुष्य , पशु , पक्षी , पेड़ पौधे सब मायावी हैं ।
इतने मनमोहक हैं कि तुम नज़र ही ना हटा पाओगे और इधर सीधी नज़र मिली नही कि तुम तो गए ।

👳🏻‍♀-- मेरे पास एक विदेशी चश्मा है जिसपर किसी प्रकार की किरणें काम नही करती ।

👵🏻-- हाहा , चश्मा?? उस कलुए राजा ने एक वानर सेना इसी काम के लिए लगा रखी है , चश्मा कब उतार कर ले गए । तुम जान भी ना पाओगे।

👳🏻‍♀-- 😳😳
चलो , कोई बात नही । अब जो होगा देखा जाएगा । यह बताओ वहां घूमने को कोई बाग है ।

👵🏻-- हैं , पर वो भी राजा की माया से बंधे है । वहां गोपियों को तुलसी वेश मे दिन भर रहना पड़ता है और रात में राजा उन सब के साथ नृत्य करता है।

👳🏻‍♀-- रात का दृश्य तो देखने वाला होगा फिर ।

👵🏻-- ना यह भूल मत करना । सुना है वहां जो रात रुक गया वो सही सलामत बाहर नही निकला ।
सन्त , शोधकर्ता सब की समाधियां हैं वहां ।

👳🏻‍♀-- यह कैसा राजा है ??

👵🏻-- बचपन से ही यह राजा ऐसा है , सुना है 5 दिन का था तो दूध पिलाने आई एक राक्षसी को मार डाला था ।
इतना शरारती कि खेल खेल में जहरीले नाग को मार डाला ।
यह तो बचपन से ही लुटेरा है , बेचारी ग्वालने अपने बच्चों को माखन नही देती थी ताकि राजा कंस का कर चुका सकें और यह छोरा उनका माखन लूट कर अपने साथियों को खिला देता था , ऐसा जादू करता था कि नंदगांव के छोरे अपने ही घर को लुटवाते थे।

👳🏻‍♀-- बच्चे तो कच्चे होते हैं उनको तो कोई भी छका सकता है ।

👵🏻-- वो तो बड़े से बड़े का मन लूट लेता है ।
उसके काले स्वरूप से आंख मत मिला लेना । पता नहीं कया जादू है उन आंखों में कि मनुष्य बांवरा होकर सड़कों पर नाचने लगता है ।
खुद की सुध नही रहती , बस जी चाहता है कि उसी की

 नगरी में रम जाऊं और अगर परिजन तुम्हारी देह को वहां से ले भी आते हैं तो भी मन वापिस नही आता ।
दिल में बैठ कर घर आ जाता है वो छलिया और फिर खूब नाच नचाता है।
पहले सारे परिजनों को दीवाना करता है फिर मित्रों को और फिर सारे नगर को । छूत के रोग की तरफ फैल जाता है और सबको लूट लेता है ।

👳🏻‍♀ 🤔🤔🤔🤔🤔🤔

👵🏻 कया सोच रहे हो जाऊं या नही ?
मेरा कर्तव्य था बताना , अब तुम्हारी मर्जी , पर जब भी जाओगे मुझे साथ ले लेना । उस छलिये ने मुझे भी लूट रखा है , सोच रही हूँ फिर से चली ही जाऊं

जय श्री कृष्णा जी🙏
जय श्री राधे राधे जी🙏

Tuesday, May 24, 2022

बरसाना परिक्रमा

बरसाना आएं तो परिक्रमा अवश्य लगाएं

ब्रज के धर्म स्थलों पर परिक्रमा का महत्व होता है। गोवर्धन की गिरिराज परिक्रमा तो बहुत प्रसिद्ध है। मथुरा, वृंदावन आदि स्थानों पर भी परिक्रमा होती है। बरसाना की जो परिक्रमा है वह गहवरवन परिक्रमा है। कहते हैं कि बरसाना की एक परिक्रमा गोवर्धन की सात परिक्रमा के समान फलदाई है।

करीब एक कोस की है यह परिक्रमा

सांकरी खोर में पहुंचने से पहले परिक्रमा मार्ग।


बरसाना की परिक्रमा से यहां के अधिकांश मंदिरों के दर्शन होते हैं। परिक्रमा जहां से शुरू होती है वहीं पर समाप्त होती है। ज्यादातर भक्त यह परिक्रमा मुख्य बाजार से शुरू करते हैं। बाजार से थाना मार्ग पर यह परिक्रमा आगे बढ़ती है। थाना पहुंचने के बाद रास्ता सांकरी खोर की तरफ जाता है। यहां शीतला माता का मन्दिर स्थित है। यह मन्दिर परिक्रमा के बायीं ओर है। यहां भक्तजन दर्शन करते हैं। 

राधा की नगरी में करें राम के दर्शन

राम मंदिर सांकरी खोर।

यहां एक घाटी है जिसके बायीं तरफ विलासगढ़ की पहाड़ी है। दायीं तरफ कुशल बिहारी मंदिर है। यहां दायीं ओर बड़े बड़े रेतीले टीले हैं। दरअसल यह समूचा बरसाना नगर रेतीले टीलों पर ही बसा हुआ है। यहां के गलियों में हो उतार चढ़ाव दिखता है उसकी वजह उनके नीचे दबे रेत के टीले ही हैं। थोड़ा आगे बढ़ने पर दायीं ओर के रेतीले टीलों से आगे राम मंदिर स्थित है। राम मंदिर के दर्शन कर आगे बढ़ने पर सांकरी खोर आती है। 

यहां पर होती हैं मटकी फोड़ लीला

ये है सांकरी खोर। जहां एक बार मे एक ही व्यक्ति निकल पाता है।

यह सांकरी खोर एक तंग घाटी है। इसके बायीं तरफ विलासगढ़ की पहाड़ी है और दायीं तरफ मोरकुटी की पहाड़ी। इन पहाड़ियों पर मन्दिर बने हुए हैं। ये जो सांकरी खोर है यह मटकी लीला का स्थान है। कहते हैं द्वापर में श्रीकृष्ण ने इस स्थान पर गोपियों की दही से भरी मटकी यहां तोड़ी थी। हर वर्ष भादों के महीने में यहां मटकी फोड़ लीला आयोजित होती है। इन दोनों पहाड़ियों पर रास मंडप बने हुए हैं। रासलीला के दौरान यहां राधा-कृष्ण के स्वरूप विराजते हैं। 

राधा सरोवर और गहवरवन को करें प्रणाम

गहवर वन का राधा सरोवर।



यहां से आगे परिक्रमा चिकसोली गांव में पहुंचती है। यह राधा रानी की सहेली चित्रा सखी का गांव है।चिकसोली की गलियों से आगे गहवरवन स्थित है। यहां राधा रस मन्दिर और राधा सरोवर दर्शनीय हैं। यहां से मोरकुटी और मान मन्दिर के शिखरों तक जाने के रास्ते हैं। राधा सरोवर बहुत गहरा है। परिक्रमा करने वाले श्रद्धालु इसके दर्शन अवश्य करते हैं। लोग इसे गहवर कुंड भी कहते हैं। मोरकुटी की पहाड़ी और मान मन्दिर की पहाड़ी के बीच की तंग घाटी में जो वृक्षावली है यही गहवरवन है। 

गहवरवन में बंदरों से रहें सावधान

महाप्रभु जी की बैठक के सामने परिक्रमा मार्ग।


यहां से परिक्रमा वापसी की दिशा में मुड़ती है। आगे चलने पर महाप्रभु बल्लभाचार्य जी की बैठक स्थित है। यहां दोनों तरफ ऊंची ऊंची पहाड़ियां दिखती हैं। इस क्षेत्र में बन्दर भी बड़ी संख्या में मिलते हैं। यहां श्रद्धालुओं को बंदरो से सावधान रहना पड़ता है। बहुत से श्रद्धालु इन बंदरों को खिलाने के लिए फल लेकर आते हैं। 

ऊंचे पर्वत पर गहरा कुंआ ‘आश्चर्य’

जयपुर मन्दिर से पहले परिक्रमा मार्ग।



आगे दायीं तरफ एक रास मंडल स्थित है। यह बहुत प्राचीन है। यहां प्रतिदिन रास लीला होती है। यहां एक कुंआ भी है जो बहुत गहरा है। 
इसके आगे चलकर बायीं तरफ बहुत से संतों की समाधियां दिखती हैं। दायीं  तरफ दानगढ़ मन्दिर हैं। यहां भक्तजन दान बिहारी के दर्शन करते हैं। इस मंदिर के आगे एक पत्थर का बना प्राचीन झूला स्थित है। 

कुशल बिहारी मंदिर है भव्य

कुशल बिहारी मंदिर।



यहां से आगे कुशल बिहारी मंदिर पड़ता है। कुशल बिहारी मंदिर राजस्थान सरकार का मन्दिर है। गाड़ियों से आने का रास्ता भी यहां तक आता है। यहां पार्किंग और केंटीन की सुविधा उपलब्ध है। यहां से आगे का रास्ता लाड़लीजी के मन्दिर की ओर जाता है। यहां परिक्रमा मार्ग अपेक्षाकृत चौड़ा है। उद्यान विभाग की देख रेख की वजह से यहां हरियाली भी बनी हुई है। थोड़ा आगे चलकर दायीं तरफ स्वामी जी का स्थान है। 

स्वामी को प्रणाम अवश्य करें

स्वामीजी के दर्शन।

स्वामी जी लाड़लीजी मन्दिर के गोस्वामीजनों के पूर्वज हैं। इनका पूरा नाम नारायण दास स्वामी जी था। ये नारायण भट्टजी के शिष्य थे। भट्टजी ने लाड़लीजी की प्रतिमा का प्राकट्य किया था। उन्होंने बाद में लाड़लीजी मन्दिर की सेवा का दायित्व स्वामीजी को सौंप दिया था। पिछले करीब पांच सौ वर्ष से स्वामीजी के वंशज गोस्वामीजन ही लाड़लीजी की सेवा करते आ रहे हैं।

यहां विराजती हैं वृषभानु की दुलारी

लाड़लीजी मन्दिर, बरसाना।



आगे चलकर हम पहुंचते हैं लाड़लीजी मन्दिर। यह मुख्य मंदिर है। यहां दर्शन के उपरांत मन्दिर के पीछे से होते हुए सिंघपौर तक जाते हैं। सिंघपौर पर गोमाता का मन्दिर है। यहां बगल में ही श्री राधाजी के चरण चिन्ह के भी दर्शन हैं। यहीं ब्रह्मा जी का भी मन्दिर है। 

नीचे उतरने के लिए हैं सीढियां

सिंघपौर से नीचे उतरने के लिए सीढियां।



सिंघपौर से नीचे उतरने के लिए सीढियां हैं। यहां से नीचे तक करीब 180 सीढियां है। इनसे नीचे आते समय रास्ते में कई दर्शनीय स्थल हैं। थोड़ा नीचे आने पर हनुमानजी का मन्दिर है। यहीं पर नागाजी की कुटी भी है। 

राधा रानी के दादी-बाबा का प्राचीन मंदिर

राधाजी के दादी बाबा का मन्दिर।



और नीचे आने पर राधाजी के दादी-बाबा का मन्दिर है। यहां से सीढियां दो भागों में बंट जाती हैं। दायीं और कि सीढियां रंगीली गली में जाती हैं। बायीं तरफ की सीढ़ियां सुदामा चौक की तरफ जाती हैं। परिक्रमार्थियों को सुदामा चौक की तरफ जाना चाहिए। इन सीढ़ियों पर आगे साक्षी गोपाल मंदिर, दाऊजी मन्दिर आदि स्थान दर्शनीय हैं। 

और आप पहुँच गए सुदामा चौक

सुदामा चौक पहुंचकर समाप्त होती हैं सीढियां।



नीचे पहुंचने पर सुदामा चौक है। यहां एक प्राचीन कुआं दर्शनीय है। यहां सुदामा जी का मन्दिर बना है। यहीं पर पथवारी देवी का मन्दिर भी है। थोड़ा आगे वृषभानु जी मन्दिर और अष्टसखी मन्दिर पड़ते हैं। इनसे आगे बाजार की और चलकर लड़ैती लाल मन्दिर है। इसके आगे चलने पर रंगीली गली चौक, गंगा मन्दिर, गोपाल जी मन्दिर और श्यामा श्याम मन्दिर के दर्शन करते हुए श्रद्धालु मुख्य बाजार में पहुंचते हैं। यह वही स्थान है जहां से परिक्रमा शुरू की थी। 


Tuesday, February 1, 2022

पृथ्वी का मान भंग करना

सनन्द जी कहते हैं कि पृथ्वी का मान भंग करने के लिए श्री भगवान ने ब्रज मंडल ही उन्हे सबसे पहले दर्शाया था। बात उस वक्त की है जब वाराह कल्प में जब श्री हरि वराह रूप में पृथ्वी का उद्धार करने के लिए हिरण्याक्ष का वध करके पृथ्वी को रसातल से उठाकर ला रहे थे। इस समय उनकी दृष्टा के अग्र भाग पर सुशोभित पृथ्वी को सर्वश्रेष्ठ स्थान पर स्थापित होने का मान हो गया। 

उस समय पृथ्वी ने श्री भगवान से पूछा, ‘‘ हे प्रभो ! इस समय सारा विश्व जलमग्न दिखाई दे रहा है। आप किस स्थल पर मेरी स्थापना करेंगें। ’’ 

इस पर वराह भगवान बोले, ‘‘हे नितम्बिने ! जब जल में उद्वेग भाव प्रकट हो तथा वृक्ष दिखाई देने लगें। तब उसी स्थान पर तुम्हारी स्थापना होगी। तुम वृक्षों को देखती चलो।’’ 

 इस बात को सुनकर पृथ्वी को बहुत आश्चर्य हुआ। वे श्री भगवान से बोलींं, ‘‘ भगवन ! स्थावर वस्तुओं की रचना तो मेरे ऊपर हुई है। फिर दूसरी धरणी कैसे हो सकती है ? क्योंकि धरणामयी धरणी तो केवल मैं ही हूँ।" 

पृथ्वी इतना कह ही पाई थी कि उन्हे सामने जल में मनोहारी वृक्ष दिखाई देने लगे। इस पर पृथ्वी को पुनः आश्चर्य हुआ। वे पुनः बोलीं, ‘‘ हे देव ! किस स्थल पर ये पल्लव सहित वृक्ष विद्यमान हैं? यह दृश्य मेरे मन में बडा आश्चर्य पैदा कर रहा है। 
कृपया इसका रहस्य बताइये। ’’ 

 इस पर वराह श्रीभगवान बोले, ‘‘हे नितम्बिने ! यह सामने दिव्य भूमि दिखाई दे रही है; वह दिव्य माथुर मंडल है। जो गोलोक की धरती से जुडा है। प्रलयकाल में भी इसका संहार नहीं होता। ’’ 

सनन्द बोले, इस प्रकार पृथ्वी को बडा आश्चर्य हुआ। वह अभिमान शून्य हो गई। इस प्रकार यह व्रजमंडल समस्त लाकों में महाशक्तिशाली है। अतः माथुर मंडल के ब्रजमंडल तीर्थ को तीर्थराज से भी उत्क्रष्ट समझना चाहिए। इस प्रकार कहते हुए भगवान विष्णु ने पृथ्वी को ले जाकर व्यवहार योग्य स्थान पर स्थिर कर अपनी आधार शक्ति का संचार कर दिया। ऐसा ही वर्णन भगवान शिव की नगरी काशी का आता है। वह भी ब्रजमंडल के समान नित्य नगरी है। इस जानकारी से हमें पता चलता है कि ब्रजमंडल अनादि है। इसका कभी संहार नहीं होता। अतः हमें ऐसा मानना चाहिए कि ब्रजमंडल पृथ्वी पर स्थित नहीं बल्कि पृथ्वी इस पर स्थित है। 

मथुरा मंडल धरा पर कब आया

माथुर मंडल अर्थात मथुरा मंडल हमेशा हमेशा के लिए गोलोक से जुडा हुआ है। इसी कारण प्रलयकाल में भी इसका संहार नहीं होता। ऐसा पुराग्रंथों में वर्णन आता है। अतः वृंदावन अनादि काल से धरा को आभूषित कर रहा है। 

जैसा कि हमने आपको बताया था कि नारद जी बताते है कि एक बार वाराह कल्प में श्री हरि वाराह रूप धारण करके अपनी दाढ़ पर पृथ्वी को रसातल से उठा कर ला रहे थे। इस पर पृथ्वी को अभिमान हो गया। उसने देखा कि मैं तो स्वयं भगवान के सबसे ऊपरि भाग पर विराज मान हूँ इसलिए मुझसे बडा भला कौन हो सकता है। इस पर श्री भगवान ने पृथ्वी को माथुर मंडल के दर्शन कराए तथा उसके बारे में बताया। 

यह ब्रज मंडल समस्त लोकों से अधिक महत्वशाली है। ब्रज मंडल का निमार्ण मैंने स्वयं अपने गोलोक से दी गई 84 कोस भूमि से किया है। इस प्रकार हम पाते हैं कि ब्रज 84 कोस का क्षेत्र गोलोक से पृथ्वी पर सनातन रूप में स्थापित है। इसका जन्म व संहार नहीं होता। अतः यह लोक नित्य है।

 मथुरा म ंडल मे ं वृंदावन की स्थिति :- एक बार नन्द के वयोवृद्ध मंत्री 
सनन्द स े नन्द बाबा ने वृंदावन के बार े में पूछा तो उन्होन े बताया कि 
बह्शित से इ र्षान कोण, यदुपुर के दक्षिण तथा षोणपुर के पष्चिमी भाग 
को माथुर मंडल या मथुरा मंडल कहा जाता है। इसके भीतर 20
योजन परिमाण में फैले विस्तृत भूभाग को मनीशियों ने दिव्य माथुर 
मंडल या ब्रज मंडल बताया है। 
 एक बार सनन्द जी वसुद ेव जी घर गए हुए थे। उसी समय 
वार्तालाप में वसुदेव जी के कुलग ुरू महर्शि गर्ग जी ने बताया था कि एक 
बार तीर्थराज प्रयाग ने भी इस माथुर मंडल की पजू ा की थी। इसके
वनों में मनोहारी वृंदावन स्थित है। कहा जाता है कि बैकुण्ठ से बढ़कर 
कोई लोक नहीं है परंतु धरा पर स्थित वृंदावन बैकुण्ठ से कम नहींं ह।ै
यहाँ गोवर्धन पर्वत ह।ै कालिन्दी के मंगल पुलिन हैं। वृहत्सानु
(बरसाना) पर्वत तथा नन्दीष्वर गिरि षोभायमान हैं। जो 24 कोस 
विस्तार में विषाल काननों, वनों तथा लता कुंजों से आवृत वन ही 
वृंदावन है।
श्री वल्लभाचार्य जी और कृश्ण भक्ति : - श्री वल्लभाचार्य जी का स्थल 
गोवर्धन परिक्रमा में ही पडता है। कहते हैं कि यहाँ पर श्रीनाथ जी 
प्रकट हुए थे। ऐसा भी कहा जाता है कि एक बार श्री वल्लभाचार्य जी 
को भगवान श्रीनाथ जी ने स्वप्न में दर्षन दिए। सपने में दर्षनों के बाद 
वल्लभाचार्य जी न े कृश्ण जी भक्ति और प्रचार-प्रसार का कार्य षुरू कर 
दिया। श्री वल्लभाचार्य जी से जुडे होने के कारण वल्लभ स ंप्रदाय के 
लोग आज भी गोवर्धन पर्वत परिक्रमा के लिए आते रहते हैं। यद्धपि 
यहाँ पर भक्तों को आना जाना पूर े वर्श लगा रहता है। परंतु पूर्णिमा के 
समय यहाँ पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है। 
उपासना म ें 11 अपराध : - परिक्रमा भी उपासना का एक रूप है। 
उपासना में किए गए कुकार्य, अपराध आदि पापों को जन्म देते हैं। 
अतः परिक्रमा में कुकार्यो से बचना चाहिए। पाप को जन्म देन े वाले 
अपराध निम्न लिखित हैं : - 01ण् भगवान के मन्दिर म ें या भगवान के 
सामने सवारी या वाहन सहित प्रवेष करना। 02ण् भगवान के मन्दिर में 
भगवान के सामने खड़ाऊँ, जूते, चप्पल आदि पहनकर प्रवेष करना। 
03ण् भगवान के मन्दिर में या भगवान के सामने माँस, मछली, मदिरा आदि तामसिक भोजन व षयन करना। 04ण् भगवान के मन्दिर में 
भगवान के सामने जोर से वार्तालाप, कटुवचन, बोलना, अषलील भाशण 
करना, किसी की निन्दा करना, लड़ना-झगड़ना व घर-बार व कारोबार 
की बाते करना आदि। 05ण् भगवान के मन्दिर में या भगवान के सामने 
झूठ बोलना, अपनी प्रषंसा करना। 06ण् भगवान के मन्दिर में या 
भगवान के सामने भगवान को छोड़कर दूसरों को प्रणाम करना, उनकी 
ओर पैर करके या पैर फैलाकर बैठना। 07ण् भगवान के मन्दिर में या 
भगवान के सामने या भगवान के श्री विग ्रह के पास कोई कुकर्म करना, 
षौंच आदि जाना व अपान वायु (पाद) छोड़ना। 08ण् भगवान के मन्दिर
में या भगवान के सामने कुर्सी, तख्त या चारपाई पर बैठना। 09ण्
भगवान के मन्दिर में या भगवान के सामने पूजा पाठ न करना। 10ण्
भोजन से पूर्व भगवान को भोग न लगाना व भोग लगाकर स्वयं प्रसाद 
ग्रहण न करना। 11ण् अपने ईश्ट देव या भगवान या धर्म ग ्रंथों की 
निन्दा स ुनना व निन्दा करना।


Tuesday, January 25, 2022

दशावतार और विज्ञान

🌳🦚💐💐दशावतार और विज्ञान💐💐🌳🦚


       एक माँ अपने पूजा-पाठ से फुर्सत पाकर अपने विदेश में रहने वाले बेटे से विडियो चैट करते वक्त पूछ बैठीं..

*"बेटा! कुछ पूजा-पाठ भी करते हो या नहीं?"*

बेटा बोला-

"माँ, मैं एक जीव वैज्ञानिक हूँ । मैं अमेरिका में मानव के विकास पर काम कर रहा हूँ। विकास का सिद्धांत, चार्ल्स डार्विन.. क्या आपने उसके बारे में सुना भी है?"

उसकी माँ मुस्कुरा कर बोली-
"मैं डार्विन के बारे में जानती हूँ बेटा.. उसने जो भी खोज की, वह वास्तव में सनातन-धर्म के लिए बहुत पुरानी खबर है।"
“हो सकता है माँ!” बेटे ने भी व्यंग्यपूर्वक कहा।
“यदि तुम कुछ होशियार हो, तो इसे सुनो..” उसकी माँ ने प्रतिकार किया। “क्या तुमने दशावतार के बारे में सुना है? विष्णु के दस अवतार?”
बेटे ने सहमति में कहा-
"हाँ! पर दशावतार का मेरी रिसर्च से क्या लेना-देना?"
माँ फिर बोली-
"लेना-देना है.. मैं तुम्हें बताती हूँ कि तुम और मि. डार्विन क्या नहीं जानते हैं?"
.
“पहला अवतार था 'मत्स्य', यानि मछली। ऐसा इसलिए कि जीवन पानी में आरम्भ हुआ। यह बात सही है या नहीं?”
बेटा अब ध्यानपूर्वक सुनने लगा..
“उसके बाद आया दूसरा अवतार 'कूर्म', अर्थात् कछुआ। क्योंकि जीवन पानी से जमीन की ओर चला गया.. 'उभयचर (Amphibian)', तो कछुए ने समुद्र से जमीन की ओर के विकास को दर्शाया।”
“तीसरा था 'वराह' अवतार, यानी सूअर। जिसका मतलब वे जंगली जानवर, जिनमें अधिक बुद्धि नहीं होती है। तुम उन्हें डायनासोर कहते हो।”
बेटे ने आंखें फैलाते हुए सहमति जताई..

“चौथा अवतार था 'नृसिंह', आधा मानव, आधा पशु। जिसने दर्शाया जंगली जानवरों से बुद्धिमान जीवों का विकास।”
“पांचवें 'वामन' हुए, बौना जो वास्तव में लंबा बढ़ सकता था। क्या तुम जानते हो ऐसा क्यों है? क्योंकि मनुष्य दो प्रकार के होते थे- होमो इरेक्टस(नरवानर) और होमो सेपिअंस (मानव), और होमो सेपिअंस ने विकास की लड़ाई जीत ली।”
बेटा दशावतार की प्रासंगिकता सुन के स्तब्ध रह गया..

माँ ने बोलना जारी रखा-
“छठा अवतार था 'परशुराम', जिनके पास शस्त्र (कुल्हाड़ी) की ताकत थी। वे दर्शाते हैं उस मानव को, जो गुफा और वन में रहा.. गुस्सैल और असामाजिक।”
“सातवां अवतार थे 'मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम', सोच युक्त प्रथम सामाजिक व्यक्ति। जिन्होंने समाज के नियम बनाए और समस्त रिश्तों का आधार।”
“आठवां अवतार थे 'भगवान श्री कृष्ण', राजनेता, राजनीतिज्ञ, प्रेमी। जिन्होंने समाज के नियमों का आनन्द लेते हुए यह सिखाया कि सामाजिक ढांचे में रहकर कैसे फला-फूला जा सकता है।”
बेटा सुनता रहा, चकित और विस्मित..

माँ ने ज्ञान की गंगा प्रवाहित रखी -
“नवां अवतार थे 'महात्मा बुद्ध', वे व्यक्ति जिन्होंने नृसिंह से उठे मानव के सही स्वभाव को खोजा। उन्होंने मानव द्वारा ज्ञान की अंतिम खोज की पहचान की।”
“..और अंत में दसवां अवतार 'कल्कि' आएगा। वह मानव जिस पर तुम काम कर रहे हो.. वह मानव, जो आनुवंशिक रूप से श्रेष्ठतम होगा।”
बेटा अपनी माँ को अवाक् होकर देखता रह गया..

अंत में वह बोल पड़ा-
“यह अद्भुत है माँ.. हिंदू दर्शन वास्तव में अर्थपूर्ण है!”

*प्रकृति के तीन नियम, जो शाश्वत  है !!*

*1.)* प्रकृति का पहला नियम यदि खेत में बीज न डालें जाएं, तो कुदरत उसे *घास-फूस* से भर देती है! ठीक उसी तरह से दिमाग में अगर *सकारात्मक* विचार न भरे जाएँ, तो *नकारात्मक* विचार अपनी जगह बना ही लेते हैं !! 

*2.)* प्रकृति का दूसरा नियम जिसके पास जो होता है, वह वही बांटता है !
• सुखी *सुख* बांटता है !
• दुःखी *दुःख* बांटता है !
• ज्ञानी *ज्ञान* बांटता है !
• भ्रमित *भ्रम* बांटता है !
• भयभीत *भय* बांटता हैं !

*3.)* प्रकृति का तीसरा नियम आपको जीवन में जो भी मिले, उसे *पचाना* सीखो क्योंकि -
• *भोजन* न पचने पर, रोग बढ़ते हैं!
• *पैसा* न पचने पर, दिखावा बढ़ता है!
• *बात* न पचने पर, चुगली बढ़ती है!
• *प्रशंसा* न पचने पर, अंहकार  बढ़ता है!
• *निंदा* न पचने पर, दुश्मनी बढ़ती है!
• *राज़* न पचने पर, खतरा बढ़ता है!
• *दुःख* न पचने पर, निराशा बढ़ती है!
• *सुख* न पचने पर, पाप बढ़ता हैं!
 *यही जीवन के सत्य हैं*🌹🙏🌹🙏🌹

वृंदावन परिक्रमा (vrindavan parikrama )


वृंदावन की परिक्रमा के बारे में जानने से पहले एक बात हम सभी को जान लेनी चाहिए कि भारतीय संस्कृति समय-समय पर हमें अध्यात्म से जोड़ने की बात करती है। अध्यात्म हमारे मन को पवित्र बनाता है और हमें एक शक्ति देता है जिससे हम जीवन की हर कठिनाई से लड़ सके और प्रेम के साथ जीवन का निर्वाह कर सकें। वृंदावन की परिक्रमा( vrindavan parikrama) अध्यात्म से जुड़ी परिक्रमा है भक्त और भगवान से जुड़ी हुई परिक्रमा है। आज हम वृंदावन की परिक्रमा के बारे में जानेंगे क्यों यह अपनी जगह पर महत्वपूर्ण रखता है क्यों इस पीढ़ी को और आने वाली पीढ़ी को इसके महत्व की गहराई को समझना चाहिए। vrindavan parikrama in hindi

“जानकारी अच्छी लगे तो सभी से शेयर जरूर करे क्युकी आज हमारी खोती हुई भारतीय संस्कृति जो विरासत में मिली उसको को प्रसार की जरुरत है जिससे आने वाली पीढ़ियों तक इसकी चमक पहुंच सके। और अपनी मातृभाषा हिंदी पे हमेशा गर्व कीजिये और इसका सम्मान-प्रसार जरूर कीजिये। “


वृंदावन परिक्रमा क्या है?:-

वृंदावन परिक्रमा को पंचकोसी परिक्रमा भी कहा जाता है। वृंदावन की परिक्रमा भक्तों के लिए वृंदावन परिक्रमा है। वृन्दावन जो श्री कृष्णा की बाल लीलाओ से भरा है। श्री राधा कृष्ण की दिव्य प्रेम लीला स्थली से परिपूर्ण है। जहाँ गोप गोपियों और ग्वाल वाल के साथ श्री कृष्णा ने बचपन में क्रीड़ा किया और अनन्य प्रसिद्द मंदिरो का संगम है। अगर कोई वृन्दावन के किसी भी प्रसिद्द स्थली परिक्रमा शुरू करे और इन सभी वृन्दावन की श्री कृष्णा की लीला और पारौणिक स्थान के चारो तरफ के मार्ग पे चलकर वापस उसी स्थान पे आ जाता है। तो उसे वृन्दावन परिक्रमा (vrindavan parikrama) कहते है। जो की पंचकोसी परिक्रमा है। इसे युगल सरकार (राधा-कृष्ण का एक मिश्रित रूप ) या साक्षात् राधा कृष्ण की परिक्रमा भी कहते है।

वृन्दावन परिक्रमा कब की जाती है ?

वृंदावन परिक्रमा, वृंदावन, उत्तर प्रदेश, भारत में आमतौर एकादशी पर किया जाता है। वैसे एक भक्त अपने भगवान की जब चाहे परिक्रमा कर सकता है। भक्ति भाव के लिए कोई दिन नहीं अपितु आपके भाव की निर्मलता जरुरी होती है। वृन्दावन बिहारी को सिर्फ आपका प्रेम भाता है। भक्त 10 किलोमीटर (6 मील) लंबी परिक्रमा पथ पर आते हैं। वृंदावन के चारों ओर परिक्रमा करने के लिए दो से तीन घंटे लगते हैं।


ग्रंथ में वृन्दावन परिक्रमा का वर्णन :-

भविष्य पुराण में वृंदावन की परिक्रमा पांच कोस की बताई गई है। वराह संहिता में रास स्थली वृंदावन की परिधि एक योजना बताई गई है। किंतु वृंदावन की वर्तमान परिक्रमा साढ़े 3 कोस की है। वर्तमान परिक्रमा प्राय सूर्य घाट से प्रारंभ होती है। यह परिक्रमा नंगे पांव करना जरूरी है। अनंत गुना फल इसका प्राप्त होता है।

वृंदावन PARIKRAMA मार्ग:-

यह रास्ता बांके बिहारी जी मंदिर से एक सड़क पर है।या आप इसे कालिया घाट से शुरू कर सकते है। न समझ ए तो किसी वृन्दावन वासी संत से या निवासी से आप सहज पूछ सकते है। सब वहाँ बहुत ही सरल सवभाव के है। वृंदावन परिक्रमा में आमतौर पर दो से तीन घंटे लगते हैं। परिक्रमा पथ 10 किमी (6 मील) है। रास्ते में गुजरने वाले कुछ स्थान हैं: यमुना जी के तट पर मदन टेर, कालिया घाट, मदना मोहना मंदिर, इमली ताला, श्रृंगारा वट, और केशी घाट, यमुना महारानी आदि, फिर शेष घाट से धीरा समीरा, टटिया स्थन आदि।

श्री वृन्दावन सो वन नहीं, श्री नंदगाँव सो गाँव ||

श्री बंसीवट सो वट नहीं, श्री कृष्ण नाम सो नाम ||.


परिक्रमा में बारह वन (वन) और चौबीस उपवन (उपवन) शामिल हैं।:-

बारह वन हैं:-

  1. बाहुलवन
  2. बेलवन,
  3. भद्रवन,
  4. भंडिरावन,
  5. कामवन,
  6. खदिरवन,
  7. कुमुदवन,
  8. लोहवन,
  9. महावन,
  10. मधुवन,
  11. तलवन
  12. और वृंदावन

चौबीस उपवन (उपवन) :-

  1. बद्री,
  2. अजनोक,
  3. अरिंग,
  4. बरसाना,
  5. बछावन,
  6. बिल्छू,
  7. दधिग्राम,
  8. गंधर्ववन,
  9. गोकुल,
  10. गोवर्धन,
  11. करहला,
  12. केलवन,
  13. कोकिलावन,
  14. कोटवन,
  15. चटाई,
  16. नंदग्राम,
  17. पारसोली,
  18. परमदरा,
  19. पिसाया,
  20. रावल,
  21. साकेत,
  22. श्रीसाई,
  23. श्रीसाई।
  24. निधिवन

कुछ महत्वपूर्ण मंदिर, वन और घाट जो की परिक्रमा मार्ग पे देखने को मिलते है।

  • कृष्ण बलराम मंदिर
  • गौतम ऋषि का आश्रम
  • वराह घाट
  • मोहना टेर
  • कालिया घाट
  • मदन मोहन मंदिर
  • इमली ताल
  • श्रृंगारा वट
  • केशी घाट
  • टेकरी रानी मंदिर
  • जगन्नाथ मंदिर, जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा के देवताओं के साथ
  • चैतन्य महाप्रभु मंदिर

परिक्रमा के मार्ग के साथ कई अन्य मंदिर और मूर्तियाँ हैं, जिनमें से कुछ मुगल हमले के दिनों से टूटी-फूटी स्थिति में हैं। परिक्रमा के अंत में, देवता और यमुना के तट पर जलाए जाने वाले दीपक की प्रार्थना की जाती है।

वृंदावन के छह गोस्वावृंदावन को फिर से परिभाषित करने का श्रेय इन गोस्वामियों को जाता है, जिन्हें वृंदावन के छह गोस्वाम कहा जाता है, जिनके बारे में व्यापक शोध किया गया है। और किताबें प्रकाशित हुई हैं। चर्मपत्र के पत्तों पर लिखे गए छह में से कुछ मूल लेखन को वृंदावन अनुसंधान संस्थान में संरक्षित और प्रदर्शित किया गया है।

वृंदावन परिक्रमा के नियम:-

  • वृंदावन परिक्रमा प्रेम भक्ति भाव समर्पण की परिक्रमा है .
  • यहां पर हर एक पग श्री कृष्ण को श्री राधे नाम को सुमिरन करते हुए रखनी चाहिए।
  • उनसे हर श्वास पे एक ही विनती करनी चाहिए उनके चरण कमलों की भक्ति मिले और हमारा मन हमेशा निर्मल भाव से भरा रहे। हमसे कभी भी किसी का अहित ना हो जीवन में।
  • परिक्रमा मार्ग पर मंत्र जाप करते हुए चलना चाहिए
  • याद रहे परिक्रमा मार्ग पर आप से किसी का अपमान ना हो।
  • परिक्रमा मार्ग में परिक्रमा करते समय हमें कुछ खाना नहीं चाहिए
  • परिक्रमा नंगे पांव करें अगर आप कर सकते हैं तो
  • क्योंकि ब्रजराज आपके चरणों पर जब-जब ब्रजराज आपके पैरो को स्पर्श होगा आपको भक्ति-आनंद का अनुभव होगा।
  • परिक्रमा करते समय आसपास के जितने दिव्य स्थल पड़ते है उनको प्रणाम जरूर करे।
  • आज वृन्दावन का थोड़ा आधुनिक स्वरुप हो गया है उसे देख कर परिक्रमा करते समय यह बिल्कुल नहीं सोचना चाहिए कि वृंदावन मैं पहले जैसी बात नहीं बस हमेशा याद रखें वृंदावन प्रेम की भक्ति की भूमि है। अगर आपका मन सच्चा है तो वृंदावन बिहारी आपको इस वृंदावन में 1 दिन दिव्य वृंदावन का दर्शन जरूर करवाएंगे .
  • राधे राधे नाम का जितना हो सके उच्चारण जरूर करे।

वृन्दावन प्रथम बार :-

अगर आप वृन्दावन प्रथम बार आए हैं पहली बार आए हैं तो आपको वृंदावन की महिमा के बारे में जरूर जाना चाहिए वृंदावन के प्रसिद्ध मंदिर के बारे में जरूर जाना चाहिए। यहां पर जितने भी मंदिर है उनका श्री कृष्ण से नाता है वह उनकी लीला को सुमिरन करते हुए बनाया गया है। जिस जगह श्री कृष्ण ने जो लीला की थी उस लीला से को ध्यान में रखकर कई युगों पहले इन मंदिरों की नींव रखी गई जिससे कि आने वाली पीढ़ी इसके महत्व को समझ सके श्री कृष्ण के जीवन के अनमोल ज्ञान भक्ति को फिर से जी सकें और उससे प्रेम भक्ति को प्राप्त कर अपने जीवन को निर्मल बना सकें। सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करने के लिए यहाँ क्लिक करे वृंदावन

नोट : अगर आप कुछ और जानते है या इसमें कोई त्रुटि है तो सुझाव और संशोधन आमंत्रित है।

वृंदावन परिक्रमा कब की जाती है?

आमतौर एकादशी पर किया जाता है। वैसे एक भक्त अपने भगवान की जब चाहे परिक्रमा कर सकता है।

वृंदावन परिक्रमा कितने किलोमीटर की है?

Approx 10Km

वृंदावन परिक्रमा route क्या है ?

बांके बिहारी जी मंदिर से एक सड़क से या आप इसे कालिया घाट या इस्कॉन मंदिर से शुरू कर सकते।

वृंदावन परिक्रमा के लाभ क्या है ?

राधे -कृष्ण के युगल चरणों की भक्ति प्राप्त होती है। बाकि आपकी जो निर्मल कामना होगी उसकी पूर्ति होगी।


🐚वृन्दावन धाम की महिमा🐚


🌹विश्व के सभी स्थानों में श्री धाम वृन्दावन का सर्वोच्च स्थान माना गया है। वृन्दावन का आध्यात्म अर्थ है- "वृन्दाया तुलस्या वनं वृन्दावनं" तुलसी का विषेश वन होने के कारण इसे वृन्दावन कहते हैं।

 🌹वृन्दावन ब्रज का हृदय है जहाँ प्रिया-प्रियतम ने अपनी दिव्य लीलायें की हैं। इस दिव्य भूमि की महिमा बड़े-बड़े तपस्वी भी नहीं समझ पाते। ब्रह्मा जी का ज्ञान भी यहाँ के प्रेम के आगे फ़ीका पड़ जाता है। 

🌹वृन्दावन रसिकों की राजधानी है यहाँ के राजा श्यामसुन्दर और महारानी श्री राधिका जी हैं। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि वृन्दावन का कण-कण रसमय है। 

 🌹सभी धामों से ऊपर है ब्रज धाम और सभी तीर्थों से श्रेष्ठ है श्री वृन्दावन।

 🌺इसकी महिमा का बखान करता एक प्रसंग--

-🌹भगवान नारायण ने प्रयाग को तीर्थों का राजा बना दिया। अतः सभी तीर्थ प्रयागराज को कर देने आते थे। 

एक बार नारद जी ने प्रयागराज से पूँछा-

🌹"क्या वृन्दावन भी आपको कर देने आता है?" तीर्थराज ने नकारात्मक उत्तर दिया। तो नारद जी बोले-"फ़िर आप तीर्थराज कैसे हुए।" 

🌹इस बात से दुखी होकर तीर्थराज  भगवान के पास पहुँचे। भगवान ने प्रयागराज के आने का कारण पूँछा। तीर्थराज बोले-"प्रभु! आपने मुझे सभी तीर्थों का राजा बनाया है। सभी तीर्थ मुझे कर देने आते हैं, लेकिन श्री वृन्दावन कभी कर देने नहीं आये। अतः मेरा तीर्थराज होना अनुचित है।

🌹"भगवान ने प्रयागराज से कहा-

"तीर्थराज! मैंने तुम्हें सभी तीर्थों का राजा बनाया है। अपने निज गृह का नहीं। वृन्दावन मेरा घर है। यह मेरी प्रिया श्री किशोरी जी की विहार स्थली है। वहाँ की अधिपति तो वे ही हैं। मैं भी सदा वहीं निवास करता हूँ। वह तो आप से भी ऊपर है।


🌹एक बार अयोध्या जाओ, दो बार द्वारिका

तीन बार जाके त्रिवेणी में नहाओगे।

चार बार चित्रकूट,नौ बार नासिक,बार-बार जाके बद्रिनाथ घूम आओगे॥

🌹कोटि बार काशी,केदारनाथ रामेश्वर, 

गया-जगन्नाथ, चाहे जहाँ जाओगे।

होंगे प्रत्यक्ष जहाँ दर्शन श्याम श्यामा के, 

वृन्दावन सा कहीं आनन्द नहीं पाओगे॥


🌹कोई भी अनुभव कर सकता है कि वृन्दावन की सीमा में प्रवेश करते ही एक अदृश्य भाव, एक अदृश्य शक्ति हृदय स्थल के अन्दर प्रवेश करती है और वृन्दावन की परिधि छोड़ते ही यह दूर हो जाती है।

🌹इसमें जो वास करता है, भगवान की गोदी में ही वास करता है। परन्तु, श्री राधारानी की कृपा से ही यह गोदी प्राप्त होती है।

 🌺"कृपयति यदि राधा बाधिता शेष बाधा"🌺

 🌹वृहद्गौतमीयतन्त्र में भगवान ने अपने श्रीमुख से यहाँ तक कहा है कि यह रमणीय वृन्दावन मेरा गोलोक धाम ही है- 

🌺"इदं वृन्दावनं रम्यं मम धामैव केवलम"🌺

🌹तो व्रज की महारानी श्री राधारानी हम पर ऐसी कृपा करें कि हमें श्रीवृन्दावन धाम का वास मिले। श्रीवृन्दावन धाम मे वास प्राप्त करने के लिए सदैव सतत जपिए।

        *🙏जय श्री राधा कृष्ण🙏*



🥊 राधाटीला 🥊

🌹 ये वृन्दावन परिक्रमा मार्ग में ठाकुर जी का लीला स्थान है l अगर आप विशुद्ध भाव के साथ यहां आते हैं तो आप भी अपने रोम-रोम में  दिव्याता को पाएंगे। साधना करते विरक्त संतों के अनुभवों को आत्मसात करने में जरा भी संकोच न होगा जो कहते हैं, “यहां राधा रहती है।” शांति के इस धाम में बिहारी विहारिणी का सरस वृंदावन बसता है। संतों ने इस स्थान की पावनता, रमणीयता और दिव्या को भीड़-भाड़ और प्रचार-प्रसार से बचाए रखा है। राधा टीला हरिदासी संप्रदाय की छोटी गद्दी है।

☘ वृंदावन में रोज 4:00 बजे राधा टीला में दाना डाला जाता है और  ...यहाँ आप हजारो की संख्या में कई सारे तोते, मोर, और बहुत ही अद्भुत पक्षियों के दर्शन कर सकते हैं, और वो कोई साधारण पक्षी नही होते हैं वो सभी श्यामा जू के भक्त होते हैं।

☘ कहते है राधाटीला में आज भी यहाँ श्यामा श्याम जूँ लीला करने पधारते है l इसलिये निधीवन और सेवा कुँज की तरह संध्या के बाद यहाँ के दर्शन भी बंद कर दिये जाते है l  कहते है दिन के समय श्यामा श्याम जी पेड का रूप धारण कर लेते है और संध्या में पुनः अपने स्वरूप में प्रकट होते है l आज भी हम ये दर्शन राधाटीला में कर सकते है.. वहाँ एक ही जड से निकले हुए है दो पेड है,  एक जड में से निकले हुये होने के बावजुद भी एक पेड सफेद और एक पेड श्याम वर्ण का है l……… जो स्वयं श्यामा श्याम जी है l

☘ कहते है एक लीला यहाँ यह हुई थी कि एक समय जब श्यामा श्याम जी जब रास कर रहे थे तो ठाकुर जी के भक्त गोपीयों को भुख लगने लगी l तब वहाँ खीर का भोग तो था पंरतु सभी खीर खाये कैसे.??

तब कान्हा जी ने एक पेड के पत्ते को लिया और उसे दोने का आकार दिया ( दोने:- वो जो पत्ते का होता है और प्रसाद वितरण के लिये उपयोग किया जाता है...) फिर सभी ने मिलकर ठाकुर जी के व्दारा बनाये हुये दोनो में खीर ग्रहण कर अपनी भुख शांत की l ठाकुर जी की लीला वश आज भी उस पेड में दोने के आकार में पत्ते आते है l ये दर्शन हम राधाटीला में कर सकते है l 🌹
🙏 #जय_श्री_कृष्ण, #हरि_शरणम् , #प्रेम_से_बोलो_राधे_राधे 🌹


💞 शुद्ध हृदय.......💞

🌷"वृंदावन" में एक भक्त रहते थे जो स्वभाव से बहुत ही भोले थे। उनमे छल, कपट, चालाकी बिलकुल नहीं थी। बचपन से ही वे "श्री वृंदावन" में रहते थे,

 *🌷श्री कृष्ण* स्वरुप में उनकी अनन्य निष्ठा थी और वे भगवान् को अपना सखा मानते थे। बहुत शुद्ध आत्मा वाले थे, जो मन में आता है, वही भगवान से बोल देते है ।

🌷 वो भक्त कभी "वृंदावन" से बाहर गए नहीं थे। एक दिन भोले भक्त जी को कुछ लोग "श्री जगन्नाथ पुरी" में भगवान् के दर्शन करने ले गए। पुराने दिनों में बहुत भीड़ नहीं होती थी। अतः वे सब लोग *श्री जगन्नाथ* भगवान् के बहुत पास दर्शन करने गए । 

🌷भोले भक्त जी ने श्री जगन्नाथजी का स्वरुप कभी देखा नहीं था उसे अटपटा लगा ।

उसने पूछा – ये कौन से भगवान् है ? 

🌷ऐसे डरावने क्यों लग रहे है ? 

 🌷सब पण्डा पूजारी लोग कहने लगे – ये भगवान् *श्री कृष्ण* ही है, प्रेम भाव में इनकी ऐसी दशा हो गयी है

 🌷जैसे ही उसने सुना – वो जोर जोर से रोने लग गया और ऊपर जहां भगवान् विराजमान हैं वहाँ जाकर चढ़ गया । सब पण्डा पुजारी देखकर भागे और उससे कहने लगे कि नीचे उतरो परंतु वह नीचे नहीं उतरा उसने भगवान् को आलिंगन देकर कहा – 

"🌷अरे *कन्हैया* ! ये क्या हालात बना रखी है तूने ? ये चेहरा कैसे फूल गया है तेरा , तेरे पेट की क्या हालत हो गयी है । यहां तेरे खाने पीने का ध्यान नहीं रखा जाता क्या ? मैं प्रार्थना करता हूं , तू मेरे साथ अपने ब्रज में वापस चल । मै दूध, दही , माखन खिलाकर तुझे बढ़िया पहले जैसा बना दूंगा , सब ठीक हो जायेगा तू चल ।

🌷पण्डा पुजारी उन भक्त जी को नीचे उतारने का प्रयास करने लगे , कुछ तो नीचे से पीटने भी लगे परंतु वह रो - रो कर बार - बार यही कह रहा था कि कन्हैया , तू मेरे साथ "ब्रज" में चल , मै तेरा अच्छी तरह ख्याल करूँगा । तेरी ऐसी हालत मुझसे देखी नहीं जा रही । 

🌷अब वहाँ गड़बड़ मच गयी तो भगवान् ने अपने माधुर्य *श्रीकृष्ण* रूप के उसे दर्शन करवाये और कहा – भक्तों के प्रेम में बंध कर मैंने कई अलग-अलग रूप धारण किये हैं, तुम चिंता मत करो । जो जिस रूप में मुझे प्रेम करता है मेरा दर्शन उसे उसी रूप में होता है , मै तो सर्वत्र विराजमान हूँ । 

🌷उसे *श्री जगन्नाथजी* ने समझा बुझाकर आलिंगन वरदान किया और आशीर्वाद देकर वृंदावन वापस भेज दिया । इस लीला से स्पष्ट है कि जिसमे छल कपट नहीं है। 

🌷जो *शुद्ध हृदय* वाला भोला भक्त है, 

उसे *भगवान् सहज मिल जाते है...जय जय श्री श्री राधेकृष्ण जी।🙏


ठाकुर जी का दर्शन कैसे करना चाहिए


भगवान् के सामने आँख मूँद के खड़े हो जाते हैं 

दर्शन नहीं - निहारो, ठाकुरजी को निहारो। चरण से लेकर मुख पर्यन्त और मुख से लेकर चरण पर्यन्त। बार-बार छवि को निहारो। 

जरुरी नहीं कि 10-15 मंदिरों में जाए, एक जगह दर्शन करो लेकिन निहारो और 

जब प्रेमपूर्वक ठाकुरजी को आप निहारने लग जाएंगे तो मंदिरों में ही नहीं आप के घर के ठाकुरजी में ही आपको विविध अनुभूतियाँ होने लगेगी ! 

कभी लगेगा हमारे ठाकुरजी आज थोड़े गंभीर हैं, कभी लगेगा आज थोड़े अनमने से हैं, कभी लगेगा नजर से नजर तो मिलती है लेकिन वे शरमा रहे हैं। और फिर तन्मयता बढ़ेगी तो वे बातचीत भी करने लगेंगे !


🙇🏻‍♂️!! श्री हरि !!🙇🏻‍♂️



वृंदावन के बंदर चार चीजों को छीनते हैं पर, क्यूं छीनते हैं आइये एक भाव दृष्टिपात करें।

1. चप्पल-जूते –

तो भैया वृंदावन में आए हो तो वृंदावन हमारे प्रियालालजू की नित्य क्रीडा स्थली है नित्य विहार स्थली हैं जहां श्यामा श्याम नंगे पैर विचरण करते हैं। अतः उस रज पर जूते चप्पल पहन कर नही चलना है यही संदेश बंदर देते हैं।


 2. चश्मे को छीनते हैं –

तो वृंदावन में पधारे प्यारे प्रेमियों वृंदावन को बाह्य नेत्रों से दर्शन करने की आवश्यकता नही है।

बाह्य नेत्र से कहीं गंदगी देखोगे कहीं अपशिष्ट देखोगे  और घृणा करोगे अपराध बनेगा।

अतः उस दिव्यतम श्री धाम वृंदावन का दर्शन अांतरिक नेत्रों से करो। दिव्य यमुना रसरानी जी का दर्शन करो।


3. मोबाइल –

भाव - अरे प्यारे भाइयों बडे-बडे योगी यति भी वृंदावन आने के लिए तरसते हैं।

श्रीजी की चरण रज बृज रज के लिए बड़े-बड़े देव तरसते हैं।


यथा पद में स्वामी हरिराम व्यास जी महाराज कहते हैं-

"जो रज शिव सनकादिक याचत सो रज शीश चढाऊं।"

तो वृंदावन मे आकर भी बाह्य जगत से संपर्क बनाने का क्या मतलब.?

तन वृंदावन में और मन कहाँ मोबाइल में,

अतः तन-मन दोनों को वृंदावन में केन्द्रित करें।


4. पर्स –

भाव- माया को साथ लेकर चलने की आवश्यकता नहीं है।

क्यूंकि यह भजन की भूमि है।

यहां पर्स दिखाने की आवश्यकता नहीं।

माला झोली पर्याप्त है।

अधिक वैभव प्रदर्शन करने की आवश्यकता नहीं।

क्यूंकि ये शुद्ध माधुर्य लीला की भूमि है।

प्रत्येक कण-कण प्रिया लाल जू के रस से आप्लावित है।


चूंकि भाव बहुत से हैं।

परंतु प्रमुख भावों पर चर्चा की।


तो ये बंदर कुछ संदेश देते हैं,

परंतु उनके साथ इस प्रकार का बर्ताव,

सर्वथा अनुचित एवं जघन्य अपराध है।


                 🌹 धन धन वृंदावन के बंदर  🌹


                    🌹जय जय श्री वृंदावन🌹


प्रश्न : *मंदिर में दर्शन के बाद बाहर सीढ़ी*

       *पर थोड़ी देर क्यों बैठा जाता है?*


     *उत्तर :* परम्परा हैं कि किसी भी मंदिर में दर्शन के बाद बाहर आकर मंदिर की पैड़ी या ऑटले पर थोड़ी देर बैठना चाहिए। क्या आप जानते हैं इस परंपरा का क्या कारण है ?

     यह प्राचीन परंपरा एक विशेष उद्देश्य के लिए बनाई गई है। वास्तव में मंदिर की पैड़ी पर बैठ कर एक श्लोक बोलना चाहिए। यह श्लोक आजकल के लोग भूल गए हैं। इस श्लोक का मनन करें और आने वाली पीढ़ी को भी बताएं। श्लोक इस प्रकार है

            *अनायासेन मरणम् ,*

            *बिना देन्येन जीवनम्।*

            *देहान्त तव सानिध्यम् ,*

            *देहि मे परमेश्वरम्॥*


     * इस श्लोक का अर्थ है*

  *अनायासेन मरणम्*

अर्थात् बिना तकलीफ के हमारी मृत्यु हो और कभी भी बीमार होकर बिस्तर पर न पड़ें, कष्ट उठाकर मृत्यु को प्राप्त ना हों चलते फिरते ही हमारे प्राण निकल जाएं।


 *बिना देन्येन जीवनम्*

अर्थात् परवशता का जीवन ना हो। कभी किसी के सहारे ना रहाना पड़े। जैसे कि लकवा हो जाने पर व्यक्ति दूसरे पर आश्रित हो जाता है वैसे परवश या बेबस ना हों। भगवान की कृपा से बिना भीख के ही जीवन बसर हो सकें।


  *देहांते तव सानिध्यम*

अर्थात् जब भी मृत्यु हो तब भगवान के सम्मुख हो। उनके दर्शन करते हुए प्राण निकले।


  *देहि में परमेशवरम्*

हे परमेश्वर ऐसा वरदान हमें देना।


    *भगवान से प्रार्थना करते हुऐ उपरोक्त श्र्लोक का पाठ करें। गाड़ी, पुत्र, पुत्री, पति, पत्नी, घर, धन इत्यादि (अर्थात् संसार) नहीं मांगना है, यह तो भगवान आप की पात्रता के हिसाब से खुद आपको देते हैं। इसीलिए दर्शन करने के बाद बैठकर यह प्रार्थना अवश्य करनी चाहिए। यह प्रार्थना है, याचना नहीं है। याचना सांसारिक पदार्थों के लिए होती है। जैसे कि घर, व्यापार,नौकरी, पुत्र, पुत्री, सांसारिक सुख, धन या अन्य बातों के लिए जो मांग की जाती है वह याचना है वह भीख है*।


     *'प्रार्थना' शब्द के 'प्र' का अर्थ होता है 'विशेष' अर्थात् विशिष्ट, श्रेष्ठ और 'अर्थना' अर्थात् निवेदन।* *प्रार्थना का अर्थ हुआ विशेष निवेदन*


     मंदिर में भगवान का दर्शन सदैव खुली आंखों से करना चाहिए, निहारना चाहिए। कुछ लोग वहां आंखें बंद करके खड़े रहते हैं। आंखें बंद क्यों करना, हम तो दर्शन करने आए हैं। भगवान के स्वरूप का, श्री चरणों का, मुखारविंद का, श्रृंगार का, संपूर्ण आनंद लें, आंखों में भर ले निज-स्वरूप को।

      दर्शन के बाद जब बाहर आकर बैठें, तब नेत्र बंद करके जो दर्शन किया हैं उस स्वरूप का ध्यान करें। मंदिर से बाहर आने के बाद, पैड़ी पर बैठ कर स्वयं की आत्मा का ध्यान करें तब नेत्र बंद करें और अगर निज आत्मस्वरूप ध्यान में भगवान नहीं आए तो दोबारा मंदिर में जाएं और पुन: दर्शन करें।

                                                                                                                                                                  🙏🙏


🌸🌸 कथा "ब्रज की माटी"🌸🌸


देवताओं ने व्रज में कोई ग्वाला कोई गोपी कोई गाय, कोई मोर तो कोई तोते के रूप में जन्म लिया।कुछ देवता और ऋषि रह गए थे।वे सभी ब्रह्माजी के पास आये और कहने लगे कि ब्रह्मदेव आप ने हमें व्रज में क्यों नही भेजा? आप कुछ भी करिए किसी भी रूप में भेजिए।ब्रह्मा जी बोले व्रज में जितने लोगों को भेजना संभव था उतने लोगों को भेज दिया है अब व्रज में कोई भी जगह खाली नहीं बची है। देवताओं ने अनुरोध किया प्रभु आप हमें ग्वाले ही बना दें ब्रह्माजी बोले जितने लोगों को बनाना था उतनों को बना दिया और ग्वाले नहीं बना सकते।देवता बोले प्रभु ग्वाले नहीं बना सकते तो हमे बरसाने को गोपियां ही बना दें ब्रह्माजी बोले अब गोपियों की भी जगह खाली नही है।देवता बोले गोपी नहीं बना सकते, ग्वाला नहीं बना सकते तो आप हमें गायें ही बना दें। ब्रह्माजी बोले गाएं भी खूब बना दी हैं।अकेले नन्द बाबा के पास नौ लाख गाएं हैं।अब और गाएं नहीं बना सकते।

देवता बोले प्रभु चलो मोर ही बना दें।नाच-नाच कर कान्हा को रिझाया करेंगे।ब्रह्माजी बोले मोर भी खूब बना दिए। इतने मोर बना दिए की व्रज में समा नहीं पा रहे।उनके लिए अलग से मोर कुटी बनानी पड़ी।


देवता बोले तो कोई तोता, मैना, चिड़िया, कबूतर, बंदर  कुछ भी बना दीजिए। ब्रह्माजी बोले वो भी खूब बना दिए, पुरे पेड़ भरे हुए हैं पक्षियों से।देवता बोले तो कोई पेड़-पौधा,लता-पता ही बना दें।

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ब्रह्मा जी बोले- पेड़-पौधे, लता-पता भी मैंने इतने बना दिए की सूर्यदेव मुझसे रुष्ट है कि उनकी किरने भी बड़ी कठिनाई से ब्रिज की धरती को स्पर्श करती हैं।देवता बोले प्रभु कोई तो जगह दें हमें भी व्रज में भेजिए।ब्रह्मा जी बोले-कोई जगह खाली नही है।तब देवताओ ने हाथ जोड़ कर ब्रह्माजी से कहा प्रभु अगर हम कोई जगह अपने लिए ढूंढ़ के ले आएं तो आप हम को व्रज में भेज देंगे।ब्रह्मा जी बोले हाँ तुम अपने लिए कोई जगह ढूंढ़ के ले आओगे तो मैं तुम्हें व्रज में भेज दूंगा। देवताओ ने कहा धुल और रेत कणो कि तो कोई सीमा नहीं हो सकती और कुछ नहीं तो बालकृष्ण लल्ला के चरण पड़ने से ही हमारा कल्याण हो जाएगा हम को व्रज में धूल रेत ही बना दे।ब्रह्मा जी ने उनकी बात मान ली।

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इसलिए जब भी व्रज जाये तो धूल और रेत से क्षमा मांग कर अपना पैर धरती पर रखे, क्योंकि व्रज की रेत भी सामान्य नही है, वो ही तो रज देवी - देवता एवं समस्त ऋषि-मुनि हैं...!!


जय श्रीराधे जी...🙏🙏


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Tuesday, August 17, 2021

कृष्ण जन्म भूमि

कृष्ण जन्म भूमि मथुरा का एक प्रमुख धार्मिक स्थान है जहाँ हिन्दू धर्म के अनुयायी कृष्ण भगवान का जन्म स्थान मानते हैं। यह विवादों में भी घिरा हुआ है क्योंकि इससे लगी हुई जामा मस्जिद मुसलमानों के लिये धार्मिक स्थल है। भगवान श्री कृष्ण की जन्मभूमि का न केवल राष्द्रीय स्तर पर महत्व है बल्कि वैश्विक स्तर पर जनपद मथुरा भगवान श्रीकृष्ण के जन्मस्थान से ही जाना जाता है। आज वर्तमान में महामना पंडित मदनमोहन मालवीय जी की प्रेरणा से यह एक भव्य आकर्षक मन्दिर के रूप में स्थापित है। पर्यटन की दृष्टि से विदेशों से भी श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए यहाँ प्रतिदिन आते हैं। भगवान श्रीकृष्ण को विश्व में बहुत बड़ी संख्या में नागरिक आराध्य के रूप में मानते हुए दर्शनार्थ आते हैं।[1]

इतिहास 

प्रथम बार कृष्ण जन्मभूमि पर कोई निर्माण अर्जुनायन शासक अरलिक वसु ने तोरण द्वार के रूप में करवाया था लेकिन यहां प्रथम मंदिर का निर्माण यदुवंशी राजा ब्रजनाम ने 80 वर्ष ईसा पूर्व में कराया था। कालक्रम (हूण, कुषाण हमलों) में इस मंदिर के ध्वस्त होने के बाद गुप्तकाल के सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने सन् 400 ई० में दूसरे वृहद् मंदिर का निर्माण करवाया। परंतु इस मंदिर को महमूद गजनवी ने ध्वस्त कर दिया। तत्पश्चात महाराज विजयपाल देव तोमर के शासन काल में हिन्दू जाट शासक जाजन सिंह ने तीसरे मंदिर का निर्माण करवाया। यह मथुरा क्षेत्र में मगोर्रा के सामंत शासक थे इनका राज्य नील के व्यापार के लिए जाना जाता था।

शासक जाजन सिंह तोमर (कुंतल) ने 1150 ईस्वी में करवाया। इस जाजन सिंह को जण्ण और जज्ज नाम से भी सम्बोधित किया गया है। इनके वंशज आज जाजन पट्टी, नगला झींगा, नगला कटैलिया में निवास करते है।[2]

खुदाई में मिले संस्कृत के एक शिलालेख से भी जाजन सिंह (जज्ज) के मंदिर बनाने का पता चलता है। शिलालेख के अनुसार मंदिर के व्यय के लिए दो मकान, छः दुकान और एक वाटिका भी दान दी गई दिल्ली के राजा के परामर्श से 14 व्यक्तियों का एक समूह बनाया गया जिसके प्रधान जाजन सिंह थे।

यह मंदिर भी 16 वीं सदी में सिकंदर लोधी द्वारा ध्वस्त कर दिया गया। 1618 ई० में ओरछा के बुन्देला राजा वीरसिंह जूदेव ने विशाल मन्दिर का निर्माण जन्म भूमि कराया यह मंदिर इतना विशाल था कि आगरा से दिखाई देता था। इस मंदिर को भी मुगल शासक औरंगजेब ने सन् 1669 में नष्ट कर दिया। इस मंदिर को वीर गौकुला जाट ने नहीं गिराने दिया व उनके बलिदान के बाद ही इसे गिराया जा सका फिर जाटों ने मुगलो की राजधानी आगरा पर आक्रमण कर दिया था।

फिर पुनः इसका निर्माण यहां के जाट शासक महाराजा सूरजमल ने करवाया जिसका विस्तार महाराजा जवाहर सिंह ने किया।

बिड़ला द्वारा 21 फरवरी 1951 को कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की स्थापना करने के साथ ही यह मंदिर ट्रस्ट के अधीन चला गया जबकि इससे पहले इसकी जिम्मेदारी भरतपुर नरेशों के पास थी। क़ानूनी मुकद्दमों में जीतने के बाद यहां गर्भ गृह और भव्य भागवत भवन के पुनर्रुद्धार और निर्माण कार्य आरंभ हुआ, जो फरवरी 1982 में पूरा हुआ।

मंदिर 

भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी इहलौकिक लीला संवरण की। उधर युधिष्ठर महाराज ने परीक्षित को हस्तिनापुर का राज्य सौंपकर श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ को मथुरा मंडल के राज्य सिंहासन पर प्रतिष्ठित किया। चारों भाइयों सहित युधिष्ठिर स्वयं महाप्रस्थान कर गये। महाराज वज्रनाभ ने महाराज परीक्षित और महर्षि शांडिल्य के सहयोग से मथुरा मंडल की पुन: स्थापना करके उसकी सांस्कृतिक छवि का पुनरूद्वार किया। वज्रनाभ द्वारा जहाँ अनेक मन्दिरों का निर्माण कराया गया, बहीं भगवान श्रीकृष्णचन्द्र की जन्मस्थली का भी महत्व स्थापित किया। यह कंस का कारागार था, जहाँ वासुदेव ने भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की आधी रात अवतार ग्रहण किया था। आज यह कटरा केशवदेव नाम से प्रसिद्व है। यह कारागार केशवदेव के मन्दिर के रूप में परिणत हुआ। इसी के आसपास मथुरा पुरी सुशोभित हुई। यहाँ कालक्रम में अनेकानेक गगनचुम्बी भव्य मन्दिरों का निर्माण हुआ। इनमें से कुछ तो समय के साथ नष्ट हो गये और कुछ को विधर्मियों ने नष्ट कर दिया।[1]

प्रथम मन्दिर 

ईसवी सन् से पूर्ववर्ती 80-57 के महाक्षत्रप सौदास के समय के एक शिला लेख से ज्ञात होता है कि किसी वसु नामक व्यक्ति ने श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर एक मंदिर तोरण द्वार और वेदिका का निर्माण कराया था। यह शिलालेख ब्राह्मी लिपि में है।[1]

द्वितीय मन्दिर 

दूसरा मन्दिर विक्रमादित्य के काल में सन् 800 ई॰ के लगभग बनवाया गया था। संस्कृति और कला की दृष्टि से उस समय मथुरा नगरी बड़े उत्कर्ष पर थी। हिन्दू धर्म के साथ बौद्ध और जैन धर्म भी उन्नति पर थे। श्रीकृष्ण जन्मस्थान के संमीप ही जैनियों और बौद्धों के विहार और मन्दिर बने थे। यह मन्दिर सन 1017-18 ई॰ में महमूद ग़ज़नवी के कोप का भाजन बना। इस भव्य सांस्कृतिक नगरी की सुरक्षा की कोई उचित व्यवस्था न होने से महमूद ने इसे ख़ूब लूटा। भगवान केशवदेव का मन्दिर भी तोड़ डाला गया।[1]

तृतीय मन्दिर 

महाराज विजयपाल देव तोमर के शासन काल में जाट शासक जज्ज (जाजन सिंह) ने तीसरे मंदिर का निर्माण करवाया। यह मथुरा क्षेत्र में मगोर्रा के सामंत शासक थे इनका राज्य नील के व्यापार के लिए जाना जाता था। जाजन सिंह तोमर (कुंतल) ने 1150 ईस्वी में करवाया। इस जाजन सिंह को जण्ण और जज्ज नाम से भी सम्बोधित किया गया है। इनके वंशज आज जाजन पट्टी, नगला झींगा, नगला कटैलिया में निवास करते है।[3]

खुदाई में मिले संस्कृत के एक शिलालेख से भी जाजन सिंह (जज्ज) के मंदिर बनाने का पता चलता है। शिलालेख के अनुसार मंदिर के व्यय के लिए दो मकान, छः दुकान और एक वाटिका भी दान दी गई दिल्ली के राजा के परामर्श से 14 व्यक्तियों का एक समूह बनाया गया जिसके प्रधान जाजन सिंह थे। इस मंदिर को 16 वी शताब्दी के प्रारम्भ में सिकन्दर लोदी के शासन काल में नष्ट कर डाला गया था।[1]

चतुर्थ मन्दिर 

मुग़ल बादशाह जहाँगीर के शासन काल में श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर पुन: एक नया विशाल मन्दिर निर्माण कराया गया। ओरछा के शासक राजा वीरसिंह जूदेव बुन्देला द्वारा इसकी ऊँचाई 250 फीट रखी गई थी। ऐसा बताया जाता है कि यह आगरा से भी दिखाई देता था। उस समय इस निर्माण की लागत 33 लाख रुपये आई थी। इस मन्दिर के चारों ओर एक ऊँची दीवार का परकोटा बनवाया गया था, जिसके अवशेष अब तक विद्यमान हैं। दक्षिण पश्चिम के एक कोने में कुआँ भी बनवाया गया था जिस का पानी 60 फीट ऊँचा उठाकर मन्दिर के प्रागण में फब्बारे चलाने के काम आता था। यह कुआँ और उसका बुर्ज आज तक विद्यमान है। सन 1669 ई॰ में पुन: यह मन्दिर नष्ट कर दिया गया और इसकी भवन सामग्री से ईदगाह बनवा दी गई जो आज विद्यमान है।


लीलाधर कृष्ण की जन्मस्थली मथुरा में बने भव्य मंदिर को देखकर लुटेरा महमूद गजनवी भी आश्चर्यचकित रह गया था। उसके मीर मुंशी अल उत्वी ने अपनी पुस्तक तारीखे यामिनी में लिखा है कि गनजवी ने मंदिर की भव्यता देखकर कहा था कि इस मंदिर के बारे में शब्दों या चित्रों से बखान करना नामुमकिन है। उसका अनुमान था कि वैसा भव्य मंदिर बनाने में दस करोड़ दीनार खर्च करने होंगे और इसमें दो सौ साल लगेंगे।
 
 
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ईस्वी सन् 1017-18 में महमूद गजनवी ने मथुरा के समस्त मंदिर तुड़वा दिए थे, लेकिन उसके लौटते ही मंदिर बन गए। मथुरा के मंदिरों के टूटने और बनने का सिलसिला भी कई बार चला। बाद में इसे महाराजा विजयपाल देव के शासन में सन् 1150 ई. में जज्ज नामक किसी व्यक्ति ने बनवाया। यह मंदिर पहले की अपेक्षा और भी विशाल था, जिसे 16वीं शताब्दी के आरंभ में सिकंदर लोदी ने नष्ट करवा डाला।
 
 
ओरछा के शासक राजा वीरसिंह जू देव बुन्देला ने पुन: इस खंडहर पड़े स्थान पर एक भव्य और पहले की अपेक्षा विशाल मंदिर बनवाया। इसके संबंध में कहा जाता है कि यह इतना ऊंचा और विशाल था कि यह आगरा से दिखाई देता था। लेकिन इसे भी मुस्लिम शासकों ने सन् 1669 ईस्वी में नष्ट कर इसकी भवन सामग्री से जन्मभूमि के आधे हिस्से पर एक भव्य ईदगाह बनवा दी गई, जो कि आज भी विद्यमान है। इस ईदगाह के पीछे ही महामना पंडित मदनमोहन मालवीयजी की प्रेरणा से पुन: एक मंदिर स्थापित किया गया है, लेकिन अब यह विवादित क्षेत्र बन चुका है क्योंकि जन्मभूमि के आधे हिस्से पर ईदगाह है और आधे पर मंदिर।
हिन्दू इतिहास के अनुसार योगेश्वर श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन कंस के कारागार में हुआ था। कथाओं के अनुसार उनके प्रपौत्र व्रजनाभ ने ही सर्वप्रथम उनकी स्मृति में केशवदेव मंदिर की स्थापना की थी।
 
 
इसके बाद यह मंदिर 80-57 ईसा पूर्व बनाया गया था। इस संबंध में महाक्षत्रप सौदास के समय के एक शिलालेख से ज्ञात होता है कि किसी 'वसु' नामक व्यक्ति ने यह मंदिर बनाया था। इसके बहुत काल के बाद दूसरा मंदिर सन् 800 में विक्रमादित्य के काल में बनवाया गया था, जबकि बौद्ध और जैन धर्म उन्नति कर रहे थे। 
 
 
ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक प्रमाण की दृष्टि से सबसे पुराना शिलालेख महाक्षत्रप शोडास (ईसा पूर्व 80 से 57 तक) के समय का मिला है। ब्राह्मी लिपि के इस शिलालेख के अनुसार उसके राज्यकाल में वसु नामक एक व्यक्ति ने श्रीकृष्ण जन्म स्थान पर एक मंदिर, तोरण द्वार और वेदी का निर्माण कराया था। काल के थपेड़ों ने मंदिर की स्थिति खराब बना दी। करीब 400 साल बाद गुप्त सम्राट विक्रमादित्य ने उसी स्थान पर भव्य मंदिर बनवाया। इसका वर्णन भारत यात्रा पर आए चीनी यात्रियों फाह्यान और ह्वेनसांग ने भी किया है।
 
 
बाद में मथुरा के राजा विजयपाल के कार्यकाल में एक श्रद्धालु ने मंदिर को नया जीवन प्रदान किया, लेकिन सिकंदर लोदी की बुरी नजर उस पर पड़ी और उसने मंदिर तुड़वा दिया। बाद में ओरछा नरेश वीरसिंह देव बुंदेला ने भव्य मंदिर बनवाया। उस समय के बादशाह जहांगीर ने ही बुंदेला को पुनर्निर्माण की इजाजत दी थी।
 
 
फ्रांसीसी यात्री टैबरनियर 17वीं सदी में भारत आया था और उसने अपने वृत्तांतों में मंदिर की भव्यता का जिक्र किया है। इतालवी सैलानी मनूची के अनुसार केशवदेव मंदिर का स्वर्णाच्छादित शिखर इतना ऊँचा था कि दीपावली की रात उस पर जले दीपकों का प्रकाश 18 कोस दूर स्थित आगरा में भी दिखता था।
 
 
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कई बार बने और टूटे इस मंदिर पर अंतिम प्रहार औरंगजेब ने किया। बहरहाल महामना मदनमोहन मालवीय और जुगलकिशोर बिड़ला के प्रयासों से 1951 में एक ट्रस्ट बनाकर 1953 में मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य शुरू किया गया। 1958 में कृष्ण जन्माष्टमी के दिन मंदिर का लोकार्पण हुआ। बाद में ट्रस्ट ने औषधालय, विश्रामगृह तथा भागवत भवन का भी निर्माण कराया।
 
 
 
श्रीकृष्ण के इस भव्य एवं दिव्य मंदिर का इतिहास पिछले दो हजार साल में काफी उतार-चढ़ाव का रहा है। आतताइयों ने इसे कम से कम तीन बार नष्ट किया, लेकिन भक्तों की श्रद्धा एवं विश्वास में कोई कमी नहीं आई। आज भी हर साल भारी तादाद में कृष्ण उपासक यहाँ आकर अपने को धन्य महसूस करते हैं और 'जय कन्हैयालाल की' का उद्‍घोष करते हैं। (एजेंसी से इनपुट)

कोरोना संक्रमण काल में भक्त अपने आराध्य के दर्शनों से वंचित हो गए थे। लॉकडाउन की वजह से बृज के प्रमुख मंदिर बंद कर दिए गए थे। अब कोरोना संक्रमण कम हो रहा है। ऐसे में शासन की ओर से लागू प्रतिबंधों में भी ढील दी जाने लगी। अभी श्री कृष्ण जन्मस्थान श्रद्धालुओं के लिए सुबह 6:30 बजे से दोपहर 12 बजे तक और शाम को 3:30 बजे से 6:30 बजे तक खुल रहे थे, लेकिन मंदिर प्रशासन ने बड़ा फैसला लिया है। अब सायंकालीन दर्शन का समय शाम 4 बजे से रात 8:30 बजे तक कर दिया है। 21 जून से भक्त 4 बजे से भगवान के दर्शन कर सकेंगे।
श्री कृष्ण जन्मस्थान के दर्शन का समय बढ़ा, जानें कितने बजे तक खुला रहेगा


श्रीकृष्ण जन्मभूमि: तीन बार टूटा और चार बार बनाया गया भगवान श्रीकृष्ण का मंदिर, यह है इतिहास

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा Updated Sun, 27 Sep 2020 08:49 AM IST
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श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर मथुरा1 of 9
श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर मथुरा - फोटो : अमर उजाला
मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर बने मंदिर का इतिहास रोचक है। यह मंदिर तीन बार टूटा और चार बार बनाया गया है। इस जगह पर मालिकाना हक के लिए दो पक्षों में कोर्ट में विवाद भी चला। जिस जगह पर आज कृष्ण जन्मस्थान है, वहां पांच हजार साल पहले मल्लपुरा क्षेत्र के कटरा केशव देव में राजा कंस का कारागार हुआ करता था। इसी कारागार में भगवान कृष्ण ने जन्म लिया था। कटरा केशव देव को भी कृष्ण जन्मभूमि माना है। इतिहासकारों के अनुसार, सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वारा बनवाए गए इस भव्य मंदिर पर महमूद गजनवी ने सन 1017 ई. में आक्रमण कर इसे लूटने के बाद तोड़ दिया था।


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श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर मथुरा2 of 9
श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर मथुरा - फोटो : अमर उजाला

कृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ ने बनवाया था पहला मंदिर
आकाशवाणी मथुरा के पूर्व वरिष्ठ उद्घोषक पंडित राधा बिहारी गोस्वामी ने बताया कि कारागार के पास सबसे पहले भगवान कृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ ने अपने कुलदेवता की स्मृति में एक मंदिर बनवाया था। लोगों का मानना है कि यहां से मिले शिलालेखों पर ब्राहम्मी-लिपि में लिखा हुआ है। इससे यह पता चलता है कि यहां शोडास के राज्य काल में वसु नामक व्यक्ति ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर एक मंदिर, उसके तोरण-द्वार और वेदिका का निर्माण कराया था।
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श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर मथुरा - फोटो : अमर उजाला
विक्रमादित्य ने बनवाया था दूसरा बड़ा मंदिर
इतिहासकारों का मानना है कि सम्राट विक्रमादित्य के शासन काल में दूसरा मंदिर 400 ईसवी में बनवाया गया था। यह भव्य मंदिर था। उस समय मथुरा संस्कृति और कला के बड़े केंद्र के रूप में स्थापित हुआ था। इस दौरान यहां हिन्दू धर्म के साथ-साथ बौद्ध और जैन धर्म का भी विकास हुआ था।
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श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर मथुरा4 of 9
श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर - फोटो : अमर उजाला
विजयपाल देव के शासनकाल में बना तीसरा मंदिर
खुदाई में मिले संस्कृत के एक शिलालेख से पता चलता है कि 1150 ईस्वी में राजा विजयपाल देव के शासनकाल के दौरान जज्ज नाम के एक व्यक्ति ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर एक नया मंदिर बनवाया था। उसने विशाल और भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था। इस मंदिर को 16वीं शताब्दी के शुरुआत में सिकंदर लोदी के शासन काल में नष्ट कर डाला गया था।

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श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर - फोटो : अमर उजाला
जहांगीर के शासनकाल में चौथी बार बना मंदिर, औरंगजेब ने तुड़वाया
इसके बाद लगभग 125 वर्षों बाद जहांगीर के शासनकाल के दौरान ओरछा के राजा वीर सिंह देव बुंदेला ने इसी स्थान पर चौथी बार मंदिर बनवाया। कहा जाता है कि इस मंदिर की भव्यता से चिढ़कर औरंगजेब ने सन 1669 में इसे तुड़वा दिया और इसके एक भाग पर ईदगाह का निर्माण करा दिया। यहां प्राप्त अवशेषों से पता चलता है कि इस मंदिर के चारों ओर एक ऊंची दीवार का परकोटा मौजूद था। 

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श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर - फोटो : अमर उजाला
बिड़ला ने की श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की स्थापना
ब्रिटिश शासनकाल में वर्ष 1815 में नीलामी के दौरान बनारस के राजा पटनीमल ने इस जगह को खरीद लिया। वर्ष 1940 में जब यहां पंडित मदन मोहन मालवीय आए, तो श्रीकृष्ण जन्मस्थान की दुर्दशा देखकर वे काफी निराश हुए। इसके तीन वर्ष बाद 1943 में उद्योगपति जुगलकिशोर बिड़ला मथुरा आए और वे भी श्रीकृष्ण जन्मभूमि की दुर्दशा देखकर बड़े दुखी हुए। इसी दौरान मालवीय ने बिड़ला को श्रीकृष्ण जन्मभूमि के पुनर्रुद्धार को लेकर एक पत्र लिखा। मालवीय की इच्छा का सम्मान करते हुए बिड़ला ने सात फरवरी 1944 को कटरा केशव देव को राजा पटनीमल के तत्कालीन उत्तराधिकारियों से खरीद लिया। बिड़ला ने 21 फरवरी 1951 को श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की स्थापना की।

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श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर - फोटो : अमर उजाला
1982 में पूरा हुआ वर्तमान मंदिर का निर्माण कार्य
श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की स्थापना से पहले ही यहां रहने वाले कुछ मुसलमानों ने 1945 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल कर दी थी। इसका फैसला 1953 में आया। इसके बाद ही यहां निर्माण शुरू हो सका। यहां गर्भ गृह और भव्य भागवत भवन के पुनर्रुद्धार और निर्माण कार्य आरंभ हुआ, जो फरवरी 1982 में पूरा हुआ

जब महमूद गजनवी ने तोड़ दिया था श्रीकृष्‍ण जन्‍मस्‍थान, ऐसा है इसका इतिहास

4 वर्ष पहले
मथुरा. गुजरात के प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर की तरह मथुरा के श्रीकृष्‍ण जन्‍मस्‍थान पर भी आक्रमणकारी महमूद गजनवी ने हमला किया था। लूटकर इस धर्मस्‍थल को भी तोड़ डाला था। यह मंदिर तीन बार तोड़ा और चार बार बनाया जा चुका है। अभी भी इस जगह पर मालिकाना हक के लिए दो पक्षों में कोर्ट में विवाद चल रहा है।
 
कृष्‍ण जन्‍माष्‍ठमी पर जानिए जन्‍मस्‍थान का इतिहास...

 - जिस जगह पर आज कृष्‍ण जन्‍मस्‍थान है, वह पांच हजार साल पहले मल्‍लपुरा क्षेत्र के कटरा केशव देव में राजा कंस का कारागार हुआ करता था। इसी कारागार में रोहिणी नक्षत्र में आधी रात को भगवान कृष्‍ण ने जन्‍म लिया था।
- इतिहासकार डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल ने कटरा केशवदेव को ही कृष्ण जन्मभूमि माना है। विभिन्न अध्‍ययनों और साक्ष्यों के आधार पर मथुरा के राजनीतिक संग्रहालय के दूसरे कृष्णदत्त वाजपेयी ने भी स्वीकारा कि कटरा केशवदेव ही कृष्ण की असली जन्मभूमि है।
- इति‍हासकारों के अनुसार, सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वारा बनवाए गए इस भव्य मंदिर पर महमूद गजनवी ने सन 1017 ई. में आक्रमण कर इसे लूटने के बाद तोड़ दिया था।
 
कृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ ने बनवाया था पहला मंदिर

- जनमान्‍यता के अनुसार, कारागार के पास सबसे पहले भगवान कृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ ने अपने कुलदेवता की स्मृति में एक मंदिर बनवाया था।
- आम लोगों का मानना है कि‍ यहां से मिले शिलालेखों पर ब्राहम्मी-लिपि में लिखा हुआ है। इससे यह पता चलता है कि यहां शोडास के राज्य काल में वसु नामक व्यक्ति ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर एक मंदिर, उसके तोरण-द्वार और वेदिका का निर्माण कराया था।
 
विक्रमादित्य ने बनवाया था दूसरा बड़ा मंदिर
 
- इतिहासकारों का मानना है कि सम्राट विक्रमादित्य के शासन काल में दूसरा मंदिर 400 ईसवी में बनवाया गया था। यह भव्‍य मंदिर था।
- उस समय मथुरा संस्कृति और कला के बड़े केंद्र के रूप में स्थापित हुआ था। इस दौरान यहां हिन्दू धर्म के साथ-साथ बौद्ध और जैन धर्म का भी विकास हुआ था।
 
आस-पास बौद्ध आस्‍था का भी केंद्र बना
 
- इस दौरान मथुरा के आसपास बौद्धों और जैनियों के भी विहार और मंदिर भी बने।
- इन निर्माणों के प्राप्त अवशेषों से यह पता चलता है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्मस्थान उस समय बौद्धों और जैनियों के लिए भी आस्था का केंद्र रहा था।
 
वि‍जयपाल देव के शासनकाल में बना तीसरा बड़ा मंदिर, सिकंदर लोदी ने तुड़वाया

- खुदाई में मिले संस्कृत के एक शिलालेख से पता चलता है कि 1150 ईस्वी में राजा विजयपाल देव के शासनकाल के दौरान जज्ज नाम के एक व्यक्ति ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर एक नया मंदि‍र बनवाया था।
- उसने विशाल और भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था। इस मंदिर को 16वीं शताब्दी के शुरुआत में सिकंदर लोदी के शासन काल में नष्ट कर डाला गया था।
 
जहांगीर के शासनकाल में चौथी बार बना मंदिर, औरंगजेब ने तुड़वाया

- इसके लगभग 125 वर्षों बाद जहांगीर के शासनकाल के दौरान ओरछा के राजा वीर सिंह देव बुंदेला ने इसी स्थान पर चौथी बार मंदिर बनवाया।
- कहा जाता है कि इस मंदिर की भव्यता से चिढ़कर औरंगजेब ने सन 1669 में इसे तुड़वा दिया और इसके एक भाग पर ईदगाह का निर्माण करा दिया।
- यहां प्राप्त अवशेषों से पता चलता है कि इस मंदि‍र के चारों ओर एक ऊंची दीवार का परकोटा मौजूद था। मंदिर के दक्षिण पश्चिम कोने में एक कुआं भी बनवाया गया था।
- इस कुएं से पानी 60 फीट की ऊंचाई तक ले जाकर मंदि‍र के प्रांगण में बने फव्‍वारे को चलाया जाता था। इस स्थान पर उस कुएं और बुर्ज के अवशेष अभी तक मौजूद है।
 
बिड़ला ने की श्रीकृष्‍ण जन्‍मभूमि‍ट्रस्ट की स्‍थापना

- ब्रिटिश शासनकाल में वर्ष 1815 में नीलामी के दौरान बनारस के राजा पटनीमल ने इस जगह को खरीद लिया।
- वर्ष 1940 में जब यहां पंडि‍त मदन मोहन मालवीय आए, तो श्रीकृष्ण जन्मस्थान की दुर्दशा देखकर वे काफी निराश हुए।
- इसके तीन वर्ष बाद 1943 में उद्योगपति जुगलकिशोर बिड़ला मथुरा आए और वे भी श्रीकृष्ण जन्मभूमि की दुर्दशा देखकर बड़े दुखी हुए। इसी दौरान मालवीय जी ने बिड़ला को श्रीकृष्ण जन्मभूमि के पुनर्रुद्धार को लेकर एक पत्र लिखा।
- बिड़ला ने भी उन्हें जवाब में इस स्थान को लेकर हुए दर्द को लिख भेजा। मालवीय की इच्छा का सम्मान करते हुए बिड़ला ने सात फरवरी 1944 को कटरा केशव देव को राजा पटनीमल के तत्कालीन उत्तराधिकारियों से खरीद लिया।
- इससे पहले कि वे कुछ कर पाते मालवीय का देहांत हो गया। उनकी अंति‍म इच्छा के अनुसार, बिड़ला ने 21 फरवरी 1951 को श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की स्थापना की।
 
1982 में पूरा हुआ वर्तमान मंदिर का निर्माण कार्य

- ट्रस्ट की स्थापना से पहले ही यहां रहने वाले कुछ मुसलमानों ने 1945 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक रिट दाखिल कर दी। इसका फैसला 1953 में आया।
- इसके बाद ही यहां कुछ निर्माण कार्य शुरू हो सका। यहां गर्भ गृह और भव्य भागवत भवन के पुनर्रुद्धार और निर्माण कार्य आरंभ हुआ, जो फरवरी 1982 में पूरा हुआ।

कृष्ण जन्मभूमि मंदिर, मथुरा

कृष्ण जन्मभूमि मंदिर Photo28

मशहूर कृष्ण जन्मभूमि मंदिर या कृष्ण जन्मस्थान हिन्दुओं के पूजन के लिए पावन धरती मानी जाती है। मंदिर परिशर के अन्दर एक कारागार जैसी संरचना है और ऐसा माना जाता है कि भगवान का जन्म यहीं हुआ था। ऐसा माना जाता है कि यह मंदिर जहाँगीर के शाशन में ओरछा के राजा वीर सिंह बुंदेला द्वारा बनवाया गया था।

हालांकि, और पीछे जाने पर यह पता चलता है कि यहाँ का पहला मंदिर करीबन 5000 साल पहले भगवान कृष्ण के पड़पोते ने बनवाया था। उस समय जब इस मंदिर का रुबाब था ऐसा मानते हैं कि इसका यश शब्दों या चित्रकारी द्वारा बयां कर पाना मुश्किल था। वास्तविक मंदिर को ग़ज़नी के महमूद ने 1017 एडी में कई और मंदिर और बौद्द स्मारक की तरह ही बर्बाद कर दिया था।

इन सालों में इस मंदिर में कई संरचनात्मक बदलाव आये। आज मंदिर परिशर की वास्तुकला हिन्दू अंदाज़ में बनायी गयी है। औरंगज़ेब के शाशन के दौरान इस मंदिर के बाजू में एक मस्जिद का निर्माण किया गया ताकि इस मंदिर से ध्यान हटवाया जा सकता।

टेर कदम्ब

राधे राधे टेर कदम्ब राधे राधे कदम्ब चढ़ि, श्याम बुलावत गैया ।  कारी, काँमर, धौरी, धूमर अब घर को बगदैया ॥ यह स्थान श्री कृष्ण बलराम की गौचारण...